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पिवोट टू एशिया के बाद पिवोट टू लैटिन अमेरिका – 2

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अमेरिकी साम्राज्य अपने डाॅलर और अपनी सामरिक क्षमता पर टिका हुआ है। माॅर्गन ने ‘पिवोट टू लैटिन अमेरिका‘ के पक्ष में अपने निष्कर्षों को सामरिक आधार भी दिया है। वो मानते हैं, कि लातिनी अमेरिकी देशों में चीन की मौजूदगी, अमेरिका के सामरिक हितों के खिलाफ है। उन्होंने वेनेजुएला, पेरू, बोलिविया, अर्जेन्टिना और अन्य देशों के साथ चीन के द्वारा किये गये उन समझौतों का उल्लेख किया है, जिसमें हंथियारों की आपूर्ति हुई है, और होनी है। साथ ही उन्होंने सैन्य प्रतिनिधियों के अधिकारिक स्तर की यात्रा और सैन्य अधिकारियों के शिक्षण एवं प्रशिक्षण का भी उल्लेख किया है।

उन्होंने अपने आलेख में लिखा है, कि ‘‘इस क्षेत्र में चीन की सैन्य उपस्थिति और प्रभाव विस्तार चीन को रणनीतिक विकल्प प्रदान करता है, जोकि एशिया-प्रशांत क्षेत्र में उसकी सैन्य गतिविधियों को खुले तौर पर या गुप्त रूप से सहयोग दे सकता है।‘‘ जिसका सीधा सा मतलब है, कि ‘‘लातिनी अमेरिकी देशों में चीन अपनी सैन्य उपस्थिति एवं प्रभाव विस्तार को मजबूत बना लेता है, तो वह उसके एशिया-प्रशांत क्षेत्र में उपस्थिति और विस्तार को भी मजबूती देगा। माॅर्गन का मानना है, कि ‘‘संयुक्त राज्य अमेरिका को, पश्चिमी गोलार्द्ध में चीनी सैन्य उपस्थिति की वजह से पैदा हुए खतरे को, कम करके नहीं आंकना चाहिये।‘‘ वह इसकी अनदेखी नहीं कर सकता है।

अमेरिकी सदियों से लातिनी अमेरिकी महाद्वीप को संयुक्त राज्य का पिछवाड़ा (बैकयार्ड) ही मानते रहे हैं। वह मानते रहे हैं, कि अघोषित रूप से यह क्षेत्र अमेरिकी प्रभाव का क्षेत्र है। जिसका उनके लिये आर्थिक, सामरिक एवं कूटनीतिक महत्व है।

यूएस आर्मी वाॅर कालेज के जरनल ‘पैरा मीटर‘ में कर्नल माॅर्गन के आलेख के अलावा वाॅर काॅलेज के प्रोफेसर आर इवान एलिस का एक आलेख- ‘द स्ट्रैटेजिक रेलिवेन्स आॅफ लैटिन अमेरिका फाॅर द यूनाइटेड स्टेट‘ भी प्रकाशित हुआ है। जिसमें लातिनी अमेरिकी देशों में चीन की सैन्य उपस्थिति को कठोरता पूर्वक सवाल की तरह खड़ किया गया है।

आलेख में लिखा गया है, कि ‘‘इस मुद्दे को यदि सेना के नजरिये से देखा जाये तो लैटिन अमेरिका एक अनधिकृत ऐसा बड़ा क्षेत्र है, जहां से संयुक्त राज्य का निरिक्षण एवं निगरानी की जा सकती है। ऐसे में इस महत्वपूर्ण क्षेत्र का शत्रु के कब्जे में होना संयुक्त राज्य और उसकी सेना के लिये ऐसा खतरा होगा, जिसे स्वीकार नहीं किया जा सकता है। इसलिये शत्रु को ऐसा करने से रोकने के लिये अमेरिका को अपनी पूरी क्षमता एवं संसाधन को लगाते रहना चाहिये। ऐसा न करना संयुक्त राज्य के लिये, गंभीर गल्ती होगी।‘‘ प्रो0 एलिस का मानना है, कि संयुक्त राज्य सीमित समय अवधि के लिये यदि रूस और चीन के मौजूदा चुनौतियों के लिये लातिनी अमेरिका की बदलती हुई परिस्थितियों पर कम ध्यान देता है, तो शायद यह ठीक हो, लेकिन यह नीति यदि लम्बी अवधि तक चलती है, तो यह अमेरिका को अस्थिर करने का सबसे बड़ा कारण बन सकता है। प्रो0 एलिस ने कहा कि ‘‘पेंटागन लातिनी अमेरिका को मादक पदार्थों के लिये संगठित अपराध और सीमा क्षेत्र के मुद्दे के तहत देखना बंद करे। उसकी जगह साम्राज्यवादी रणनीतिक सिद्धांत के आधार पर देखें। यह जरूरी है, कि इस गोलार्द्ध में उभरते हुए शक्तिशाली कारकों को खत्म किया जाये, जोकि इस क्षेत्र का उपयोग संयुक्त राष्ट्र को हानि पहुंचाने के लिये कर रहे हैं, या फिर दुनिया के दूसरे हिस्से में, भविष्य में होने वाले संघर्ष में, अमेरिका की क्षमता को कम करने के लिये करेंगे, या कर सकते हैं।‘‘

