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जेएनयू मुद्दा, फासीवाद की शिनाख्त है – 1

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जेएनयू का मुद्दा इस देश में फासीवाद के होने की शिनाख्त करता है। इस बात की शिनाख्त करता है, कि भले ही इस देश में चुनी हुई सरकार है, मगर एक ऐसी समानांतर व्यवस्था, एक ऐसी समानांतर सरकार भी है, जिसके जेहन में राष्ट्रवाद का जुनून है।

देश के वामपंथियों के खिलाफ, वह इस जुनून को, देश की आम जनता के जेहन में उतारने में लगी है। उन्हें आतंकवादी और देशद्रोही करार देने में लगी है। उसने यह मान लिया है, कि दलगत आधार पर वामपंथियों की राजनीतिक चुनौतियां अब कारगर नहीं हैं, इसलिये उनकी वैचारिक सम्बद्धता को मौत के घाट उतारा जा सकता है। उन्हें देशद्रोही करार दे, फांसी के फंदे तक पुहंचाया जा सकता है, जहां-जहां वे हैं, उन्हें वहां से उखाड़ा जा सकता है। क्योंकि उन्हें यह भी मालूम है, कि उनके राजनीतिक एकाधिकार और वित्तीय तानाशाही की राह में वामपंथी ही सबसे बड़ी चुनौती हैं। रोड़ा हैं। बाधा हैं।

और यही वह सबसे जटिल सवाल है, हमारे सामने, कि जिन वित्तीय ताकतों -राष्ट्रीय, बहुराष्ट्रीय कम्पनियों, काॅरपोरेशनों और अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष तथा विश्व बैंक जैसी वित्तीय इकाईयों- के हितों से देश की सरकार और उसके पीछे खड़ी प्रतिक्रियावादी ताकतें संचालित हो रही हैं, वो चाहती क्या है? वित्तीय ताकतों को अपने लिये, अपने हितों के लिये, कैसे राजनीतिक संरचना की तबल है?

वे पूंजीवादी लोकतंत्र को बनाये रखना चाहती है?

या एकाधिकारवादी फासीवाद के पक्ष में है?

हमारा यह सवाल अपने आप में, इस बात की स्वीकृति है, कि अपने देश की सरकार बनाने का अधिकार, देश की आम जनता के हाथों से निकल चुका है। और जो निकल चुका है, उसे हासिल करना आसान नहीं है।

हमारा यह सवाल अपने आप में इस बात की स्वीकृति है, कि 2014 के आम चुनाव में मिला जनसमर्थन वास्तविक नहीं है, लोगों को जिस तरह आज राष्ट्रवाद, देशभक्ति और वामपंथियों को देशद्रोही करार दे कर बरगलाया जा रहा है, ठीक उसी तरह भाजपा और संघ ने और उनके पीछे खड़ी राष्ट्रीय-बहुराष्ट्रीय वित्तीय ताकतों ने अपने हितों के लिये, बहलाया और फुसलाया है।

एक राष्ट्र (हिंदू राष्ट्र)

एक दल (भाजपा)

एक नेता (नरेंद्र मोदी)

की फासिस्ट सोच के तहत ही आम चुनाव लड़ा गया, और आज इसी सोच को अंजाम तक पहुंचाने की कवायतें हो रही हैं। और हमें यह लगता है, कि यह देश के दक्षिणपंथी-प्रतिक्रियावादी ताकतों की सोच है, जो राष्ट्रीय एवं बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के हितों के साथ अपने हितों को पूरा करना चाहती है, जो विवादहीन रूप से उग्रराष्ट्रवाद है। राजनीतिक एकाधिकारवाद है। खुले शब्दों में तानाशाही है, फाॅसिस्टवाद है।

भाजपा और संघ का जो लक्ष्य है, पूंजीवादी साम्राज्यवाद के लिये आखिरी विकल्प है। वैश्विक स्तर पर पूंजीवाद आम संकट के दौर से गुजर रहा है। वह वित्तीय संकट के उस दौर से गुजर रहा है, जहां संभलने के लिये भारत, चीन के बाद विकल्प है। इसलिये वह भारत की लोकतांत्रिक संरचना को तोड़ने के बजाये उसे अपने कब्जे में रखने का पक्षधर होगा। तानाशाही से उसे परहेज नहीं है, मगर अभी, शायद उसे तानाशाही पसंद नहीं है। मगर, वामपंथी उसके लिये सवाल हैं।

