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अफ्रीका में अमेरिका जहां है, वहीं आतंकवाद है

shutterstock_70632367अफ्रीका की समस्या यूरोपीय देश और अमेरिकी साम्राज्य है, जिन्होंने उस महाद्वीप के शोषण एवं दोहन को अपनी समृद्धि का आधार बना लिया है। जिनके पास विकास की ऐसी योजनायें हैं, कि उनके आर्थिक सहयोग से अफ्रीकी देश तबाह हो जाते हैं, और अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय इकार्इयां -विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष- और यूरोपीय सेण्ट्रल बैंक जैसी वित्तीय इकार्इयों की दौलत बढ़ती चली जाती है। इन देशों में अमेरिकी खुफियातंत्र, सेना और आतंकी बढ़ते चले जाते हैं। अमेरिकी सरकार जहां भी होती है, वहां दो बातें तो होती ही होती हैं-

• आर्थिक विकास एवं सहयोग के नाम पर शोषण एवं दमन का विशाल तंत्र खड़ा हो जाता है। उस देश की अर्थव्यवस्था और आम जनता की हालत बद से बदत्तर होती चली जाती है।

• क्षेत्रीय तनाव, राजनीतिक असिथरता और ऐसी परिसिथतियां बनती चली जाती हैं, कि अमेरिकी हथियार और अमेरिकी सेना की मौजूदगी जरूरी हो जाये। ऐसी परिसिथतियों को बनाने के लिये कभी आतंकवादी अमेरिकी सेना के आगे-आगे चलते हैं, तो कभी अमेरिकी सेना और खुफियातंत्र के पीछे-पीछे आतंकी घुस आते हैं। दोनों की बड़ी अच्छी बनती है। लड़ते दोनों ही हैं, मगर मारे वो लोग जाते हैं, जिनके मरने-मारने पर दोनों की रजामंदी होती है।

पिछले महीने कन्या की राजधानी नैरोबी के वेस्टगेट माल पर हुआ आतंकी हमला टिवन टावर और लंदन में हुए हमले की तरह ही है। जैसे वहां हुए हमले के बाद इराक पर हमला किया गया, वैसे ही शापिंग माल पर हुए हमले की ओट में अमेरिका अफ्रीका में अपनी मौजूदगी को मजबूत करने और अपने वर्चस्व को बनाये रखने की नीति को अंजाम दे रहा है। पशिचमी मीडिया प्रचार कर रही है कि ”शापिंग माल पर हमला अल शबाब ने किया और आतंकवादी सोमालिया से आये थे।”

आज सोमालिया विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष के ‘ढांचागत सुधार कार्यक्रमों’ के द्वारा कंगाल किया जा चुका है। उसकी बदहाली सिर्फ अफ्रीका ही नहीं बलिक तीसरी दुनिया के देशों के लिये ‘थीम पार्क’ है। ऐसा उदाहरण है, जहां अंतर्राष्ट्रीय वित्ती इकार्इयों के साथ यूरोपीय देश और अमेरिकी सरकार है, जिनके होने की जितनी बुरार्इयां हैं, सोमालिया में एक साथ देखी जा सकती हैं। जहां क्रूरता और नकली विभाजन अपने चरम पर है। हंथियारों की भरमार है। ”सोमालिया की एकमात्र सरकार वहां की ‘इस्लामिक कोर्ट’ हैं, जिसके नियंत्रण में जो भी क्षेत्र हैं, वहां के लोगों के द्वारा उसे माना जाता है।” यह रिपोर्ट ‘अमेरिकी कांग्रेसनल रिसर्च सर्विस’ की है। मगर पशिचमी मीडिया के द्वारा इस्लामिक कोर्ट को हमेशा नकारात्मक प्रचार ही मिला। उसके होने को खारिज करने की नीतियों का समर्थन किया गया और अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने उसे कुचल दिया। जनवरी में हिलेरी किलंटन ने दुनिया के सामने सोमालिया के लिये अपने आदमी हसन महमूद को पेश किया।

सोमालिया के राष्ट्रपति बनते ही हसन महमूद ने कहा- ”सोमालिया हमेशा अमेरिकी सरकार के मजबूत समर्थन के लिये उसका एहसानमंद रहेगा।” उन्होंने अमेरिका को धन्यवाद दिया। मगर आम सोमालियायी भूखमरी, गरीबी और बदहाली के लिये किसको धन्यवाद दे? उन्हें, जिन्होंने रोटी की जगह हाथों में हथियार थमा दिया, या उनका जिनके साथ आतंकवादी घूमते हैं, और लोगों की हत्यायें कर रहे हैं?

