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(आम जनता को दिये जाने वाले) धोखे के खिलाफ

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मौजूदा दौर की ज्यादातर सरकारें बाजारवादी ताकतों का हाथ बंटाने के लिये, बस दो ही काम कर रही हैं-

1.    अपने आर्थिक एवं वैधानिक अधिकारों को बाजर के हवाले कर रही हैं,
2.    अपने देश की आम जनता को धोखा दे रही हैं।

यह धोखा, देश की सम्प्रभुसत्ता है।

यह धोखा, देश के लिये भक्ति है।

यह धोखा, अपने देश की सरकार बनाने का अधिकार है, और

यह धोखा, आर्थिक एवं सामाजिक विकास है।

और इस धोखे का एक ही मकसद है- राष्ट्रीय एवं बहुराष्ट्रीय वित्तीय ताकतों का हित।

आईये, हम देखें कि भारत की मौजूदा सरकार यह धोखा कैसे दे रही है?

हम पहले ही यह बात स्पष्ट कर दें कि इस धोखे में बाजारवादी वित्तीय ताकतें बराबर की हिंस्सेदार हैं।

और, इस धोखे के लिये मोदी सरकार ने अपनी भूमिका स्वयं ही तय की है। या कहें कि भारत में मोदी सरकार का होना ही वित्तीय ताकतों के शर्तों की मंजूरी है। जिसके सामने मुक्त व्यापार और बाजारवादी वैश्वीकरण का लक्ष्य है, जिसे पाने के लिये भाजपा और संघ ने अपने स्वदेशीकरण अवधारणां को लतिया दिया है। उन्होंने एक ऐसी व्यवस्था को मंजूरी दी है, जहां आम आदमी के लिये कोई जगह नहीं है। वह या तो उपभोक्ता है, या उत्पादन का श्रम साधन-बौद्धिक सम्पदा है।

यदि स्वीकृत मान्यताओं के तहत मान लें कि देश की सम्प्रभुसत्ता देश के आम लोगों -उसके नागरिकों- में नीहित होती है, तो जहां आम लोगों के लिये कोई सम्मानित जगह नहीं है, तो वहां सम्प्रभुसत्ता कहां रहेगी?

क्या उत्पादन के साधन और उपभोक्ता में कहीं सम्प्रभुसत्ता निवास करती है? या सम्प्रभुसत्ता उस देश के नागरिकों के द्वारा चुनी हुई सरकार की जुबान होती है? उसी से व्यक्त होती है?

यदि देश की सम्प्रभुसत्ता उस देश की चुनी हुई सरकार में है, तो सरकार बाजार की साझेदार हो गयी है। वह वित्तीय एवं व्यापारिक समझौते कर रही है। देश की अर्थव्यवस्था का निजीकरण कर रही है। देशी-विदेशी पूंजी निवेश के लिये आकर्षक योजनायें बना रही है। देश की प्राकृतिक सम्पदा, उसके बौद्धिक एवं शारीरिक क्षमताओं को बेच रही है।

जिसका सीधा सा मतलब निकलता है, कि सरकार देश की सम्प्रभुसत्ता का सौदा कर रही है।

इसे आप क्या कहेंगे? और कैसे महसूस करेंगे, कि देश की सम्प्रभुसत्ता हम जैसे लोगों में नीहित है? जबकि हमारी हिंस्सेदारी या मंजूरी कहीं नहीं है।

हमारी देशभक्ति दिखावे की चीज हो गयी है।

राहुल गांधी राष्ट्रपति से जेएनयू प्रकरण के सिलसिले में मिलते हैं, और मीडिया से बोलते हैं ‘‘राष्ट्रप्रेम हमारे खून, हमारे दिल में है।‘‘