हमें इस बात को खुलेतौर पर स्वीकार करना चाहिये कि वामपंथी राजनीतिक दलों ने, पूंजीवाद के गहराते संकट के दौर में, आम जनता के सामने, विकल्प न देने की ऐतिहासिक भूल की है।

हमें इस बात को भी खुले तौर पर स्वीकार करना चाहिये, कि आज जो हो रहा है, वह वामपंथी राजनीतिक दलों के दशकों से जारी भूल का परिणाम है।

इस देश में फाॅसिस्ट ताकतों को राह देने की भूल वामपंथियों ने की है।

ऐसा कह कर, हम यह नहीं कह रहे हैं, कि उन्होंने जो अच्छा किया- वह बे-सूद है, मगर, गलत कार्यनीति और अपनी क्षमता और जरूरतों से कम काम करना या ‘सुविधा‘ से अपनी जगह बनाने में लगे रहना, सही नहीं है। जबकि अपनी क्षमता से ज्यादा काम करने की जरूरतें आज भी हैं। लेनिन मानते हैं, और यह सही हैं, कि ‘‘विभाजन विकास की प्रक्रिया है।‘‘ मगर तब न, जब वजहों के बदलते ही एकजुटता की ओर हम बढ़ें। कल तक दोस्त और दुश्मन की सही पहचान नहीं थी, आज तो है, और विभाजित रहनेे, बंटे रहने की वजह भी नहीं है। जेएनयू मामले ने एकजुटता की ओर निर्णायक कदम भी बढ़ा दिया है।

छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार एआईएसएफ के हैं।

छात्रसंघ उपाध्यक्ष शेहला राशिद- आईसा की हैं।

छात्रसंघ महासचिव रामा नागा- आईसा के हैं।

और जेएनयू में राष्ट्रविरोधी हरकतों का जिसे मास्टर माईन्ड बताया गया, वो उमर खालिद डीएसयू के हैं।

दलगत आधार पर वे अलग-अलग वामपंथी राजनीतिक दलों के हैं, और उन्होंने जेएनयू के संकट के खिलाफ अपनी एकजुटता को प्रमाणित किया है। जो लड़ाई उन्होंने कन्हैया कुमार के लिये लड़ी, वही लड़ाई उन्होंने उमर खालिद और राष्ट्रद्रोह के आरोपियों के खिलाफ भी लड़ने की एकजुटता दिखायी है। उनके इसी एकजुटता को वामपंथी राजनीतिक दलों की एकजुटता की दिशा भी बनायी जा सकती है। अच्छी खबर है, कि 18 फरवरी के प्रदर्शन में यह एकजुटता नजर भी आयी। सबसे बड़ी और अच्छी खबर यह है, कि छात्रों के इस प्रदर्शन में मजदूर, किसान, महिला एवं जन संगठनों की हिस्सेदारी थी। आम लोगों की हिस्सेदारी थी। देश और दिल्ली के लोगों की हिस्सेदारी थी। जेएनयू के पक्ष में दुनिया भर के बुद्धिजीवियों ने अपने समर्थन की एकजुटता को दिखाया। देश के ज्यादातर राजनीतिक दलों का समर्थन मिला।

वामपंथी राजनीतिक दल पिछले कई दशक से -दो-तीन दशक से तो निश्चय ही- अलग-अलग तीरके से तीसरे मोर्चे की बातें की, पहल की, मगर यह नहीं सोचा कि वाममोर्चा को ही तीसरा मोर्चा बनाना चाहिये। आप जन मुद्दे के साथ खड़े हों आपके नेतृत्व में मोर्चे का निर्माण हो जायेगा। जेएनयू में यही हुआ। मुद्दे खड़े हुए और मोर्चा भी खड़ा हो गया। उनके बीच ध्रुवीकरण की प्रक्रिया का आंकलन हमारा मुद्दा नहीं है। मुद्दे की बात इतनी है, कि मोर्चे का निर्माण सिर्फ वार्ताओं की मेज पर नहीं होता। संघर्षों के दौरान एकजुटता की नयी पहल हुई है, और इसे ही विस्तार देने की जरूरत है। यदि आप इसे नहीं बढ़ायेंगे, तो हमले और भी तेज होंगे। जेएनयू सिर्फ जेएनयू नहीं है।