जब से नाटो ने अफ्रीका में लीबिया के कर्नल गददाफी की हत्या की और लीबिया का पतन हुआ, तब से अफ्रीका में उसकी आखिरी बाधा भी खत्म हो गयी। अमेरिकी-अफ्रीकी कमाण्ड -अफ्रिकाम- ने महाद्वीप के 35 देशों में अपनी सैन्य टुकडि़यां तैनात कर दी। अममेरिकी हितों के लिये लड़ने वाले आतंकवादियों की नयी खेप भी उतार दी गयी।

नैरोबी के शापिंग माल में हुए हमले का उपयोग अमेरिका सोमालिया पर सैन्य हस्तक्षेप को जायज ठहराने के लिये करेगा। पशिचमी राजनीतिज्ञ और पशिचमी मीडिया इस बात के संकेत लगातार दे रहे हैं। इस हमले के बाद ‘यूएसए-टुडे’ के सम्पादकीय का शीर्षक था- ”नैरोबी माल पर हुआ हमला हम सभी पर हुआ हमला है।” जिसमें कहा गया कि ”911 को आतंकवादियों ने हमारे आधुनिक लोकतांत्रिक पद्धति से जीने के खिलाफ युद्ध की शुरूआत की। आज हम सभी केन्यावासी हैं।” संपादकीय में आगे लिखा गया, कि ”यह लड़ार्इ सिर्फ केन्या की नहीं है, ना ही यह लड़ार्इ सिर्फ अफ्रीका की है। सोमालिया नया अफगानिस्तान हो सकता है। एक कानून और व्यवस्थाविहीन रूढ़ीवादी सोमालिया एक नये सोमाली ओसामा बिन लादेन को जन्म दे सकता है। और अमेरिका पर एक नया हमला हो सकता है। वैसा ही हमला जैसा हमला अफगानिस्तान में ओसामा बिन लादेन और अल कायदा को संरक्षण देने के बाद हुआ था।” अंत इस बात से होता है, कि सोमालिया को ‘अल शबाब’ के लिये छोड़ना कोर्इ विकल्प नहीं है।

मतलब, अल शबाब ने नैरोबी शापिंग माल पर आतंकी हमला कर सोमालिया पर अमेरिकी हमले की जो पृष्टभूमि बनायी है, अमेरिकी सरकार को उसका पूरा लाभ उठाना चाहिये।

हमारे सामने लीबिया के पतन से ले कर सीरिया के संकट तक की खबरें हैं, कि अल कायदा अमेरिकी हितों से संचालित दुनिया का सबसे बड़ा आतंकवादी संगठन है। अफ्रीका और एशिया में वह अमेरिकी हितों के लिये राजनीतिक असिथरता पैदा करता है, और सैन्य हस्तक्षेप की सिथतियां बनाता हुआ, अपनी कार्यवाहियां चला रहा है। 2007 में ‘लीबियन इस्लामिक फार्इटिंग ग्रूप- एलआर्इएफजी’, और ‘अल कायदा इन द इस्लामिक मगरिब -एक्यूआर्इएम-‘ के एकीकरण की घोषणा उस समय अल कायदा के दूसरे नम्बर के लीडर अल जवाहिरी ने अधिकृत रूप से की थी। और तब से बिलहाज उसका अमीर है।

