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ट्रांस पैसेफिक पार्टनरशिप को अमेरिकी स्वीकृति

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राष्ट्र के नाम अपने आखिरी सम्बोधन में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने 12 जनवरी को, ‘ट्रांस पैसेफिक पार्टनरशिप‘ के बारे में उसके पूरा होने के बारे में, जानकारी दी। ओबामा ने कहा- ‘‘संयुक्त राज्य अमेरिका ने ‘ट्रांस पैसेफिक पार्टनरशिप‘ -मुक्त व्यापार समझौता- पर समझौता वार्तायें की, ताकि एशिया में अमेरिका की स्थिति को मजबूत किया जा सके, और चीन के द्वारा उस क्षेत्र को अपने ही बनाये नियम और तरीकों से चलाने की क्षमता को कम किया जा सके।‘‘

जिस तरह ‘पिवोट टू एशिया‘ चीन के विरूद्ध एशिया में अमेरिकी नीति है, ठीक उसी तरह ‘ट्रांस पैसेफिक पार्टनरशिप‘ को उन्होंने चीन की क्षमताओं और उसके विस्तार को रोकने की नीति के रूप में रेखांकित किया। जिसमें ‘ब्रिक्स देशों‘ (रूस, चीन, भारत, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका) को बाहर रखने का निर्णय पहले ही लिया जा चुका है। वैश्विक स्तर पर ‘ब्रिक्स देश‘ अमेरिका के लिये आर्थिक, सामरिक एवं कूटनीतिक चुनौती है। ओबामा का पूरा कार्यकाल इन देशों की चुनौतियों से लड़ने और अमेरिकी हितों के लिये ताल-मेल बैठाने में बीता है। जिसमें उन्हें कोई भी उल्लेखनिय सफलता नहीं मिली।

एशिया, लातिनी अमेरिका और अफ्रीका में चीन और रूस ने अमेरिकी मनमानी को ही नहीं, अमेरिकी हितों को रोकने का काम किया। यूरोप में यूक्रेन का मुद्दा अमेरिका और यूरोपीय संघ के लिये निर्णायक प्रमाणित नहीं हुआ, बल्कि क्रीमिया का रूसी संघ में विलय हो गया और पूर्व सोवियत संघ के सदस्य देशों के बीच आपसी साझेदारी बढ़ी और शंघाई सहयोग संगठन भी मजबूत हुआ। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने अपनी वैश्विक वरियता कायम की। रूस पर लगाये गये अमेरिकी और यूरोपीय संघ के प्रतिबंधों ने रूस को कूटनीतिक बढ़त दी और अंतराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में जारी गिरावट का प्रभाव रूस सहित अन्य तेल उत्पादक देशों पर ही नकारात्मक नहीं पड़ा, बल्कि विश्व अर्थव्यवस्था के सामने भी गंभीर चुनौतियों और संकटों को खड़ा किया। अमेरिका के सउदी अरब जैसे सबसे बड़े तेल उत्पादक देशों की अर्थव्यवस्था भी कमजोर हुई। चीन के वित्तीय संकट ने विश्व अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया। जिससे ट्रांस पैसेफिक पार्टनरशिप के सदस्य देश भी प्रभावित हुए।

ओबामा ने अपने वक्तव्य में कहा- ‘‘हमने ट्रांस पैसेफिक पार्टनरशिप का निर्माण किया, ताकि बाजार को खोला जा सके, काम करने वालों और पर्यावरण को संरक्षित किया जा सके, और एशिया में अमेरिकी नेतृत्व को विस्तार दिया जा सके।‘‘ उन्होंने इस बात की घोषणां की कि ‘‘इस समझौते के साथ ही इस क्षेत्र के नियमों का निर्धारण चीन नहीं अमेरिका करेगा।‘‘ पेंटागन की तरह ही ओबामा की कोशिश एशिया में चीन की चुनौतियों को समाप्त करने की है। पेंटागन तो एशिया ही नहीं लातिनी अमेरिका में भी यही चाहता है।