भाजपा भी राष्ट्रभक्ति का प्रदर्शन पटियाला हाउस कोर्ट परिसर में, काला कोट पहन कर, करती है। सबूत के तौर पर जेएनयू छात्रसघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार को पुलिस हिरासत में पीट कर, उसे देशद्रोही करार दे कर करती है। तिरंगा लहरा कर और भारत माता की जय कह कर करती है। बवाल मचा कर करती है।

संघ के देशभक्ति की तो बात ही नहीं हो सकती, वह तो देशभक्तों की खदान है। कारखाना है। वहां हिंदूवादी मशीन से देशभक्त निकलतें हैं।

केंद्र की मोदी सरकार इन दोनों ही देशभक्तों की संयुक्त मिसाल है। इस देश में मोदी जी नम्बर वन देशभक्त हैं। उनकी सरकार बिगड़े हुए देशभक्तों को लाईन पर लाने में लगी है। और सरकार को लगता है, कि ऐसे बिगड़े हुए लोग केंद्रिय विश्वविद्यालय -जेएनयू- में सबसे ज्यादा है। वहां आतंकवादी रहते हैं, देश विरोधी -देशद्रोही रहते हैं।

सरकारी देशभक्तों की समझ है- इसे सुधारा जाये।

18 तारीख को मानव संसाधन विकास मंत्रालय की मंत्री स्मृति ईरानी 46 केंद्रिय विश्वविद्यालयों के कुलपतियों की बैठक लेती है। और तय होता है, कि लोगों में (खास कर विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों में) राष्ट्रीयता की भावना पैदा करने के लिये प्रतिदिन 207 फूट की ऊंचाई पर राष्ट्रीय झण्डा पहराया जायेगा। और सबसे पहले यह झण्डा जेएनयू में फहराया जायेगा।

ऊंचाई 207 फूट होनी ही चाहिये, नहीं होने पर वह राष्ट्रीयता की भावना पैदा करेगा या नहीं? हमें नहीं मालूम।

बहरहाल, सरकार विश्व विद्यालयों में 207 फूट ऊंचे राष्ट्रीयता का लक्ष्य निर्धारित कर चुकी है।

कांग्रेस के दिल और खून में राष्ट्रीयता है।

भाजपा के ऊंचाई में राष्ट्रीयता है।

अब वामपंथी तय करें और प्रदर्शित करें कि उनके दिल और खून में राष्ट्रीयता है? ऊंचाई में राष्ट्रीयता है? अपने देश की आम जनता के लिये जीने-मरने और हक के लिये लड़ने से राष्ट्रीयता और देशभक्ति का पता नहीं चलता। आप फंस जायेंगे, फंसा दिये जायेंगे, देशद्रोह का आरोप लग सकता है।

जिनके दिल और खून में देशभक्ति है, उनमें से ही किसी ने कहा- ‘‘राष्ट्रीयता का मतलब सिर्फ तिरंगा फहराना और वंदेमातरम गाना नहीं है। यह संविधान में भरोसा दिखाना और उन संस्थानों के प्रति आदर प्रकट करना है, जिससे देश ‘‘एक प्रजातांत्रिक बना है।‘‘ बात सही है, लेकिन मौजूदा सरकार को ऐसे देशभक्तों की जरूरत है, जो सरकारी धोख में रहे, और जरूरत पड़ने पर देशभक्ति दिखाने के लिये दूसरे को देशद्रोही भी समझे। ऐसी जरूरत शायद अब कुछ ज्यादा ही पड़ने को है, क्योंकि धोखे से जो सरकार चुन ली गयी है, वह अपने को बनाये रखने पर आमादा है। इसलिये वह लोकतंत्र के चुनावी डफली को बजाते रहना पसंद करेगी। यह अलग बात है, कि वह ऐसा कब तक कर पाती है?

