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दिल्ली का एक दिन, चंद घंटे

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दिल्ली का एक दिन, चंद घंटे!

दिन सोमवार, 15 फरवरी 2016

घण्टों का हिसाब मैं नहीं दे पाऊंगा, बस मेरे पास वारदातें हैं, वह भी सुनी हुई, चैनलों पर देखी हुई और सोशल मीडिया पर हो रही चर्चाओं से जानी हुई। अखबारों ने भी कुछ न कुछ दिया ही है। हालांकि खबरों को छांटना जितना मुश्किल इन दिनों हुआ है, पहले कभी नहीं था।

समाचार चैनलों पर हो रही चर्चाओं और जारी ‘वीडियो‘ गेमों का जो सिलसिला है, वह अपने आप में इस बात का प्रमाण है, कि कंेंद्र की सरकार अपने राजनीतिक दल और सहयोगी संगठनों, तथा मीडिया (सरकार समर्थक मडिया) के साथ मिल कर राष्ट्रवादी (घोर) जुनून पैदा करना चाहती है। कर रही है।

जेएनयू को लेकर मीडिया वाॅर चल रहा है।

ज्यादातर चैनलों पर जो वीडिया दिखाये जा रहे हैं, उनमें आवाजें नहीं हैं, फिर भी लिख कर बताया जा रहा है, कि यह बोला जा रहा है।

हमारे दिमाग में वही बात बैठाई जा रही है, जो सरकार चाहती है। उसके सहयोगी चाहते हैं।

आम लोगों के दिमाग को अपने कब्जे में किया जा रहा है। लोगों में भय बैठाया जा रहा है, कि जेएनयू राष्ट्रद्रोहियों का गढ़ है। वहां पाकिस्तान समर्थक रहते हैं। उनके नायक आतंकवादी हैं।

कुल मिला कर बात इतनी है, कि इस किले को ध्वस्त कर देना चाहिये। ऐसे लोगो को कुचल देना चाहिये।

गृहमंत्री राजनाथ कहते हैं- ‘‘पुलिस को पूरी छूट है।‘‘ और पुलिस उसका फायदा भी उठा रही है। गृहमंत्री तक बे-बुनियाद बातें कर रहे हैं, देश की जनता से झूठ बोल रहे हैं। दिमाग में बैठाया जा रहा है, कि ‘‘हाफिज सईद (आतंकी) का समर्थन प्रदर्शनकारियों को हासिल है।‘‘ हालांकि हाफिज सईद को खुद हैरत है।

जहां आतंकवादी पैदा नहीं हो सकते, उस विश्व विद्यालय को अतांकवादियों का गढ़ बताया जा रहा है। क्योंकि, वहां की हवाओं में वामपंथ है। एआईएसएफ में आतंक हैं। छात्र संघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार देशद्रोही है।

जेएनयू परिसर को सैनिक छावनी में बदल दिया गया है। सभी निगरानी में हैं। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद -एबीवीपी के हुडदंगियों को ‘क्लीन चिट‘ है। हर तरीके से समझाया यही जा रहा है, कि भाजपा देशभक्त है। संघी देशभक्त हैं। एबीवीपी देशभक्त है। ऐसे ही देशभक्तों से यह सरकारें बनी हैं। सरकार देशभक्त है। और जो इनके साथ, इनके पक्ष में नहीं हैं, वह देशद्रोही हैं। आतंकी हैं। आतंकवाद समर्थक हैं।

और यह मान कर चला जा रहा है, कि आम लोगों पर इस प्रचार का असर है।

एक दिन के चंद घण्टों की वारदातों का जिक्र करने से पहले चंद सवाल-

देशद्रोह के गलत आरोपों और देश विरोधी नारों को एकसाथ उछाला जा रहा है, क्या इसलिये कि गलत आरोपों को सही ठहराया जा सके?

अफजल गुरू के लिये आयोजित कार्यक्रम में छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार का वहां दिखना यदि राष्ट्रद्रोह है, तो एबीवीपी के लोगों का वहां दिखना देशद्रोह क्यों नहीं?

तर्क के लिये एबीवीपी वहां विरोध कर रही थी, तो आपसे यह किसने कहा कि छात्रसंघ के अध्यक्ष और उनके समर्थक वहां समर्थन करने गये थे?

यदि अफजल गुुरू को दी गयी फांसी को गलत कहना देशद्रोह है, तो गांधी जी के हत्यारे नाथूराम गोडसे को ‘देशभक्त‘ कहना, देशद्रोह क्यों नहीं?

जिस पीडीपी ने अफजल गुरू को दी गयी फांसी को गलत और अफजल गुरू को सही बताया, उस राजनीतिक दल के साथ भाजपा का कश्मीर में सरकार बनाना, गलत और राष्ट्रद्रोह क्यों नहीं है?

न्याय और न्यायायिक कार्यवाही से पहले ही यह फतवा क्यों जारी किया जा रहा है, कि जेएनयू में आतंकी हैं और कन्हैया कुमार देशद्रोही है?

और सबसे बड़ी बात- सबसे अहम् सवाल-

भाजपा, संघ और एबीवीपी को यह अधिकार किसने दिया कि वह देशभक्त और देशद्रोही का सनद बांटे?

