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लोकतंत्र का मलीन अध्याय

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आप चाहे जो कहें, इस देश में लोकतंत्र की हालत सचमुच खराब है। उसे संभालने वाला कोई नहीं।

संसद का बजट सत्र चल रहा है। लोकतंत्र जागृत अवस्था में है।

रेल बजट पर सरकार तालियां बजा रही है। अपना पीठ ठोंक रही है। कि न किराया बढ़ा, न माल भाड़ा बढ़ा, रेल चल रही है।

जिस पटरी पर देश की अर्थव्यवस्था को डाल दिया गया है, वह पटरी बिछ रही है।

जो हमारा है, उसे दूसरे को देने की तैयारियां चल रही हैं।

यह बहस का मुद्दा ही नहीं है। जिसे चाहे जो दे।

विकास दर, रेटिंग एजेन्सी, बड़े-बड़े आंकड़े बताने और समझाने वाले लोग पहले से बैठे हैं।

कोई बात नहीं।

सरकार है तो कारोबार तो करेगी ही?

पहले यह शर्मनाक था, अब ऐसी कोई बात नहीं है। शर्माने के लिये और भी कई मुद्दे हैं, मौके हैं।

रोहित वेमुला के मुद्दे पर संसद में मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी अपने पक्ष में अच्छे वकील का रोल प्ले कर रही हैं।

एक्शन, इमोशन, ड्रामा चल रहा है।

‘‘मां…..मां! बच्चा…..बच्चा!‘‘ होते, होते मां दुर्गा और महिषासुर पर बहस हो रही है।

समझ के फिसलतने के लिये काईयां बिछायी जा रही है।

क्या रोहित वेमुला ‘‘मां-मां, बच्चा-बच्चा का मुद्दा है?‘‘

क्या जेएनयू का संकट दुर्गा और महिषासुर के सम्मान पर अपमान का मुद्दा है?

‘नहीं!‘

मगर बहस जारी है।

कलाकारों की कोई कमी नहीं है। जो संसद में नही हैं, वो सड़क पर एक्टिंग कर रहे हैं, और जो सड़क पर नहीं हैं, वो संसद में एक्टिंग कर रहे हैं।

हमने कभी नहीं सोचा था कि देश की संसद ‘दुर्गा और महिषासुर‘ पर बहस करेगी। दुर्गा या महिषासुर संसद की कार्यवाही ठप्प करा सकते हैं।

कन्हैया कुमार, उमर खालिद और अनिर्बन भट्टाचार्य, जिनका नायाब जीवन खतरे में है, जिन्हें देशद्रोही बनाया जा रहा है, जो जेएनयू में हो रहे सरकारी हमले की पहचान हैं, जो लोकतंत्र की दरकती सूरत और उजागर होते फाॅसिस्ट चेहरे की शिनाख्त करा रहे हैं, उन्हें महिषासुर के पीछे धकेल दिया जायेगा?

सचमुच, यह यकीन के काबिल नहीं है, मगर है। यह सब संसद में, देश की आम जनता के सामने हो रहा है।

समझना मुश्किल है, कि हम कहां है? हमारे साथ क्या हो रहा है? राष्ट्रीय होना बुरी बात नहीं, लेकिन आम जनता के जेहन में राष्ट्रवाद (उग्र एवं खास) की उत्तेजना भरी जा रही है।

देशभक्ति दिखाने के लिये देशद्रोही बनाये जा रहे हैे।

‘भारत माता की जय‘ को दहशत बनाया जा रहा है।

राष्ट्रीय ध्वज को छीना जा रहा है।

लोकतंत्र के सीने में उतरा हुआ खंजर है। चीखों को अट्टहासों ने दबाना शुरू कर दिया है।

लम्पट, गुण्डे-मवाली छाप लोगों के हाथ में देशभक्ति पड़ गयी है और जो देश-दुनिया और समाज की फिक्र करते हैं, उनके गले में देशद्रोही की तख्ती डाल दी गयी है, कि ‘‘निकाल सकते हो तो निकाल लो। हम तो निकालने नहीं देंगे।‘‘

कोई किसी की गर्दन पकड़ ले कि ‘‘यह देशद्रोही है।‘‘ और फिर देखिये ‘देशभक्ति‘ का खेल शुरू हो जायेगा। इस देश में देशभक्त और देशद्रोही बनना सबसे आसान हो गया है। संघ, सरकार और मोदी की आलोचना कर दीजिये, आप देशद्रोही हैं। देशभक्त बनने के लिये कुछ नारे लगाने हैं, मार-पीट करनी है और समर्थन के तेवर भर दिखाने की जरूरत है। बस! जिसे आप कन्हैया की तरह पीटेंगे वह देशद्रोही है, फिर तो मानी हुई बात है, कि पीटनेवाला पटियाला हाउस कोर्ट के वकीलों की तरह देशभक्त होगा।