सच बतायें तो, यह अब उसके हाथ में नहीं है।

सच यह है, कि राष्ट्रीय एवं बहुराष्ट्रीय वित्तीय ताकतों ने चुनाव के जरिये सरकार को अपने कब्जे में ले लिया है।

अब उनकी कोशिश सरकार बनाने के लिये चुुनावी दंगल में दो पहलवानों की है। जनता को इन्हीं दो पहलवानों में से किसी एक को चुनने की आजादी होगी।

ऐसा होता है। पूंजीवादी लोकतंत्र में ऐसा ही होता है। तीसरा यदि होता है, तो पहले ही राउण्ड में पिटने लायक होता है। पूरी चुनावी प्रक्रिया एक धोखे में बदल गयी है। देश की जनता कांग्रेस की सरकार बनाये, या भाजपा की सरकार बनाये या इनके मोर्चे की सरकार बनाये, वह निजी कम्पनियों, वित्तीय इकाईयों और काॅरपोरेट के हितों को ही चुनती है। देश की चुनावी प्रक्रिया को आम लोगों के हितों से काट दिया गया है।

अपने देश की सरकार चुनने के अधिकार को, यहां तक कि देश के संविधान को, धोखे में बदल दिया गया है।

केंद्र की मोदी सरकार के तमाम विकास योजनाओं का आधार ही मनमोहन सिंह के सरकार के विकास की दिशा को विस्तार देना है। अर्थव्यवस्था के उदारीकरण को, उसने खुलेआम निजीकरण में बदल दिया है। निजीकरण को राष्ट्रीय नीति बना दिया है।

इस मामले में सरकार को अब तक निश्चय ही बड़ी सफलता मिली है, वह देश की आम जनता को धोखा देने में सफल रही है। वह एक साथ दो घोड़ों को साधने में लगी है। निजी वित्तीय पूंजी की तानाशाही और राष्ट्रवाद के जरिये राजनीतिक एकाधिकार वह चाहती है। वह चाहती है, कि देश की आम जनता कम से कम दो दशक तक उसके धोखे में रहे। किंतु बाजारवादी अर्थव्यवस्था संकटग्रस्त है और मोदी का भरम टूट रहा है। जेएनयू के काण्ड ने वामपंथी एकजुटता को नयी दिशा दे दी है। वामपंथी छात्र संगठनों की एकजुटता राजनीतिक एकजुटता को बढ़ा सकती है।

यह बात अपने आप में महत्वपूर्ण है, कि जवाहरलाल नेहरू विश्व विद्यालय के छात्रसंघ के 18 तारीख के प्रदर्शन को जो राष्ट्रीय एवं वैश्विक समर्थन मिला है, वह मुद्दों की एकजुटता की दिशा है। यह बड़ी बात है, कि वामपंथी छात्रो के नेतृत्व में जारी इस संघर्ष एवं प्रदर्शन में सिर्फ छात्र संगठन ही नहीं, बल्कि मजदूर, किसान, महिला एवं अन्य जनसंगठनों ने अपनी हिस्सेदारी निभाई। दिल्ली की आम जनता का खुला समर्थन मिला। संघ, भाजपा और उसके एबीवीपी के राष्ट्रव्यापी विरोध को कोई खास जगह नहीं मिली।

जेएनयू छात्रसंघ के उपाध्यक्ष शेहला राशिद ने अपने प्रेस कांफ्रेन्स में खुले तौर पर यह मांग की कि ‘‘देशद्रोह के जिस कानून का दुरूपयोग सरकारें करती रहीं हैं, उसे बदलना चाहिये।‘‘

देशद्रोह और देशप्रेम के जिस मसले को सरकार खड़ा कर चुकी है, वह अपने देश की आम जनता को दिये जाने वाले धोखों को भी उजागर कर सकता है। सरकारों के वित्तीय ताकतों के हितों के लिये, अपनी ही बनायी पूरी व्यवस्था को आम जनता को दिये जाने वाले धोखे में बदल दिया है। क्या आपको ऐसा नहीं लगता कि भारत की मोदी सरकार ऐसी सरकारों से अलग नहीं है।

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