Home / साहित्य / कविता / श्वेता राय की पांच कविताएं

श्वेता राय की पांच कविताएं

shweta-rai1. दोस्ती

रिश्तों को जीते हुये हम
आँखों की पुतलियों में जीते हैं कई भाव
और तय होती हैं
हर भाव की एक निश्चित परिधि

कि तभी बीज बन उतर जाता है एक रिश्ता
मन की जमीन पर
जो एक दिन बन जाता है वट वृक्ष
जिसकी जड़ों में होती हैं असंख्य शाखाएं
रिझाने,मनाने, सताने, रुलाने, की
और विश्वास की टहनियों पर
खिलखिलाती हैं खुशियों की पत्तियां

गुजरते पलों के साथ
निकल आती है अनुकूलन की जटायें
कि दोस्त सहस्र मील दूर होकर भी
नही छोड़ते हैं साथ
वो घूमते रहते हैं सूरजमुखी की तरह
कि दोस्ती होती भी तो है सूरज जैसी प्रदीप्तिमान

दोस्त, कभी नही बन पाते है नदी
कि वो चाह कर भी न लौट सके पहाड़ तक
और न ही बन पाते है सागर
कि निश्चित कर लें अपनी हद…

शाश्वत कुछ भी नही होता है
बदलाव ही नियति है
पर दोस्ती में
आगे बढ़ कर भी लौटना होता है बार बार

कि दोस्त ऋतु तो दोस्ती मौसम है….

 

2. प्रतीक्षा

सूनी हो चुकी हवेली, नही रह पाती है कभी सूनी

कि वहां बसती है
प्रेम में डूबे हुये कबूतर जोडों की
गुटर गूं

धूप आकर फ़ैल जाती है भर आँगन
और हवायें घूमती रहती हैं
छज्जे छज्जे

कि मिल जाएँगी वहां मकड़ियां बुनती हुई राह प्रेम की

बदलता मौसम भी नही भूलता
जर्जर होती दीवारों पर छोड़ जाना
चित्तेदार शेष निशान

कि दरवाजे पर लगी जंग
मिलती है रात दिन से
देती हुई गवाही लम्बी प्रतीक्षा की

कि सूनी हवेलियां
अभिशप्त होती हैं भोगने को प्रतीक्षा
जिसका नहीँ होता है
कोई निश्चित काल खंड

कि ऋतु, मौसम,धूप,हवा, बारिश बस जानते हैं रचना प्रेम

और प्रेम गढ़ता है निराकार निरपेक्ष प्रतीक्षा
जो होती है परिमाणहीन…..

 

3. सरहदें

जब भी खिंची जाती हैं सरहदें
एक रह चुके दो लोगों के बीच
तो होता है समय लहुलुहान

कि नही बंट पाता है बीता समय
हो कर बराबर
दोनों के मध्य
और ना ही रख पाता है कोई एक
बना के उसे अपना इतिहास

और एक पतली खिंची सरहद
जाने कब बदल जाती है
एक खाई में
और फैल जाती है
एक रह चुके दो लोगों के बीच

जहाँ गाहे बगाहे बस गूँजा करते हैं
सरहदी बँटवारे के ध्वनियों की प्रतिध्वनियाँ…….

 

4. प्रेयसी बनाम कविता

आँख बन्द कर वो सोच रहा है
अपनी प्रेयसी को
कि उसे रचनी है एक कविता अपनी प्रेयसी के लिये

झुंझलाता है वो
जब अटकती हैं उसकी पंक्तियाँ
पर आते ही नूतन बिम्ब दिमाग में
आ जाती है एक मुस्कान उसके चेहरे पर
सोचते हुये अपनी प्रेयसी को

लहरा रहे हैं उसके खुले केश दसो दिशाओं में
कि चंचल मृग सी आँखें
झांक रही हैं पलकों के घने जंगल से
हिमालय सा वक्ष
नदियों सी कमर
भर देती है उसे आनन्द से

अपने इस आनंद से हो उद्द्त
जब वो उठाता है कलम
कि रच दे वो एक कविता अपनी प्रेयसी के लिये

तभी दिखती है उसे द्रोपदी
जो लहरा रही है अपने खुले केश
मृग की आँख में दिखती है शकुंतला
तो जंगलों में भटकती मिलती है सीता
और तभी छूट पहाड़ से सागर में जाकर
जीवन खत्म करती दिखती है गंगा

कि अब वो लिख रहा है सबसे सुन्दर कविता अपनी प्रेयसी के लिये कि

प्रेयसी!
नही हो तुम
जीवन के भगौलिक क्षेत्र का मात्र मानचित्र
बल्कि तुम जीवन हो
और जब भी हो मन तुम्हारा

सुन लेना जीवन संगीत रख कर अपने कान मेरे सीने पर..

 

5. मत छूना मुझे

मत छूना मुझे
कि जब भी छूती हो मुझे
उभर आता है आत्मा पर लगा एक दाग

दाग,
शायद एक भूल थी
जिसमें जीवन था
पर उसे मरना पड़ा असमय
कि उसमें थी एक आग भी

हाँ,आग
जिसमें तपकर
तन मन कुंदन तो हुआ
पर मिल न सकी प्रभुता
कि उसमें बसी एक तृष्णा थी

तृष्णा,
जो फैलाती गई भ्रम
सच और झूठ में
मिलाती गई सपनों को धूल में

कि धूल ही तो सहायक होती है आँधी की
जो मिटा देती है खिला उपवन
भरे बसंत में

इसलिए स्मृतियों!
मत छूना मुझे
कि जब भी छूती हो मुझे, उभर आते हैं आत्मा पर लगे दाग…

-श्वेता राय
विज्ञान अध्यापिका
देवरिया
उत्तर प्रदेश

प्रस्तुति : नित्यानंद गायेन

Print Friendly

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

Select language:
Hindi
English
Scroll To Top