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आंदोलन हिरासत में नहीं

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केंद्र सरकार की गलत नीतियों,

उसके समर्थकों की हिंसक हाथापायी

और मीडिया के अलग-अलग रवैये ने जवाहरलाल नेहरू विश्व विद्यालय के छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार को सुर्खियों पर ला दिया है। हमेशा सुर्खियों में बने रहने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी बजट सत्र में अवतरित होने से पहले तक सुर्खियों के बाहर हो गये।

अब सरकार,

सरकार समर्थक लोग

और सरकार की पक्षधर मीडिया को यह बात बुरी लग रही है, कि कन्हैया कुमार की औकात बढ़ गयी है।

उनके समर्थन में लोग सड़कों पर आ गये हैं।

जेएनयू परिसर में ही नहीं राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी उस कन्हैया कुमार को बड़ी जगह मिल गयी है, जिसे छात्र काॅमरेड कहते हैं, और जिसे लाल सलाम मिलता है, और जो लाल सलाम कह रहा है। नारे लगा रहा है।

यह बड़ी बात हो गयी है, कि जिन वामपंथी राजनीतिक दलों को राजनीतिक परिदृश्य से खदेड़ा जा चुका है, जेएनयू में उसका न सिर्फ वजूद है, बल्कि तन कर खड़ा हो गया है। वाम राजनीतिक ध्रुवीकरण की अनिवार्यता को समझा रहा है। जन लोकतंत्र की सोच को बहस का मुद्दा बना लिया है। ‘देशद्रोही‘ के जिस चिप्पी को उन्होंने चिपकाया था, वह चिप्पी ही धुल गयी है। लेई बह रही है, गोंद की कमी पड़ गयी है, फेविकाॅल महंगा पड़ रहा है।

अब उनकी फिक्र है, कि कन्हैया कुमार को कैसे रोकें?

उनकी समझ में यह बात नहीं आ रही है, कि कन्हैया कुमार केंद्रिय विश्व विद्यालयों के बारे में उनकी गलत नीतियों और जेएनयू में गलत हस्तक्षेप की वजह से है। जिसे वो बदलना नहीं चाहते। वो अपनी गलत नीतियों और गलत रवैये को बदलने के बजाये, उसके खिलाफ खड़े लोगों को कुचल देना चाहते हैं।

विवाद को बढ़ाते हुए चाहते हैं, कि बात खत्म हो।

कन्हैया कुमार ने अपनी रिहाई के बाद, उसी रात 3 मार्च 2016 को, अपने सम्बोधन में एक बड़ी अच्छी बात कही- ‘‘आपके लिये जेल से चना लेकर आया हूं। कहावत है- जब तक जेल में चना रहेगा, आना-जाना लगा रहेगा।‘‘ जेएनयू के छात्र को बड़े लम्बे समय के बाद जेल भेजा गया है।

बात तय हुई- जेल में आना-जाना लगा रहेगा।

बात तय हुई- न तुम रूकोगे, न हम रूकेंगे।

बात तय हुई- कि हम देशद्रोही नहीं, तो तुम देशभक्त नहीं हो। देशद्रोही और देशभक्ति का मुद्दा तुमने उछाल तो दिया है, उसे संभालोगे कैसे? वह पालतु कुत्ते के गले में डाला गया पट्टा नहीं है। वह आवाम की आजादी के खिलाफ तुम्हारा रवैया है। संघ और भाजपा ने और उन्हीं के साथ केंद्र की सरकार ने ‘देशद्रोहियों‘ के खिलाफ ‘देशभक्ति‘ के जिस माहौल को बनाया वह पूरी तरह उसके माकूल नहीं रहा।

हुआ यह कि मीडिया विभाजित हो गयी।

जिस बुनियाद पर पुलिस ने कन्हैया कुमार को हिरासत में लिया, वह वीडियो ही गलत प्रमाणित हुआ। धोखा खुलेआम हो गया।

सरकार के पक्ष में खड़े होने की पुलिस विवशता जांच को एकतरफा बनाती चली गयी।

केंद्रीय मंत्री राजनाथ और स्मृति ईरानी ने झूठे तथ्यों को विश्वसनीय बताने की जल्दबाजी की।

वकीलों के द्वारा और वकीलों के वेश में पेशेवर राजनीतिक गुण्डों के द्वारा न्यायालय और न्यायालय परिसर में कन्हैया कुमार, जेएनयू छात्र-प्रोफेसर और मीडिया कर्मियों पर किये गये हमले ने सर्वोच्च न्यायालय को सचेत कर दिया

देशद्रोह के खिलाफ जन उभार बंट गया।

उमर खालिद और अनिर्बन भट्टाचार्य ने समपर्ण कर दिया।

दिल्ली सरकार की जांच टीम ने रिपोर्ट पेश कर दी कि प्रकरण झूठा है।

पाकिस्तान और आतंकवाद के पक्ष में नारे नहीं लगे।

मोदी जी का मौन उन्हें बचा नहीं सका। उनकी ‘दबंगई‘ उनकी बेचारगी में बदल गयी।

मीडिया ट्राॅयल के जरिये न्यायालय के निर्णय को प्रभावित नहीं किया जा सका।

जेएनयू में संघ केे छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद में बंटवारा हो गया। अब तो परदे के पीछे से यह भी झांकने लगा है, कि 9 फरवरी को जेएनयू में जो हुआ, उसके सूत्रधार एबीवीपी के छद्म लोग हैं। जिसमें वामपंथी छात्रों को फंसाया गया। जिस वीडियो को आधार बनाया गया, जिसे मीडिया के कुछ चैनलों ने मनमर्जी तरीके से दिखाया, वह वीडियो शिल्पी तिवारी ने अपलोड किया था, उसे वाॅयरल किया था, जिसके ट्विटर एकाउण्ट के फाॅलोवर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी सहित कई केंद्रिय मंत्री हैं।

जिन्होंने देशभक्तों को गढ़ने और देशद्रोहियों को बनाने का कारखाना खोला, उनकी परेशानी बढ़ रही है, कि माहौल उनके पक्ष में एक तरफा नहीं है, जिसकी आदत उन्हें दो साल से पड़ गयी है। उमर खालिद ने शायद ठीक ही कहा कि ‘‘उन्होंने गलत लोगों से पंगा ले लिया है।‘‘ शेहला राशिद जबर्दस्त सबक है, कि ‘‘नेतृत्व को हिरासत में लेने से आंदोलन को हिरासत में नहीं किया जा सकता।‘‘ जेएनयू की लड़ाई अब जेएनयू से बाहर भी है। एआईएसएफ ने इस बात की घोषणां की है, कि 23 मार्च -शहादत दिवस- से 24 अप्रैल -अम्बेडकर जयंती- तक ‘‘भारत जागरूकता अभियान‘‘ के तहत देशभर में कार्यक्रमों का आयोजन होगा, जिसमें कन्हैया कुमार की उपस्थिति होगी। मुद्दा कन्हैया कुमार या हिरासत में लिये गये छात्र नहीं, जेएनयू है और जेएनयू का मुद्दा उससे बाहर निकल गया है। यह लोकतंत्र के होने न होने का मुद्दा बन गया है।

मोदी के एकमात्र नेता होने की छवि का दरकना तय है। एक राष्ट्र, एक दल और एक नेता की लड़ाई, संघ और भजपा जितनी निर्ममता और चालबाजी से लड़ेगी, उसका प्रभाव भी उस पर उतना ही नकारात्मक पड़ेगा। सरकार आंदोलन को हिरासत में नहीं ले सकेगी।

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