हाकिम अब्दुल बिलहाज लीबिया में एलआर्इएफजी का लीडर है, जिसे नाटो से हथियार, वित्तीय सहयोग और कूटनीतिक समर्थन मिलता है। इस समय बिलहाज सीरिया में फ्री सीरियन आर्मी की ओर से लड़ रहा है। जिसे अमेरिका का पूरा समर्थन हासिल है। एक्यूआर्इएम अमेरिका के स्टेट डिपार्टमेण्ट के आतंकी सूची में शामिल है। और इसी से लड़ने के नाम पर फ्रांस ने माली में सैन्य हस्तक्षेप किया। नैरोबी शापिंग माल पर हमले की जिम्मेदारी लेने वाले आतंकी संगठन अल शबाब भी अल कायदा से जुड़ा सहयोगी संगठन है। केन्या की सरकार अफ्रीका में अमेरिकी वर्चस्व को बढ़ाने के लिये काम कर रही है। पशिचमी देश और अमेरिकी सरकार अल कायदा को एक राजनीतिक हथियार की तरह उपयोग कर रही है। उन्होंने अपने भू-मण्डलीय उददेश्यों के लिये अलकायदा को हस्तक्षेप करने की पृष्टभूमि बनाने की जिम्मेदारी सौंप रखी है। यह हमला सोमालिया के लिये खतरा है।

अमेरिकी डिफेन्स सेक्रेटरी चक हेगल ने 6 अक्टूबर को अमेरिकी स्पेशल फोर्स द्वारा लीबिया और सोमालिया में किये गये हमले पर कहा कि- ”दुनिया को यह मजबूत संदेश (चेतावनी) दी जा रही है, कि अमेरिका आतंकवादियों को कठोर जवाब देने में कोर्इ कसर नहीं छोड़ेगा। इससे कोर्इ फर्क नहीं पड़ता कि वो कहां छुपे हैं और कितने समय तक न्याय से बच पाते हैं।”

और यह बताने की जरूरत नहीं है कि दुनिया में आतंकवादी वह हैं, जो अमेरिका के खिलाफ हैं। अमेरिकी समर्थक हर आतंकवादी लोकतंत्रवादी है, चाहे वह लीबिया में हो, सीरिया में हो, या दुनिया के किसी भी देश में हो। अभी लीबिया में अबु अनास अल लिबी को हिरासत में लेने के बाद, भू-मघ्य सागर में तैनात अमेरिकी युद्धपोत में ले जाया गया। अललिबी पर 1998 में अमेरिका के नौरोबी, केन्या और दारा-ए-स्लाम, टयूनिसिया में बम धमाका कराने -जिसमें 224 लोग मारे गये- का आरोप है। ग्लोबल मीडिया ने अल लिबी की गिरफ्तारी की खबरों को तो प्रमुखता दी मगर, उसके इतिहास के बारे में खामोशी बनाये रखा। यह किसी ने नहीं बताया कि 1980 के दशक में अल लिबी अफगानिस्तान में लड़ार्इ के दौरान, अल कायदा का सदस्य बना और वहां काबुल के सोवियत समर्थित सरकार का तख्तापलटने के लिये अमेरिकी गुप्तचर एजेन्सी सीआर्इए द्वारा संगठित कायरतापूर्ण जन-विरोधी लड़ार्इ में भाग लेने के लिये लड़ाकों की सप्लार्इ करता था। उस समय अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रिगन ने अल लिबी और उसके घोर दक्षिणपंथी इस्लामी लड़ाकों को सहयोग करने के लिये सलाम बजाते हुए कहा था- ”हमारे लिये नैतिक रूप से ये अमेरिका का संस्थापक के समकक्ष है।” अमेरिकी सरकार ने इस युद्ध में अपने 10 बिलियन डालर खर्च किये हैं।

सीआर्इए ने इस्लामी संगठनों का उपयोग र्इरान, इण्डोनेशिया और अन्य देशों में तख्तापलट करने के लिये किया। इसके अलावा उनका उपयोग उन्होंने अमेरिकी हितों को बचाने और मध्य-पूर्व में सोसलिस्ट और वामपंथी राष्ट्रवादियों से संघर्ष करने के लिये किया।

अफगान युद्ध के बाद अल लिबी सूडान में ओसामा-बिन-लादेन का अनुशरण करता रहा। वहां भी वह अमेरिका और पशिचमी ताकतों की सह पर, उनके हितों के लिये काम करता रहा। 1990 के दशक में अल कायदा ने अपने इस्लामी लड़ाकों को बोसनिया भेजा जहा वो अमेरिकी समर्थक बोसनियन मुसिलम सत्ता की तरफ से लडे़। साल 1993 में बिन लादेन को बोसिनया की नागरिकता और पासपोर्ट मिला। अल कायदा आतंकियों को कोसोवो भी भेजा गया, जहां उन्होंने सर्बिया के खिलाफ पृथकतावादी आंदोलन में भाग लिया, जो कि 1999 में अमेरिका-नाटो समर्थित युद्ध में बदल गया।