ओबामा की घोषणां अपने आप में इस बात का प्रमाण हैं, कि मुक्त व्यापार के नये क्षेत्रों का निर्माण करने वाले -चीन एवं रूस की बढ़ती हुई साझेदारी को रोकने की कोशिश ‘ट्रांस पैसेफिक पार्टनरशिप‘ है। जिसमें अमेरिका की ओट में वैश्विक वित्तीय ताकतों का हित है। जिसके तहत सदस्य देशों की सरकारों के पास भविष्य में इस साझेदारी से अलग होने के अधिकारों का अंत हो जायेगा और उनके वित्त एवं बाजारों पर वित्तीय ताकतों का कब्जा होगा। कह सकते हैं कि ‘पूंजी राज्य की सरकारों से मुक्त होंगी।‘

अक्टूबर 2015 में प्रशांत क्षेत्र के 12 देश इस संधि के लिये सहमत हो गये। जिसका घोषित लक्ष्य उनके आपसी व्यापार के नियमों को हटाना है।

अमेरिका सहित इस व्यापार संधि के सदस्य देशों की सरकारों ने, जिस तरह अपने देश की जनता और विश्व समुदाय से संधि की शर्तों और वार्ताओं को छुपा कर रखा और जिस तरह आम लोगों की सहमति-असहमति की अनदेखी की गयी, उससे यह संधि हमेशा से विवादास्पद रही। गुप्त वार्ताओं के कई दौर पिछले 7 सालों तक चले। इसकी घोषणां होने के बाद भी ट्रांस पैसेफिक पार्टनरशिप के बारे में पूरी जानकारी सम्बद्ध देशों की जनता और विश्व समुदाय के सामने आज भी नहीं है।

सम्बद्ध देशों की सरकारों को अपने देश की संसद -कांग्रेस- से इस समझैते को पारित कराने की औपचारिकता अभी भी बाकी है। 2016 के शुरूआती महीनों में ही ओबामा को अमेरिकी कांग्रेस से इसे पारित कराना है। न्यूजीलैण्ड की संसद ने इसे पारित कर दिया है।

चीन के व्यापार मंत्री ने दिसम्बर 2015 में कहा था, कि ‘‘ट्रांस अटलांटिक पार्टनरशिप और ट्रांस पैसेफिक जैसे बड़े पैमाने पर किये गये समझौते ‘विश्व व्यापार संगठन‘ के मूल उद्देश्य के खिलाफ है।‘‘ उन्होंने स्पष्ट किया कि ऐसी साझेदारी सम्बद्ध देशों के हितों से संचालित होती है, जो विश्व व्यापार के हितों को सुरक्षित करने के विश्व व्यापार संगठन के विरूद्ध है।

वर्तमान वैश्विक संरचना और उसकी बाजारवादी वैश्विक अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी विसंगति यह है, कि वह अमेरिकी वर्चस्व और वैश्विक वित्तीय ताकतों के हितों से संचालित होने वाली ऐसी व्यवस्था है, जिसके पास अपनी समस्याओं का कोई समाधान नहीं है। चाह कर भी वह बढ़ती हुई आर्थिक असमानता, राजनीतिक दीवालियापन और क्षेत्रीय असंतुलन को रोकने की स्थिति में नहीं है। ओबामा ने भले ही तीसरे विश्व युद्ध की आशंकाओं को खारिज किया है, किंतु अमेरिकी नीतियों की स्वाभाविक प्रतिक्रिया उसके विपरीत है। चीन और रूस के खिलाफ उसकी आर्थिक एवं सामरिक घेराबंदी एक बड़े युद्ध को रोज करीब ला रही है। स्थितियां विस्फोटक हैं। विश्व को अमेरिकी हितों से संचालित करने का दौर अब बीत चुका है।

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