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राज्य के वर्चस्व की पुर्नस्थापना का सवाल

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सोच की स्तर पर समाजवाद पूंजीवाद का विकल्प और समाज के विकास की उच्च अवस्था है।

होना भी यही चाहिये।

किंतु, संकट और संक्रमण के इस दौर में, -जब वैश्विक वित्तीय ताकतों ने निर्णायक बढ़त हासिल कर ली है, और वैश्विक वित्तीय संकट का प्रभाव 21वीं सदी के समाजवादी सरकारों को भी ध्वस्त कर रही है- यह सोचने का आधार ही खत्म होता जा रहा है, कि कोई वैकल्पिक व्यवस्था हो सकती है, या सामाजिक विकास की अगली अवस्था के निर्माण के लिये ‘विकास के जरिये समाजवाद‘ में व्यावहारिक संभावनायें बची हैं।

वैकल्पिक व्यवस्था की बातें करें तो पूंजीवादी बाजारवाद के संकट के साथ गैर-पूंजीवादी वित्त व्यवस्था भी संकटग्रस्त है। यह संकट पूंजीवाद का ही संकट है, जो लगातार बढ़ रहा है। उभरती हुई अर्थव्यवस्था का सहारा चीन के साथ ही मर रहा है। ब्रिक्स देशों की वैकल्पिक विश्व व्यवस्था की संभावनायें कमजोर पड़ गयी हैं। बहुध्रुवी विश्व और विकास के जरिये समाजवाद लातिनी अमेरिकी एवं कैरेबियन देशों में मुक्त व्यापार और नव उदारवादी वैश्वीकरण के हंथियारों से बुरी तरह जख्मी है। साम्राज्यवादी ताकतों ने प्रतिक्रियावादी ताकतो को साध लिया है। समाजवादी सरकारों की वास्तविक स्थिति चीन के वित्तीय संकट के चपेट में है। स्थितियां जटिल हैं। पूंजीवाद आम संकट से घिरा हुआ है। कह सकते हैं, कि हमारे सामने संभावनाओं का कोई स्वरूप नहीं है।

हम सोच के साथ वस्तुस्थिति की चर्चा कर रहे हैं, इसलिये यह सोचने की जल्दबाजी नहीं होनी चाहिये कि माक्र्सवाद के पक्ष में हमारी चिंतनधारा कमजोर पड़ रही है, या हम वर्तमान विश्व व्यवस्था को बचाने का कोई तिकडम भिड़ा रहे हैं, या दावोस के लोगों -वल्र्ड इकोनाॅमिक फोरम- के सामने विश्व समुदाय और वैश्विक जनशक्ति को कमजोर बना रहे हैं।

नहीं! ऐसा नहीं है।

हम सोच आौर समझ के स्तर पर आंख बंद करना नहीं चाहते।

इस व्यवस्था का बदलना तय है, और हम यह मानते हैं, कि मार्क्सवाद समाजवाद ही समाज विकास की सही दिशा है। सर्वहारा वर्ग की तानाशाही से किनाराकशी नहीं किया जा सकता। पूंजी पर राज्य के नियंत्रण की अनिवार्यता से हम अपना पीछा नहीं छुड़ा सकते। राजकीय पूंजीवाद को समाजवादी व्यवस्था का आधार बनाना, हमारी तात्कालिक विवशता है, क्योंकि अर्थव्यवस्था के निजीकरण ने वैश्विक संकट को विस्फोटक बना दिया है, और विकल्पों को भी आम लोगों के हाथों से छीन लिया है। वित्तीय ताकतों ने राज्य की सरकारों को अपना साझेदार बना लिया है।

समाज के विकास में राज्य एक शोषक इकाई है, और शोषणविहीन समाज के लिये राज्य के अंत की अनिवार्यता मार्क्सवाद की अपनी स्थापना है। मार्क्स ने राज्यविहीन विश्व की अवधारणां को बीज रूप में रखा, जिसे साम्यवादी विश्व में ही हम प्राप्त कर सकते हैं। सर्वहारा क्रांति राज्य के शोषक रूप के विरूद्ध है और लेनिन ने समाजवाद की स्थापना के लिये ऐतिहासिक विकास के समाजवादी चरण को एक कदम पीछे रख कर अपने नये आर्थिक कार्यक्रम में सोवियत संघ के समाजवादी समाज के निर्माण के लिये राज्य के इजारेदारी को मान्यता दी जिसके तहत राज्य के शोषक स्वरूप का खात्मा भी स्टाॅलिन ने किया। उन्होंन जनसमर्थक सरकार की स्थापना की।