1995 में सूडान ने ओसामा-बिन-लादेन पर दबाव डाला कि वह अपने लीबियायी समर्थकों को सूडान से बाहर भेज दे। ऐसा करने के लिये लीबिया के प्रमुख कर्नल गददाफी ने दबाव बनाया था। ऐसा होने के कुछ दिन बाद ही मिस्त्र के दबाव की वजह से ओसामा-बिन-लादेन को सूडान छोड़ना पड़ा। क्योंकि मिस्त्र के राष्ट्रपति होस्नी मुबारक की हत्या करने की साजिश अल कायदा समर्थक गुट ने किया था। बिन लादेन अफगानिस्तान चला गया और अल लिबी को बि्रटेन में शरण मिल गयी। मिस्त्र के द्वारा अल लिबी को सौंपने की मांग को बि्रटेन ने यह कह कर खाजिर कर दिया कि वहां उसे न्याय नहीं मिलेगा।

1996 में एम आर्इ 6 ने अल कायदा के एक लीबियन सेल को कर्नल गददाफी की हत्या कराने के लिये भारी भुगतान किया था, जिसमें अल लिबी ने सहयोग दिया था। इसी शर्त के तहत बि्रटिश सरकर ने उसे वहां रहने की अनुमति दी थी। किंतु गददाफी की हत्या का षड़यंत्र सफल नहीं हो सकता। 1999 में स्काटलैण्ड यार्ड ने अल लिबी को हिरासत में ले लिया और फिर यह कह कर बरी कर दिया कि उसे खिलाफ कोर्इ सबूत नहीं है।

2002 में यह सच सामने आया कि 6 साल पहले अल लिबी लीबियन इस्लामी फार्इटर ग्रूप का महत्वपूर्ण लड़ाका था। और इसे ही बि्रटिश गुप्तचर एजेन्सी -एम आर्इ 6 ने गददाफी की हत्या के लिये भारी भुगतान किया था। अफ्रीकन एम्बेसी में हुए बम धमाके के दो साल बाद तक अल लिबी इग्लैण्ड में था, और वह अमेरिकी एफबीआर्इ के लिये ‘मोस्ट वाण्टेड’ भी था। एक दशक तक मोस्ट वाण्टेड आतंकी रहने के बाद अल लिबी 2011 में लीबिया लौटा और एक बार फिर अमेरिकी समर्थक ‘फ्रीडम फार्इटर’ बन गया। उसने एक इस्लामी बि्रगेट को ज्वार्इन कर लिया जो अमेरिका एवं नाटो समर्थक थे और गददाफी का तख्ता पलटने के लिये लड़ रहे थे।

अब सवाल यह पैदा होता है, कि गददाफी की हत्या के दो साल बाद अमेरिका ने क्यों अल लिबी को त्रिपोली की सड़कों से गिरफ्तार किया, जबकि उसके वहां होने की जानकारी वाशिंगटन को पहले से थी?

वास्तव में अमेरिकी गुप्तचर एजेन्सी और अल कायदा नेतृत्व एक साथ मिलकर एक ही तरीके से काम कर रहे हैं। एक बार वो एक-दूसरे के सहयोगी होते हैं, तो दूसरी बार एक-दूसरे के दुश्मन बन जाते हैं। इस तरीके को उन्होंने बड़ी होशियारी से तय किया है, यदि ऐसा नहीं होता तो क्या 911 का आतंकी हमला संभव था? जबकि सीआर्इए को अल कायदा की पूरी जानकारी थी। इसके बाद भी वो अमेरिका में घुसे, वहां से विमान प्रशिक्षण लिया और 911 की घटना को अंजाम दे कर निकल गये। और 11 सितम्बर 2012 की घटना में भी यही तथ्य देखने को मिलता हे, जिस दिन अमेरिकी एम्बेसी पर हमला हुआ। अमेरिकी राजदूत क्रिस्टोफर स्टीविंस और तीन अन्य अमेरिकी मारे गये। स्टीविंस ने लीबिया में अल लिबी जैसे आतंकी और अमेरिकी सेना को एक साथ संचालित होने में सहयोग दिया था।