पुलिस आपको हिरासत में ले, बात खत्म। न्यायालय की बारी बाद में आयेगी, ‘मीडिया ट्रायल‘ शुरू हो जायेगा। जी न्यूज बनना बड़ा आसान है। देश में लोकतंत्र का हर स्तम्भ हिल रहा है।

एक पौराणिक कथा है- शिवभक्त असुर, भष्मासुर का।

उसने कठोर तपस्या की और शिव से वरदान पा लिया कि, जिसके सिर पर वह हाथ रखेगा, वह जल कर भष्म हो जायेगा।

शिव की हालत तब बिगड़ी जब भष्मासुर, अपने विरोधियो को भष्म करते-करते, शिव को ही भष्म करने निकल पड़ा।

आधुनिक भष्मासुर अभी विरोधियों को भष्म करने में लगा है। उसके जेहन में लोक और लोकतंत्र को भष्म करने का खयाल आ गया है।

अब लोकतंत्र देवों की तरह छलिया बने, चुनावी विष्णु सुन्दरी के जाल में फंसाये और भष्मासुर से छुटकारा पाये या भष्म हो।

आप यकीन करें असुर देवों से कम चालबाज होते हैं। यहां भष्मासुर देवों की गिरफ्त में है। वह उन विरोधियों को भष्म कर रहा है, जो देव और उसके समान विरोधी हैं। वह भ्रम में है।

भ्रम को बढ़ाने के लिये, आज के सच को भुलाया जा रहा है। ऐसा लग रहा है, जैसे कब्र और श्मशान से निकले लोग आज की बांह पकड़ कर चल रहे हैं। सरकार और भाजपा और संघ खुश हो रहे हैं, कि ‘‘देशद्रोही बनाम देशभक्ति‘‘ का मुद्दा उसके पक्ष में है। राम जन्मभूमि के विवाद ने एक सरकार बनवाया था, अफजल गुरू का मुद्दा देशभक्तों की कई सरकारें बनाने के काम आयेगा। सरकार गलत सोच के सर्वोच्च शिखर पर है। संघ उन्मादी हो गया है। भाजपा को यह भरम है, कि जनमत उसके साथ है। किसी भी सरकार में ऐसी सहिष्णुता कहां मिलेगी, कि श्री राम से लेकर दुर्गा तक और महिषासुर से लेकर अफजल गुरू तक काम आ रहे हैं। भष्मासुर होने में कोई हर्ज नहीं है। उन्हें इस बात की समझ नहीं है, कि लोकतंत्र में शिव भष्मासुर की ताकत छीन सकते हैं। ताश के पत्तों पर यकीन गलत है।

सट्टे बाजों ने इस देश की संसद को ‘आदर्श जुआरियों का अड्डा‘ बना दिया है। बातें बड़ी-बड़ी होनी ही हैं, क्योंकि दांव बड़ा है। बड़ी अजीब स्थिति है, जेएनयू और वेमुला काण्ड पर जब भारत के प्रधानमंत्री ने मुंह खोला तो झूठ के पुलंदे को ‘सत्यमेव जयते‘ कहा।

यदि सत्यमेव जयते यही है, तो वेमुला का सत्य कहां है?

यदि सत्यमेव जयते यही है, तो कन्हैया कुमार और उन जैसों का सत्य कहां है, जिन्हें ठोंक-पीट कर देशद्रोही बनाया जा रहा है?

यदि सत्यमेव जयते यही है, तो उस मीडिया का सत्य क्या है, जो जेएनयू को देशद्रोहियों का गढ़ बता रहे हैं? जबकि उसी मीडिया ने सत्य को, पिटने के साथ ही, उजागर कर दिया है।

यदि सत्यमेव जयते यही है, तो उन लोगों का सत्य क्या है, जो काला कोट पहन न्यायालय से पहले ही ‘देशद्रोहियों‘ को मारने का न्याय कर रहे हैं? मीडिया को डरा रहे हैं? रवीश कुमार कहते हैं- ‘‘डरा हुआ मीडिया लोकतंत्र को खत्म कर देता है।‘‘

क्या ‘‘भारत माता की जय‘‘ लोगों को डरा नहीं रहा है?

क्या संसद में स्मृति ईरानी लोगों को डरा नहीं रही हैं?

क्या प्रधानमंत्री का सत्यमेव जयते लोगों को डरा नहीं रहा है?

हमें हमारे ही लोकतंत्र से डराना बंद कीजिये। हम देशद्रोही नहीं। देशद्रोही वो हैं, जो लोगों को डरा रहे हैं, पागल उन्मादी बना रहे हैं।

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