जेएनयू से भारत के आने वाले कल की तस्वीरें साफ होनी हैं।

देश की मोदी सरकार क्या चाहती है? यह बिल्कुल साफ हो गया है। देश के गृहमंत्री से लेकर भजपा प्रवक्ता और संघ से लेकर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद तक, तथा भाजपा से जुड़े तमाम संगठनों ने भी ‘राष्ट्रवाद‘ का उन्माद पैदा किया है। देशद्रोह बनाम देशभक्ति का स्वार्थपूर्ण सवाल खड़ा किया है। इस बात का खुलासा होने के बाद भी कि कन्हैया कुमार पर देशद्रोह का आरोप जिन वीडिया -टेपों- के आधार पर लगाया गया, उस साजिश में मीडिया (कुछ) भी शामिल हैं, साजिशों का अंत नहीं हुआ है, बल्कि वह गहराया है। लड़ाई थमने को नहीं है। देश की आम जनता को गलत राह पर धकेला जा रहा है। आज भी ‘एक राष्ट्र, एक दल और एक नेता‘ के सिद्धांत को ही बढ़ाया जा रहा है।

संघ और भाजपा के लिये सरकार एक जरिया है। एक ऐसा अवसर है, जो उसे राष्ट्रीय एवं बहुराष्ट्रीय वित्तीय ताकतों ने दिया है।

राष्ट्रीय एवं बहुराष्ट्रीय वित्तीय ताकतों के लिये भी सरकार एक जरिया है, जिसे उसने भाजपा को माध्यम बना कर हासिल कर लिया है। जिसके सामने भाजपा की औकात जरखरीद गुलाम की है, उस कारिन्दे की है, जो लठैत भी है। जिसके पास अपने फाॅसिस्ट सोच के अलावा और कुछ भी नहीं है। जिसे चाह कर भी वह वित्तीय ताकतों के सहयोग के बिना हासिल नहीं कर सकती।

भाजपा और संघ ने और दोनों के संयुक्त राजनीतिक चेहरे नरेंद्र मोदी ने अपने राजनीतिक हितों के लिये इस देश को, उसके सवा सौ करोड़ लोगों को वहां गिरवी रख दिया, इस देश और आवाम का सौदा वहां कर दिया है, जहां से उसे मुक्त करना, उसके लिये संभव नहीं है। वह उन वैश्विक साहुकारों के कब्जे में है, जिसके कब्जे में विश्व की ज्यादातर सरकारें हैं। संघ, भाजपा और मोदी सरकार को अपनी देशभक्ति का सही आंकलन करना चाहिये।

जेएनयू के संकट ने चुनी हुई सरकार के शातीर और खुंख्वार चेहरे की झलक दिखा दी है।

जी-न्यूज के विश्वदीपक की बातों पर यदि हम यकीन करें, और यकीन न करने की कोई वजह नहीं है।

यदि ‘आज तक‘ के स्टिंग आॅपरेशन के जारी वीडियो पर यकीन करें, जिसमें पुलिस की देख रेख में कन्हैया कुमार को उल्टा टांग कर तीन घण्टे तक मारने की बात सम्बद्ध वकीलों ने की है, तो यह बात अपने आप में तय है, कि आज जो कन्हैया कुमार के साथ हो रहा है, आने वाले कल में उमर खालिद और देशद्रोह के पुलिस आरोपी जेएनयू छात्रों के साथ जो होगा, वह हमारे और आपके साथ नहीं होगा, इस बात की गारण्टी कोई नहीं ले सकता।

इस देश को ‘भारत माता की जय‘ छाप देशभक्तों के जरिये देश की मोदी सरकार राजनीतिक अस्थिरता की ओर धकेल रही है। देश की चुनी हुई सरकार ने ही लोकतंत्र की बुनियादें हिला दी हैं।

(जारी)

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