लीबिया युद्ध के बाद सीआर्इए ने बेंघाजी में कर्इ गुप्त ठिकाने बना लिये हैं, जो भारी मात्रा में हथियारों की सप्लार्इ इसलिये चाहता है, कि जो लीबिया में है, और जो सीरिया जा चुके हैं, उन्हें दिया जा सके। जिसका लक्ष्य क्षेत्र में सत्तापरिवर्तन के लिये राजनीतिक असिथरता पैदा करना, और तख्ता पलट या सैन्य हस्तक्षेप की सिथयितां बनाना है। वह पेशेवर विद्रोहियों, आतंकियों को हथियारों की आपूर्ति एवं आर्थिक सहयोग दिलाते रहने में लगा है। इसके बाद भी अल लिबी की गिरफ्तारी से यह भी लग रहा है कि अमेरिकी सरकार और अल कायदा समर्थित गुट के बीच पैसा या ताकत को लेकर कुछ न कुछ ऐसा हुआ है, कि दोनों के बीच कुछ कटुता आ गयी है।

जिस लीबिया में अल लिबी की गिरफ्तारी हुर्इ वहां अमेरिका-नाटो तख्तापलट के बाद राजनीतिक असिथरता, आर्थिक अनिश्चयता और सामाजिक आतंक अपने चरम पर है। कहने को तो वहां पर सरकार है, मगर उसकी चलती राजधानी त्रिपोली पर भी बड़ी मुशिकल से है। गिद्धों की तरह कर्नल गददाफी के मारे जाने की बाट जोहने वाली विदेशी -बहुराष्ट्रीय कम्पनियां वहां से पलायन कर गयी हैं। देश की वित्तीय संरचना बिखर गयी है। युद्ध के बाद लीबिया मलबों का ढ़ेर और आतंक के साये में हैं, जहां हथियारबद्ध मिलिशियायी गुट आपस में लड़ रहे हैं। लीबिया के साथ ही अफ्रीका के आनेवाले बेहतर कल के सीने में साम्राज्यवादी खंजर पैबस्त है। अल लिबी का इतिहास युद्ध के आतंक का इतिहास है, जिसमें अमेरिकी सरकार, नाटो देश और आतंकी संगठनों की बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका है। लीबिया पर अमेरिका एवं नाटो हमले का ही परिणाम है कि चीन के आयल इण्डस्ट्रीज के 30,000 कामगर एवं कर्मचारियों को देश छोड़ना पड़ा।

आज अफ्रीका में चीन की कड़ी चुनौतियों का सामना अमेरिका और यूरोपीय ताकतों को झेलना पड़ रहा है। जहां एक ओर अमेरिका अपनी सेना और ड्रोन उपयोग कर रहा है और महाद्वीप के देशों में वह जहां है, वहीं तबाही है, वहीं दूसरी ओर चीन सड़क और पुल और बांध बनवा रहा है। जो चीज चीन को चाहिये वह अफ्रीका का प्राकृतिक संसाधन है, और वह उसे उस क्षेत्र के विकास के साथ मिल रहा है। जबकि अमेरिका और यूरोपीय संघ और अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय इकार्इयां अफ्रीकी महाद्वीप की सबसे बड़ी समस्या, सबसे बड़ा संकट बन गये हैं। अब चीन की चुनौतियां इनके लिये अफ्रीका से बाहर भी बढ़ती जा रही हैं।

यह चौंकाने वाला सच है कि सरी दुनिया में आतंकवाद के खिलाफ हमले की नीति को अंजाम देने वाला अमेरिकी साम्राज्य और नाटो देश जहां भी पहुंचे, वहीं आतंकवाद की जड़े मजबूत हुर्इ हैं। यदि इराक, लीबिया और सीरिया को हम लें तो इन तीनों देशों में अमेरिकी हस्तक्षेप से पहले अल कायदा का नाम-ओ-निशान तक नहीं था, जहां आज उनकी चलती है।

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