आज वित्तीय ताकतों ने राज्य की सरकारों से साझेदारी गांठ कर उसके शोषक स्वरूप को नया रूप दे दिया है। सरकारें आम जनता के विरूद्ध इन ताकतों की चाकरी कर रही हैं। युद्ध, संधि और व्यापारिक समझौतों के मूल में भी इन्हीं ताकतों का हित है। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने ‘ट्रांस पैसेफिक पार्टनरशिप‘ को अमेरिकी वर्चस्व को बनाये रखने के पक्ष में मुक्त व्यापार के लिये करार बताया, जबकि सम्बद्ध देशों के हाथों से वित्तीय शक्तियां ही नहीं, वैधानिक शक्तियां भी छिन जायेंगी और वो शक्तियां दैत्याकार कम्पनियों और काॅरपोरेशनों के हाथों में होंगी। राज्य की सरकारों इतनी बौनी हो जायेंगी कि राज्यों की अनिवार्यता ही खत्म हो जायेगी।

इसलिये राज्य के वर्चस्व को समाजवादी तरीके से खत्म करने के लिये, बाजार के विरूद्ध राज्य के वर्चस्व की समाजवादी लड़ाई हमें लड़नी ही होगी। जनसमर्थक सरकारों की अनिवार्यता बढ़ गयी है।

यह सवाल हो सकता है, कि समाजवाद के लिये राज्य की अनिवार्यता क्यों है? जबकि वह एक शोषक इकाई है।

वर्ग विभाजित समाज में राज्य की अनिवार्यता बनी रहेगी।

मार्क्स ने ‘गोथा कार्यक्रम की आलोचना‘ और लेनिन ने ‘राज्य और क्रांति‘ में इस बात का उल्लेख किया है।

जिस वर्ग का राज्य की सरकार पर अधिकार है, राज्य उसी के पक्ष में काम करती है। यह एक ऐसी इकाई है, जिसका स्वरूप विवादहीन रूप से शोषण और दमन है। वह शोषण और दमन के बिना न तो जीवित रह सकती है, ना ही संदर्भित रह सकती है।

पूंजीवाद को अंतिम रूप से ध्वस्त करने के लिये समाजवादी नेतृत्व में राजकीय पूंजीवाद कारगर हंथियार रहा है। सोवियत संघ में यही हुआ और यहीं ऐतिहासिक भूलें भी हुईं। जिसकी शुरूआत लेनिन ने की थी, -‘पूंजीवाद को ध्वस्त करने और समाजवाद का निर्माण करने की‘ उसे स्टाॅलिन ने सर्वहारा वर्ग की तानाशाही और राजकीय पूंजीवाद के जरिये हासिल किया। उन्होंने सर्वहारा वर्ग की तानाशाही में राजकीय पूंजीवाद को खत्म भी किया और सही अर्थों में समाजवादी समाज का निर्माण कार्य भी शुरू किया।

‘विकास के जरिये समाजवाद‘ में ये दोनों ही स्थितियां नहीं होतीं। न तो सर्वहारा वर्ग की तानाशाही होती है, ना ही यह घोषणां होती है, कि पूंजीवाद को ध्वस्त किया जा चुका है। विकास के जरिये समाजवाद में पूंजीवाद की सांसें चलती रहती हैं, और यह सुनिश्चित भी होता रहता है, कि पूंजी पर राज्य का नियंत्रण कायम हो। वेनेजुएला में शाॅवेज ने यही किया। उन्होंने सरकार को आम जनता के पक्ष में खड़ा किया और ऐसी सरकार को समाजवादी भी कहा। जो उनके असामयिक निधन के साथ ही संकटग्रस्त हो गया है। राष्ट्रपति निकोलस मदुरो की सरकार के सामने प्रतिक्रियावादी ताकतों की गंभीर चुनौती है, जिन्हें नेशनल असेम्बली में अब बहुमत भी हासिल हो गया है। संभव है, कि सरकार, फिर से शोषण और दमन का जरिया बन जाये। क्योंकि वैश्विक वित्तीय ताकतों ने विश्व की ज्यादातर देशों की सरकारों को अपने कब्जे में ले लिया है। वैश्विक अर्थव्यवस्था उनके कब्जे में है।

वास्तविक रूप में, इन वित्तीय ताकतों ने आर्थिक रूप से राज्य केे वर्चस्व को तोड़ दिया है, और उसकी राजनीतिक संरचना को अपने पक्ष में खड़ा कर लिया है। राज्य के वर्चस्व की पुर्नस्थापना का सवाल, समाजवादी नजरिये से भी गंभीर हो गया है। क्या यह संभव है? का सवाल भी हमारे सामने है, जबकि वैश्विक स्तर पर पूंजीवाद संकटग्रस्त है, और अपनी मुसीबतों से पार पाने की क्षमता वह खो चुका है, और समाजवाद का निश्चित स्वरूप भी हमारे सामने नहीं है, और जो है, वह भी पूंजीवाद के मलबों के नीचे आता जा रहा है।

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