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जेएनयू मुद्दा, फासीवाद की शिनाख्त है – 2

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आज हम देश की वर्तमान स्थितियों की बात करें, तो हिंसा, अस्थिरता और विभाजन समाज और हमारी सोच में है। आम आदमी डरा हुआ है। देशभक्ति बनाम देशद्रोही का खेल खेला जा रहा है। लोग यह सबक सीख रहे हैं, कि सरकार के साथ होने में ही सुरक्षा है। यदि सरकार को छोड़े तो आप देशद्रोही हैं। और देशद्रोहियों से देशभक्त कैसे निपटते हैं, यह आपने देख ही लिया है। तीन हत्यारे किस्म के वकील हैं, भाजपा विधायक ओ.पी. शर्मा हैं। सरकार समर्थक संघ और विद्यार्थी परिषद है। उन्माद फैलाने वाला प्रचारतंत्र है।

देशभक्तों को सामाजिक हिंसा की मंजूरी है।

देशद्रोहियों को पुलिस हिरासत में पीटा जा सकता है।

न्याय के न्यायिक प्रक्रिया में उन्हें घुमाया जा सकता है।

उनके खिलाफ प्रदर्शन होते हैं।

उनके तमाम संवैधानिक अधिकारों को धोखा दिया जा सकता है।

विरोध प्रदर्शनों और आंदोलनों को इतना थकाया जा सकता है, कि जोश ठण्डा पड़ जाये।

समय के साथ राजनीतिक दलों का अपना हित उभर आये, वो अपने हितों की फिक्र करने लगें।

मुद्दे खबर बन जायें।

जेएनय का मुद्दा हो, रोहित वेमुला काण्ड हो या जाटों का लूट-मार छाप आरक्षण के लिये आंदोलन हो, धीरे-धीरे खबरें बन रही हैं।

और इन खबरों से जो बन रहा है, वह यह है, कि सार्वजनिक रूप से मोदी सरकार देशभक्तों की सरकर बन रही है। भाजपा देशभक्तों की पार्टी बन रही है, और संघ देशभक्तों की जमात है। और देशभक्ति को हमेशा निजी हितों से ऊपर का दर्जा मिल जाता है। सरकार, भाजपा और संघ वही दर्जा हासिल करने में लगे हैं, जिसकी सफलता पर उनका आज और आनेवाला कल बनता है।

और इस देश के आने वाले कल का चेहरा भी, इन्हीं बातों से तय होने जा रहा है।

सरकार नवउदारवादी वैश्वीकरण के तहत मुक्त व्यापार और बाजारवादी अर्थव्यवस्था को देश की राष्ट्रीय नीति बनाने में लगी है,  जिसका मकसद है, राष्ट्रीय-बहुराष्ट्रीय कम्पनियों और काॅरपोरेशनों का हित। देश के प्राकृतिक सम्पदा की लूट। देश के श्रमशक्ति और बौद्धिक सम्पदा का बाजारीकरण, उन्हें सस्ता से सस्ता बनाना।

भाजपा राष्ट्रीय-बहुराष्ट्रीय निजी कम्पनियों के लिये सबसे बड़ी और सबसे विश्वसनिय साझेदार बनने में लगी है। उसे राजनीतिक एकाधिकार की तलब है और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के लिये हिंदू राष्ट्रवाद मुद्दा है।

कुल मिला कर स्थितियां जो बनती हैं, और बनायी जा रही हैं, वह यह है, कि सरकार, भाजपा और संघ देश की अनिवार्यता है, देशभक्त है, और जो देशभक्त नही है, वो सरकार विरोधी, भाजपा विरोधी और संघ विरोधी है। देशद्रोही है।