क्या इस देश को अपना मानने के लिये -जोकि हमारा है- देशभक्ति का प्रमाण पत्र संघ और भाजपा से लेना होगा?

क्या मीडिया वार और भाजपा के नजरिये से तय होगा, कि कौन देशभक्त और कौन देशद्रोही है?

जबकि हम जानते हैं, कि फोटो शाॅप और बिके हुए लोग भी बाजार में हैं।

जबकि हम जानते हैं, कि इस देश में राष्ट्रीय-बहुराष्ट्रीय वित्तीय ताकतों की मंसा क्या है? और बिके हुए दलाल क्या चाहते हैं?

हमारे लिये जेएनयू सिर्फ जेएनयू नहीं है।

हमारे लिये कन्हैया कुमार सिर्फ कन्हैया कुमार नहीं है।

हमारे लिये दिल्ली सिर्फ दिल्ली नहीं है।

हमारे लिये संघ और भाजपा सिर्फ संघ और भाजपा नहीं है।

हमारे लिये देशद्रोह और देशभक्ति निजी वित्तीय पूंजी और फासिस्ट ताकतों का देश पर किया गया हमला है।

हिटलर भी देशभक्त (जर्मन प्रेमी ) ही था। और समाजवादियों को उस समय भी देशद्रोही (जर्मनी विरोधी) ही कहा गया था।

यहां मुद्दा पाकिस्तान, अफजल गुरू या हाफिज सईद नहीं है।

मुद्दा यह है, कि भारत में वामपंथ को बे-बुनियाद कैसे किया जाये? कैसे जेएनयू को खत्म किया जाये?

मोदी सरकार मुंह से बड़ा कौर अपने मुंह में ठूंस चुकी है।

दिल्ली का एक दिन, चंद घण्टे

दिन सोमवार, 15 फरवरी 2016

जगह- पटियाला हाउस न्यायालय परिसर।

img-20160215-wa0003हिरासत में लिये गये जेएनयू छात्र संघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार को, पुलिस को अदालत में पेश करना था। चंद जेएनयू प्रोफेसर और छात्र (बाद में पता चला 4 प्रोफेसर और 6 छात्र) न्यायालय परिसर में पहुंच गये। 4 लोग कोर्ट के अंदर गये, शेष बाहर बैठे थे। पटियाला हाउस कोर्ट के वकीलों ने इन पर हमला बोल दिया। देशद्रोही, देशद्रोही का साथी कहा। जेएनयू तुम्हारा नहीं। मार-पीट हुई।

पत्रकारों ने हंस्तक्षेप किया और वो पिटे। रिकार्डिंग फुटेज सभी तोड़ दिये गये।

पुलिस ने अच्छा काम किया।

अच्छे दर्शक बने रहे।

और हरकत में आये तो छात्रों को हिरासत में ले लिया।

इस वारदात के दौरान वित्त मंत्री अरूण जेटली अपने केस के सिलसिले में बगल के कोर्ट में उपस्थित थे। उनके लिये कड़ी सुरक्षा व्यवस्था थी।

हुक्मरां सुरक्षित हैं। पिटने के लिये आम लोग हैं।

नये तथ्य का खुलासा हुआ कि पुलिस की वर्दीगिरी चलती है और राजनेताओं की तरह वकील भी भुजबल हैं। न्याय की देवी सबल हाथों में है।

op-sharma-jnu-student-attack759और इन हाथों का कमाल भाजपा विधायक ओ.पी. शर्मा ने भी दिखाया। उन्होंने न्यायालय परिसर के सामने सड़क पर खुले आम भाकपा कार्यकर्ता अमीक जमई को पीट दिया। उसी दौरान एक टेलीविजन पत्रकार को भी पीटा गया। अच्छी खबर है, गुण्डागर्दी का भी उदारीकरण हो गया है।

सुबह का अखबार यदि आपने देखा होगा, तो आपको जरूर लगेगा कि यह सिलसिला अभी थमने को नहीं है। मीडिया ने अमित शाह के प्रेस कांफ्रेन्स को तवज्जो दी। जिसमें उन्होंने राहुल गांधी को निशाना बनाया। कांग्रेस पर सवाल दागे। जबकि सवाल भाजपा पर खड़ा है। इस देश की सरकार पर और उन फासिस्ट ताकतों पर खड़ा है, जो लोकतंत्र की बुनियाद उखाड़ रहे हैं। जिनके लिये देश और देशभक्ति समाज के हितों के विरूद्ध वित्तीय ताकतों का हित और राजनीतिक एकाधिकार है।

दिल्ली का यह एक दिन और चंद घंटे 1975 के सालों को ले कर लौट आया। जिसे यदि दिल्ली में ही नहीं रोका गया तो फासिस्ट हमले देश के गली-मुहल्लों में भी होंगे, और यह हमले यकीन जानें सिर्फ वामपंथियों पर नहीं होंगे, जो हाथ बांधे या तो खड़े हैं या अनासक्त खबरों को पढ़ या देख रहे हैं। संकट जवाहरलाल नेहरू विश्व विद्यालय पर नहीं, ना ही हिरासत में लिये गये कन्हैया कुमार पर है, बल्कि संकट में देश और आवाम है।

मुद्दे गढ़े गये हैं, अफज़ल गुरू हमारे लिये मुद्दा नहीं है।

 

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