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वामपंथियों के विरूद्ध संवैधानिक राष्ट्रवाद

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देश की मोदी सरकार को हर बात की जल्दी है। उसकी हरकतें या तो पैरोल में छूटे अपराधियों की तरह है, या उन लोगों की तरह है, जिनके सामने सत्ता मे बने रहने की शर्ते हैं। वह शर्तो की बाधा दौड़ को जी जान से पूरा करने में लगी है। उसे वित्तीय ताकतों के हितों को भी पूरा करना है, और आम जनता को भी अपने पक्ष में बनाये रखना है। उसे वित्तीय ताकतों के सामने घुटने भी टेकना है, और आम जनता के सामने खड़ा भी रहना है। उसने ‘राष्ट्रवाद‘ को थाम लिया है। जिसके तहत कुर्बानी लेना कुर्बानी देने से ज्यादा आसान होता है।

आपने देखा होगा, कुर्बानी में न देव, न खुदा का बाल बांका होता है, ना ही पुजारी या मौलवी की जान जाती है, मारा बकरा जाता है। जान आम लोगों की जाती है। आम लोगों की फिक्र करने वालों की जान जाती है। मगर देव और पुजारी, खुदा और मौलवी का यश बढ़ता है, शबाब बढ़ता है।

भाजपा, संघ और सरकार की योजना राष्ट्रवाद को जुनून बनाने की है। राष्ट्र और राष्ट्रप्रेम को उन्माद में बदलने की है। ऐसा करके ही वह देश की आम जनता के सामने खड़ी नजर आ सकती है, और वित्तीय ताकतों के सामने घुटनों के बल भी रह सकती है। इस मामले में उनकी शराफत और उनकी सज्जन्ता देखने लायक होती है। देश और राष्ट्र के प्रति उनकी देशभक्ति और राष्ट्रप्रेम देखने लायक होती है। वो निर्ममता, क्रूरता और अमानवीय होने की मिसालें ही नहीं रचते, उसकी हदों को लांघ जाते हैं।

भाजपा, संघ और मोदी सरकार की योजना यही है।

उसने अर्थव्यवस्था के निजीकरण को राष्ट्रीय नीति में बदल दिया है।

उसने सामाजिक द्वेष और जातीय हिंसा को बढ़ाने की गोटियां चल दी है।

उसने राजनीतिक एकाधिकार और वर्चस्व की लड़ाईयां शुरू कर दी है।

उसने देश की रजानीतिक संरचना को अपने राजनीतिक हित और वित्तीय ताकतों के हितों के लिये तोड़ना-मरोड़ना शुरू कर दिया है।

उसने अपने निशाने पर, घोषित तौर पर, यूं तो विपक्ष के कांग्रेस को रखा है, जो राष्ट्रीय-बहुराष्ट्रीय वित्तीय ताकतों के लिये उसका विकल्प बन सकती है, लेकिन उसके निशाने पर वामपंथी हैं। जो उसके श्रम कानून में संशोधन से लकेर भू-अधिग्रहण और विदेशी पूंजी निवेश की नीति के विरूद्ध है। जो देश में लोकतंत्र की हत्या और राजनीतिक फासिस्टवाद के विरूद्ध हैं। जिनसे सहमति का लेन-देन और सौदा नहीं हो सकता। जो हैं तो मुट्ठी-भर, मगर जिनकी जड़ें इस जमीन में हैं। वो देशभक्ति और राष्ट्रप्रेम का ढोंग नहीं रचते। उनके लिये राजनीति झूठ का अखाड़ा नहीं है। वो राजसत्ता से अभी काफी दूर हैं, फिर भी उन पर हमले हो रहे हैं।

भारत में वामपंथियों पर हो रहे हमलों की वजह सिर्फ दो ही हो सकती है-

  • पूंजीवाद और उसकी साम्राज्यवादी वैश्विक संरचना -जो संकटग्रस्त है- की वैकल्पिक व्यवस्था सिर्फ वामपंथियों के पास है। सोच, समझ और समाज व्यवस्था के स्तर पर वे ही विकल्प हैं। सरकार इस विकल्प को तोड़ना चाहती है।
  • मगर इस देश में वे सबसे आसान निवाला हैं। उन्हें खाया और पचाया जा सकता है। मीडिया और प्रचारतंत्र उनके पक्ष में नहीं। आम जनता के बीच उनकी पैठ कमजोर है। यह कड़वी सच्चाई है, कि वो एकजुट नहीं हैं, और इस देश में सरकार बनाने का वो विकल्प, आम जनता के लिये, नहीं है। इसके बाद भी उन्हें धोखा नहीं दिया जा सकता। वो पूंजीवादी राजसत्ता के चट्टे-बट्टे नहीं हैं। इसलिये, उन्हें गलत, समाज विरोधी और देशद्रोही बताया जा सकता है।

जिन राज्यों में विधान सभा चुनाव होना है, उनमें पश्चिम बंगाल और केरल में वाममोर्चा की सरकार रही है। राष्ट्रीय स्तर पर यदि तमाम वामपंथी राजनीतिक दलों के बीच एकजुटता हो तो वो सरकार के चुनावी जीत के लिये मुश्किले हैं। बिहार में मोदी सरकार यह देख चुकी है। भजपा यह जान चुकी है, कि मोदी के जलवा का जलाल काफी घट गया है। मोदी निरापद जीत नहीं है।

उसके वर्चस्व और एकाधिकार की राह में वामपंथी रोड़ा हैं। और उसने वामपंथियों को राजनीति की दूसरी पांत में खड़ा करके जेएनयू में विवादों को खड़ा कर दिया। उसने राष्ट्रवाद का हाथ थाम लिया।

अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में हुए संसद पर आतंकी हमले के अपराधी अफजल गुरू को अपना जरिया बनाया। न्यायालय के विवादित फैसले और लम्बी प्रतीक्षा के बाद दी गयी फांसी, उससे असहमति के आयोजन को अपना जरिया बनाया। उस विरोध आौर आयोजन को अपना जरिया बनाया, जिसे जेएनयू छात्रसंघ या एआईएसएफ या आईसा या किसी वामपंथी छात्र संगठन ने आयोजित नहीं किया था, मगर एआईएसएफ और वामपंथी छात्र संगठनों के छात्र और छात्र संघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार को अपना निशाना बनाया। ऐसे लोगों पर देशद्रोह का आरोप लगाया, उन्हें दिल्ली पुलिस ने हिरासत में लिया या फरार मान लिया, जो दोषी नहीं हैं।

हमले को ‘देशद्रोह बनाम देशभक्ति का मुद्दा‘ बना दिया, जबकि अपुष्ट ही सही, लेकिन इस बात के प्रमाण हैं, कि अफजल गुरू और पाकिस्तान के पक्ष में नारे लगाने वाले भाजपा के छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के छात्र थे। गृहमंत्री के रूप में राजनाथ सिंह ने बड़े ही पुख्ता तरीके से यह दावा भी कर दिया कि पाकिस्तान में रह रहे आतंकी हाफिज सईद का समर्थन हासिल था। जिसका कोई प्रमाण उनके पास नहीं है। दिल्ली पुलिस आयुक्त और खुफिया एजेन्सी -आईबी ने गृहमंत्री के इस बयान से अपना पल्ला झाड़ लिया है। आतंकी हाफिज सईद ने अपने ट्वीट में यहां तक कहा कि अपने लोगों में भ्रम फैलाने वाली सरकार ‘पठानकोट‘ और 26/11 के बारे में कितना सच बोल रही है?

भाजपा, संघ और सरकार के पास उसका अपना झूठ ही सच है। जेएनयू के बारे में भी वह ऐसा ही झूठ रच रही है। जिनकी देशभक्ति देश की आम जनता से जुड़ी हुई है, उन्हें देशद्रोही करार दे रही है। अपने किस्म की देशभक्ति फैलाने के लिये भगवा ब्रिगेड तैयार कर रही है और सभी भाजपा नेताओं को ‘संवैधानिक राष्ट्रवाद‘ (यह किस चिडि़या का नाम है? यदि आपको पता हो तो बतायें।) के लिये आक्रामक होने का निर्णय ले रही है। दिल्ली के विधायक ओपी शर्मा ने ‘डिमाॅन्सट्रेशन‘ दे दिया है।

संविधान में मूर्त या अमूर्त राष्ट्रवाद कहीं से न तो आक्रामक है, ना ही हिंदू राष्ट्रवादी हैं, जिसकी ओट में आक्रामक नेतृत्वकर्ता और भगवा ब्रिगेड खड़ा है। भाजपा यह मान कर चल रही है, कि विकास और राष्ट्रवाद का मुद्दा उसके हितों का खयाल रख सकता है, और लगे हाथ विरोधियों को परास्त भी कर सकता है। मगर चंद लोगों के विकास से देश का विकास संभव नहीं है, और खाल खींचने वाले राष्ट्रवाद की किसी को जरूरत नहीं है।

जेएनयू काण्ड ने भाजपा के कपड़े उतारना शुरू कर दिया है, लगे हाथ मोदी सरकार के भी कपड़े उतर रहे हैं। मुंह से बड़ा कौर ढूंसने की पीड़ा भी वह झेल रही है। ईमानदारी की बात करें तो ‘कौर‘ उगलने के अलावा उसके पास और कोई विकल्प नहीं है। भारतीय खुफिया एजेन्सी -आईबी- ने गृहमंत्री राजनाथ सिंह को आंतरिक रिपोर्ट पेश कर दी है। रिपोर्ट में कहा गया है, कि ‘‘दिल्ली पुलिस ने विश्वविद्यालय के छात्र संघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार पर देशद्रोह का मुकदमा लगाने में जल्दबाजी की। कन्हैया के भाषण की रिकाॅर्डिंग में देशद्रोह जैसा कोई बयान या नारेबाजी नहीं है।‘‘

इसके बाद भी भाजपा और संघ समर्थित पटियाला हाउस कोर्ट के वकीलों के एक जत्थे ने जिस तरह ‘भारत माता की जय‘ और ‘वंदेमातरम्‘ को आक्रामक रूप दिया और अपनी फाॅसिस्ट हरकतों को जायज ठहराते हुए पुलिस हिरासत और न्यायाल में कन्हैया कुमार पर हमला किया, उन्हें मारने की कोशिश की, वह अपने आप में खुली चेतावनी है, कि ‘‘वामपंथ पर हमला हो चुका है।‘‘ और वामपंथ पर जब भी हमला होता है, लोकतंत्र खतरे में पड़ जाता है। और यह खतरा बढ़ चुका है। इस देश में लोकतंत्र को सबसे बड़ा खतरा सत्तारूढ़ भाजपा की मोदी सरकार से है।

15 फरवरी को उन्होंने यही किया।

17 फरवरी को पटियाला हाउस कोर्ट परिसर में यही किया।

18 फरवरी को उन्होंने देश भर में यही किया, जिस दिन जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार और जेएनयू के पक्ष में देश भर में प्रदर्शन हुआ। विश्व के सैंकड़ों लोगों ने अपना समर्थन दिया।

सरकार के सामने इसे तोड़ने की चुनौती है।

और वामपंथियों के सामने इस चुनौती के खिलाफ लोकतंत्र और देश की आम जनता के साथ फाॅसिस्टवाद से संघर्ष की चुनौती है।

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