बड़े ही सुनियोजित तरीके से सरकार को देश बनाया जा रहा है। उस सरकार को देश बनाया जा रहा है, जो देश को बाजार बना रही है, जहां बाजारवादी वित्तीय ताकतों को खुली छूट है। उनके लिये मेक इन इण्डिया से लेकर स्टार्ट अप इण्डिया है। जबकि आम लोगों के लिये श्रम कानून में संशोधन से लेकर भूमि अधिग्रहण विधेयक है, ऐसी तमाम योजनायें हैं, जिनसे किसानों को भी औद्योगिक क्षेत्र के लिये श्रमजीवी बनया जा सके। स्मार्ट सीटी से लेकर स्वच्छता अभियान तक की हालत यही है।

ऐसे हालात बनाये जा रही हैं, कि नवउदारवादी बाजार व्यवस्था को सख्ती से लागू किया जा सके।

‘राष्ट्रवाद‘ भाजपा का संघ समर्थक मुद्दा है।

‘देशद्रोही बनान देशभक्त‘ जनसमर्थन हासिल करने का भाजपा का चुनावी फण्डा है। जो जुनून में बदल गया है। वह पूरी तरह उन्मादी हो गया है। यही उन्माद संघ का हिंदू राष्ट्रवाद है। जिसके निशाने पर सिर्फ अल्प संख्यक समुदाय ही नहीं उदार हिंदू भी है। वह मुसलमानों को आतंकवादी और आदिवासी एवं पिछड़े वर्ग के लोगों को माओवादी (जिन्हें पहले ही आतंकवादी घोषित किया जा चुका है) करार दे रही है। उन्हें देश के लिये सबसे बड़ा खतरा और देशद्रोही करार दे रही है। यही नहीं इनके पक्ष में जो भी कुछ बोलेगा, वह भी देशद्रोही है। ‘देशभक्तों‘ ने अपने हाथ में न्याय का डण्डा भी थाम लिया है।

आप कन्हैया कुमार हैं, तो भी वो पीटेंगे।

आप उमर खालिद हैं, तो भी वो पीटेंगे।

आप रामा नागा हैं, अनिर्बन भट्टाचार्य हैं, आशुतोष कुमार हैं, या जो भी हैं, वो पीटेंगे।

देश की सरकार, भाजपा या संघ के खिलाफ जो भी होगा, उसे वो पीटेंगे। रोहित वेमुला की तरह आत्महत्या करने के लिये विवश करेंगे, और नहीं किये, तो वो मार डालेंगे। इसलिये देशभक्त (सरकार भक्त) बनो।

इस तरह जो सरकार भक्त हैं, वह सरकार का, सरकार की सोच का सरकार की नीतियों का विरोध नहीं करेगा।

सरकार जो भी कर रही है, वह मोदी सरकार की अपनी समझ या नीतियां हैं? यह सवाल हमारे सामने है।

देश में मोदी सरकर जिस तरह चुनी गयी है,

देश में मोदी सरकार जिस तरह बनायी गयी है, और

देश में मोदी सरकार को जिस तरह राष्ट्रीय-बहुराष्ट्रीय कम्पनियों एवं काॅरपोरेशनों का समर्थन हासिल है, और जिस तरह से वह उनके हितों के लिये काम कर रही है, उसे देखते हुए नहीं कहा जा सकता, कि वह इन वित्तीय ताकतों के निर्देशों एवं आदेशों के बिना ऐसे निर्णायक कदम उठायेगी।

जेएनयू प्रकरण के संदर्भ में ही हमने इस बात का आंकलन इस नजरिये से किया है, कि वित्तीय ताकतें भारत के लोकतांत्रिक ढांचे को, उसकी राजनीतिक संरचना को तोड़ने के पक्ष में नहीं होंगी।