इस तरह प्रो0 एलिस का मानना है, कि लातिनी अमेरिका पर संयुक्त राज्य का वर्चस्व उसके वैश्विक वर्चस्व के लिये जरूरी है। यदि अमेरिका ऐसा नहीं करता है, तो यह उसके साम्राज्य के लिये बड़ा संकट होगा। वो रूस आौर चीन की मौजूदगी को लातिनी अमेरिकी देशों में स्थायी रूप से समाप्त करने के पक्ष में है।

आज से लगभग ढाई साल पहले, अमेरिकी विदेश मंत्री जाॅन कैरी ने ‘आॅर्गनाइजेशन आॅफ अमेरिकन स्टेट‘ की बैठक में घोषणा की, कि ‘‘मुनरो सिद्धांत का युग समाप्त हो गया है।‘‘

यह वह सिद्धांत है, जो लगभग 200 सालों से अमेरिकी विदेश नीति का आधार रहा है, जो वाशिंगटन को यह अधिकार देता है, कि पश्चिमी गोलार्द्ध में बाहरी ताकतों को अपना पैर जमाने से रोकने के लिये सेना का उपयोग कर सकता है।

अपने शुरूआती दौर में इस सिद्धांत का उपयोग वाशिंगटन ने लातिनी अमेरिका में उपनिवेशवाद से स्वतंत्र हुए उन देशें के पक्ष में यूरोपीय साम्राज्यवाद के खिलाफ किया, जो नव उपनिवेशवाद की पुर्नस्थापना उन स्वतंत्र देशों में करना चाहते थे। किंतु आगे चल कर ‘मुनरो सिद्धांत‘ को ‘अपने प्रभाव क्षेत्र के सिद्धांत‘ में बदल दिया गया। परिणाम स्वरूप इस क्षेत्र में लगभग 50 ऐसी सैन्य कार्यवाहियां हुई, जिसमें सीआईए के समर्थन से सैन्य तख्तापलट किया गया। 20वीं सदी के उत्तरार्ध के ज्यादातर समय में इस सिद्धांत के अंतर्गत फासिस्ट एवं सैन्य तानाशाही को लातिनी अमेरिकी देशों पर थोप दिया गय।

इस क्षेत्र के तमाम तख्तापलट और फाॅसिस्ट एवं सैनिक तानाशाही के मूल में पेंटागन और सीआईए के होने को अमेरिकी प्रशासन का खुला समर्थन मिला। जिसके खिलाफ जनअसंतोष लगातार बढ़ता रहा। फाॅसिस्ट तानाशाही के खिलाफ व्यापक जनसंघर्ष हुए। आम जनता और समाजवादी ताकतों ने जनसमर्थक सरकारों की स्थापना की, आज जिनके खिलाफ अमेरिकी साम्राज्यवाद है।

आर्मी वाॅर काॅलेज के द्वारा विकसित किये जा रहे सिद्धांत से यह बात अपने आप सुनिश्चित होती जा रही है, कि पेंटागन ‘मुनरो सिद्धांत‘ को फिर से शुरू करना चाहता है, और चीन के खिलाफ इस सिद्धांत का उपयोग करने की ओट में अमेरिकी सैन्यकरण को, सही करार दे रहा है।

यह इस बात की खुली चेतावनी है, कि तीसरे विश्वयुद्ध का जो खतरा अमेरिका और विश्व पूंजीवाद के संकटग्रस्त होने से गहराता जा रहा है, उससे, अमेरिकी नीतियों की वजह से, लातिनी अमेरिकी देश भी बरी नहीं रहेंगे। इस महाद्वीप की सम्बद्धता तय सी हो गयी है।

पिवोट टू एशिया ने जिस तरह एशिया में राजनीतिक अस्थिरता और युद्ध के खतरे को बढ़ाने का काम किया है, ठीक उसी तरह ‘पिवोट टू लैटिन अमेरिका‘ दक्षिण अमेरिकी महाद्वीप में राजनीतिक अस्थिरता और युद्ध के खतरे को बढ़ा सकता है। आर्थिक समझौतों के साथ सामरिक संधियों की नीतियां विस्तार पा चुकी हैं। विश्व का सामरिकरण हो गया है।

लातिनी अमेरिकी देशों के बहुधु्रवी विश्व की अवधारणां को अमेरिकी साम्राज्यवाद ने एक नये खेमे में बदल दिया है, जिसका नेतृत्व रूस और चीन के हाथों में है। विश्व दो खेमों में बंट गया है। सैन्यकरण तेजी से हो रहा है। 2014 में विश्व का सैन्य खर्च 1.7 ट्रिलियन डाॅलर था, जिसमें अमेरिकी सकरार घोषित रूप से 609.9 बिलियन डाॅलर खर्च करती है। जिसके सैन्यकरण और सैन्य खर्च को रोका नहीं जा सकता है, क्योंकि अमरिकी डाॅलर की हालत रोज बिगड़ती जा रही है, और युद्ध उसकी अनिवार्यता है। पूंजीवादी साम्राज्यवाद युद्ध के बिना जी नहीं सकता है।

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