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जेएनयू विवाद, भारत के आज और आनेवाले कल को तय करेगा

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2 मार्च 2016, जेएनयू प्रकरण के लिये निर्णायक दिन है। कह सकते हैं, कि अपनी सनक को सही मानने वाले और इस सनक को बनाये रखने वाली सरकार को थोड़ा झटका लगा है।

  • छात्र अपने कैम्पस से बाहर निकल आये हैं, दिल्ली की सड़कों पर हुए प्रदर्शन में अनंत प्रकाश और रामा नागा जैसे, ऐसे छात्र जिन्हें अब तक हिरासत में नहीं लिया गया है, वो खुलेआम नजर आये। पुलिस ने उन्हें हिरासत में लेना जरूरी नहीं समझा। महत्वपूर्ण बात यह है, कि जेएनयू छात्र संघ की मांगों में वास्तविक एकजुटता नजर आयी, कन्हैया कुमर की रिहायी की मांग में अनिर्बन भट्टाचार्य और उमर खालिद के रिहायी की मांग को वरियता से जोड़ कर रखा गया। प्रो0 गिलानी के रिहाई की मांग उठायी गयी। कैम्पस से बाहर का ढ़ीला-ढ़ाला वामपंथी विपक्ष शायद इस बात को ठीक से समझे। संभावनायें बनती हैं।
  • छात्र संघ-अध्यक्ष कन्हैया कुमार को दिल्ली हाई कोर्ट ने 6 महीने की अंतरिम जमानत दे दी। दिल्ली पुलिस ने कन्हैया कुमार के विरूद्ध ऐसा एक भी प्रमाण पेश नहीं किया है, कि देशद्रोह जैसे गंभीर आरोप का आधार बन सके। पुलिस प्रशासन को मिली न्यायालय की फटकार को केंद्र सरकार चाहे तो अपने लिये मान सकती है। वह मान सकती है, कि अपनी गलत हरकतों से बाज आये।

किंतु, ऐसी समझदारी की उम्मीद हमें केंद्र की मोदी सरकार और उसके सहयोगी संगठनों से नहीं करनी चाहिये। यदि वो एक कदम पीछे हटते नजर आ रहे हैं, तो मान लें कि उन्होंने सिर्फ पैंतरे बदले हैं। इरादे उनके पहले से ज्यादा खतरनाक हैं।

फाॅसिस्ट ताकतें भले ही डरपोक होती हैं, मगर आतंक फैलाने की उनमें जबर्दस्त क्षमता होती है। वो देश को सरकार और सरकार को राष्ट्रवाद के उन्माद को बना कर रखने का जरिया बना देती है। भारत में मोदी सरकार की स्थिति इससे अलग नहीं है।

जेएनयू पर हमले से पहले मोदी सरकर ने स्थितियों का आंकलन ही गलत किया।

उन्होंने नहीं सोचा था, कि राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जेएनयू को इतना बड़ा जनसमर्थन मिलेगा।

उन्होंने यह भी नहीं सोचा था, कि लड़ाई विचार के स्तर पर पहुंच जायेगी। उन्होंने मान लिया था कि कमजोर वामपंथ जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय परिसर में भी कमजोर ही प्रमाणित होगा। किंतु, ऐसा हुआ नहीं।

सरकार और संघ समर्थक ‘अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद‘ के लोगों ने षड़यंत्र को जितना ओछा और विरोध को जितना हिंसक बनाया जेएनयू के वाम समर्थक छात्र संगठनों ने प्रतिरोध को उतना ही गहरा और प्रदर्शन को उतना ही संतुलित रखा। उसने यह प्रमाणित करने में बड़ी सफलता हासिल की कि जेएनयू और जेएनयू का वाम छात्र मोर्चा क्या है? उन्होंने अपनी सोच, समझ और अपनी एकजुटता को अपना हथियार बनाया। लोकतांत्रिक मूल्यों और परिसर मे अपने से असहमत मुट्ठी भर लोगों को भी इतनी जगह दी, कि जेएनयू के मूल्य पर ओछी राजनीति करने वाले एबीवीपी में भी दरारें पड़ गयीं।

सरकार, संघ और भाजपा के मोहरों को भी लगने लगा है, कि शतरंज का यह खेल गलत है। मगर शतरंज के खिलाडि़यों की समझ में यह बात नहीं आयी है। राष्ट्रवाद को उन्होंने चरम पर पहुंचाने का निर्णय ले लिया है। उन्होंने देशभक्तों के विरूद्ध देशद्रोह के आरोप और मुकदमें दर्ज कर रखे हैं। लोकतांत्रिक ढांचे के भीतर फासीवाद जैसे जीता है, वे वैसे ही जी रहे हैं। लेकिन, फासिस्टों को बेशर्म होने में ज्यादा वक्त नहीं लगता। अभी वो स्वतंत्रता, समानता, और बंधुत्व के लोकतांत्रिक मूल्यों को तोड़ रहे हैं, लोकतंत्र के राजनीतिक ढांचे को उन्होंने खिलवाड़ बना दिया है, उसे तोड़ने का साहस भी वो करेंगे। यदि वो रूके हुए हैं, तो सिर्फ इसलिये कि प्रतिरोध की गहराई, उसकी तिव्रता का वो अनुमान नहीं लगा पा रहे हैं, और उनकी गिरेबां पर जिन वित्तीय ताकतों का हाथ है, वो चाहते क्या हैं? जानने में लगे हैं।

उन्हें लगने लगा है, कि प्रतिरोध गहरा है, और वित्तीय ताकतों का खुला समर्थन उनके पास नहीं है।

उन्हें यह भी लगने लगा है, कि मीडिया और न्यायालयों पर उनका पूरा नियंत्रण नहीं है।

अभी वह यह नहीं जानते कि देश की आम जनता ‘‘देशद्रोही बनाम देशभक्ति‘‘ से बनने वाले ‘राष्ट्रवाद‘ के पक्ष में खड़ी होगी या नहीं? ऐसी राष्ट्रीयता जो जमीन, जंगल, पहाड़, नदी, नालों से प्यार करने की सलाह देता है, मगर लोगों के बीच घृणां फैलाता है। भारत इतन बड़ा है, कि डण्डे को, चाबूक की तरह फटकारा नहीं जा सकता।

हमने जेएनयू के विवाद को महत्वपूर्ण राष्ट्रीय मुद्दा माना है। अपने अध्यक्ष कन्हैया कुमार को न्यायालय से मिली थोड़ी सी राहत से, जिस खुशी और विश्वास को उन्होंने जाहिर किया है, यदि उसे ही नापें तो पता चल जायेगा, कि जेएनयू में सरकार, भाजपा और संघ के लिये कितनी नाराजगी है?

मोदी सरकार की राजनीतिक एकाधिकार और बाजारवादी नीतियों की वजह से ही जवाहरलाल नेहरू विश्व विद्यालय वामपंथी एकजुटता, गैर-वामपंथी राजनीतिक विपक्ष के समर्थन के केंद्र में आ गया है। हम राजनीति से परहेज रखने की सलाह नहीं देंगे, क्योंकि सरकार ने बाजार से साझेदारी कर ली है, और वह हमारा और हमारे देश का सौदा कर रही है।

जेएनयू भारत के आज और आनेवाले कल को तय करने में लगा है।

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