लेकिन, सच यह भी है, कि भले ही आज देश की जनता यह नहीं जानती है, कि नवउदारवादी वैश्वीकरण और बाजारवादी अर्थव्यवस्था का मतलब क्या है? और वह कैसे जनविरोधी है? मगर जैसे ही इन नीतियों का प्रभाव क्षेत्र बढ़ने लगेगा और परिणाम सामने आने लगेगा, जन प्रतिरोध और जन विरोध का खड़ा होना, बढ़ना तय है। लातिनी अमेरिकी देशों की ओर हम चलें और जहां से ‘नवउदारवादी वैश्वीकरण और मुक्त व्यापार की नीतियों‘ को 1973 में चिली में जिस तरह लागू किया गया, जिस तरह सरकार का अपहरण हुआ, यह लगने लगेगा कि भारत की मौजूदा स्थितियां सामान्य नहीं हैं। और जो हो रहा है, वह पूर्व नियोजित, सोची-समझी कार्यनीति है। फासीवाद का नया रूप अपनी सूरत किश्तों में दिखाना शुरू कर चुका है।

यह भी लगने लगेगा कि देश की मोदी सरकार काॅरपोरेट के हित में पहले मजदूरों पर हमला की।

इसके बाद, किसनों की जमीन पर हमला हुआ।

और अब विश्व विद्यालयों पर हमले हो रहे हैं।

वेमुला (आत्म)हत्या काण्ड से पहले भी बहुत कुछ हुआ है, लेकिन वेमुला के इस काण्ड को हैदराबाद से दिल्ली लाने और फिर देश और दुनिया तक पहुंचाने में जेएनयू के छात्रसंघ ने बड़ी भूमिका निभाई है। कन्हैया कुमार आज देशद्रोही इसलिये नहीं है, कि वे वास्तव में देशद्रोही हैं, बल्कि इसलिये देशद्रोही है कि उन्होंने काॅरपोरेट सरकार की नीतियों का विरोध किया है, वो वामपंथी हैं। संघ और भाजपा के लिये कम्युनिस्ट होना ही देशद्रोह है। यही कारण है कि तमाम रचे हुए साक्ष्य और बे-बुनियाद आरोपों का कोई प्रमाण नहीं है। बिकी हुई मीडिया ने ही देशद्रोह के मुद्दे को खड़ा किया, और लोकतंत्र समर्थक उसी मीडिया ने तमाम आरोपों को निराधार प्रमाणित कर दिया।

सरकार इस बात को अच्छी तरह जानती है, कि दिल्ली पुलिस प्रशासन की तरह न्याय प्रशासन पूरी तरह उसकी गिरफ्त में नहीं है, इसलिये कन्हैया कुमार और बाकी लोगों को वह प्रचारतंत्र और देशभक्ति के उन्माद से मारना चाहती है। इस पूरे प्रकरण में अफजल गुरू ऐसा जरिया है, जो देशद्रोह और आतंकवाद के विरूद्ध उसे प्रमाणित करने के लिये है। उमर खालिद और अनिर्बन भट्टाचार्य ने आत्म समपर्ण कर दिया है। आशुतोष, अनंत प्रकाश और रामा नागा जेएनयू परिसर में हैं। कइयों की गर्दन उसके हाथ में है, मगर वह मरोड़ नहीं पा रही है। मोदी सरकार की राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय रूप से बिगड़ती छवि का उसे खयाल है।

संसद के बजट सत्र में भाजपा का मकसद बजट पारित कराना आौर लम्बित विधेयकों के लिये विपक्ष की सहमति का मुद्दा है। जेएनयू प्रकरण में वह कांग्रेस और विपक्ष को कटघरे में खड़ा कर सकती है, कर रही है, मगर जेएनयू तमाम कोशिशों के बाद भी कटघरे से बाहर है। और यही उसकी परेशानी है। जो प्रतिरोध खड़ा हो गया है -सड़कों पर, जेएनयू के पक्ष में- उसकी उसे उम्मीद नहीं थी। उसने यह भी नहीं सोचा था, कि वामपंथियों में प्रतिरोध की एकजुट क्षमता बची भी है।

जेएनयू में वामपंथ एक मोर्चा है, और मैं समझता हूं वह देश के वाम राजनीतिक दलों के मोर्चे से कहीं ज्यादा समझदार है, और इसी समझदारी के विस्तार पर फासिस्टवाद के खिलाफ, आने वाले कल की संभावनायें बनती हैं।

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