Home / साहित्य / कविता / नंदना पंकज की चार कविताएँ

नंदना पंकज की चार कविताएँ

नंदना पंकज1. अवसरवाद

अवसर के अनुकुल
अपनी सुविधानुसार
हम चुनते है इतिहास से
कोई नायक/विचारक महापुरूष
पूजने लगते हैं उन्हें
ईश्वर की भाँति
रिचाओं सी दोहराते रहते है
उनकी सुक्तियाँ
अपने ‘वाद’ को अपना
धर्म बना लेते हैं
ढोते रहते है उनके दिये
प्रतीकों और चिह्नों को
किंतु अक्सर आचार से
विचार को परे रखते हैं
ठीक मंदिर से बाहर
उतारी हुई चप्पल की तरह

 

2. अस्तित्व

तुम देना चाहते हो मुझे
मेरे हिस्से का आकाश
कुछ कतरे धूप के
बादलों के कुछ फाहे
साँस भर ताज़ी हवा
बस इतना…
ना…नहीं लूंगी मैं
मत सोचो तुम कि
मेरी चंद ज़रूरतें पुरी करके
बने रह सकते हो मेरे सर्वे-सर्वा
बिलाये रख सकते हो
मेरे अस्तित्व को अपने अधीन
अब पहचान ली है मैंने
अपनी क्षमताएँ और
भीतर के भीत को
बाहर धकेल दिया है
मुझे चाहिये ज़्यादा
बहुत ही ज़्यादा
पूरा का पूरा आसमान
सूरज की सारी ऊर्जाशक्ति
पुरज़ोर मुसलाधार बारिश
आँधी और चक्रवात
ये सब माँगना नहीं है तुमसे
बल्कि छीन लेना है मुझे
क्योंकि उलट-फेर करने हैं सारे नियम
बदलनी है सबकी भूमिकायें
विधी के पुनर्निर्माण के लिए
प्रकृति को नया आयाम देना है
अब मुझे ख़ुद का ख़ुदा होना है

 

3.समतावादी प्रगतिशील ‘पुरूष’

“मैंने इजाज़त दी” उसे
शादी के बाद ज़ारी रखे
अपनी नौकरी ताकि
खड़ी रह सके वो
अपने पैरों पे,
“मैंने इजाज़त दी” उसे
कि घुँघट से बाहर निकल
वो पहन सके जींस,पैंट या
जो भी उसे पसंद हो,
“मैंने छूट दे रखी है” उसे
वो जैसे चाहे खर्च करे
अपनी सैलरी,
जब चाहे जा सके मायके,
जहाँ चाहे घुम सके
महिला या पुरूष मित्रों के साथ,
और “इतनी आज़ादी दी है” कि
वो ले सके अपना निर्णय ख़ुद
आखिर हम दोनों को ही
बराबरी का हक़ है।

 

4. मेरी बेटियाँ

मेरी बेटियाँ नहीं खेलीं कभी
गुड्डे-गुड्डीयों से; किचन सेट से,
वे खेलतीं हैं पज्ज़लस् या फुटबॅाल से,
वे करतीं हैं टॉय-कार की रेसिंग,
मेरी बेटियाँ कढ़ाई- बुनाई में
नहीं लेती ज़रा भी दिलचस्पी,
वो तो बस टेलिस्कोप से भर रात
तारों को निहारना चाहतीं हैं,
उन्हें पसंद है एक्शन मूवीज्
बजाए छुई-मुई सी डिज़्नी प्रिंसेस् के,
पायल की छम-छम उन्हें नहीं सुहाती
वे तो स्पोर्टस् शूज् पहन कर
पहाड़ों की ट्रैकिंग करना चाहती हैं,
उनकी विश-लिस्ट में है-
पैराग्लाइडिंग; सर्फिंग; बंजी जंपिंग;
स्कूबा-डाइविंग इत्यादि –इत्यादि
शायद ऐसे ही वो तोड़ रहीं हैं
रूचियों का लैंगिक वर्गीकरण,
वर्ल्ड-टूर पर जाना हैं उन्हें
पैरेंटस् को भी साथ घुमाना है
मगर अपनी सैलरी से,
वे चाहतीं हैं शादी से पहले
अपना घर, अपनी गाड़ी,
एक वेल-एक्विप्ड किचन से पहले
एक पर्सनल लाइब्रेरी,
वे सिखा रहीं हैं मुझे
कोई जेंडर नहीं होता सपनों का,
इच्छाओं का, महत्वकांक्षाओं का,
आत्मविश्वास, आत्मगौरव, आत्मसम्मान
के साथ वे तोड़ रहीं है
वे सारी धारणाएँ व रूढ़ियाँ
जो समेट कर रखतीं हैं उन्हें
बस घर परिवार तक,
‘बेटा’ पुकारे जाने पर
चिढ़ जाती हैं वे बेटियाँ,
उन्हें लड़को से कोई
प्रतिस्पर्धा नहीं करनी,
उन्हें तो बस चाहिये
अवसर की समानता
और समता का व्यवहार,
वो जानती हैं विज्ञान
जीवन की उत्पति का,
इस समाजिक संरचना का
भूगोल और इतिहास,
वे जानती हैं,
वे बने रहना चाहती हैं
पुरूषों का पूरक परंतु
मिटाना चाहती हैं भेद
स्त्रीलिंग-पुल्लिंग का

-नंदना पंकज

 

संक्षिप्त परिचय :-

नाम – नन्दना किशोर
जन्मतिथि – 27-11-1982
शिक्षा – पुर्व-स्नातक
यदा-कदा ‘जनसत्ता’ में प्रकाशित
विशेष – वर्ष २००५ में ‘हिन्दी अकादमी, दिल्ली’ द्वारा आयोजित ‘आशुलेखन प्रतियोगिता’ में कविता लेखन के लिए प्रथम पुरस्कार से प्रोत्साहित |
ईमेल – nandanapankaj@gmail.com

प्रस्तुति : नित्यानंद गायेन

Print Friendly

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

Select language:
Hindi
English
Scroll To Top