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देशभक्ति अब बाजार में, बाजार के लिये

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यह अच्छी खबर है, कि वाम रचनाकार और सामाजिक सरोकार रखने वाले लोगों की बातें सुनी जाने लगी हैं, वो अकेले नहीं हैं। उनके पक्ष में, या विरोध में अब आवाजें आने लगी हैं। उन्होंने बढ़ती हुई सामाजिक असहिष्णुता का मुद्दा उठाया, विरोध दर्ज कराया, देख लीजिये बात अब ‘देशभक्ति‘ की होने लगी है। देशद्रोहियों के खिलाफ नारे लगने लगे हैं। कुछ लोग खुल कर कहने लगे हैं, कि ‘‘हां! देशभक्ति का ठेका हमारे पास है।‘‘ मतलब, देशभक्ति अब बाजार में है, बाजार के लिये है।

आप बाजार के साथ हैं- तो देशभक्त हैं।

आप बाजार के खिलाफ हैं, तो देशद्रोही हैं।

मुद्दे की बात यह है, कि आप कहां हैं और कैसे देशभक्त हैं?

मुद्दे की बात यह है, कि आप कहां हैं और कैसे देशद्रोही हैं?

सिक्के को उछाल कर तय किया जा रहा है, कि कौन देशभक्त है और कौन देशद्रोही है। सिक्के की सूरत राष्ट्रवादी है।

यह समझाया जा रहा है, कि राष्ट्रवाद के सिर पर टोपी, बदन पर बलशाली होने की नुमाईश करने वाला कपड़ा और हाथ में डंडा होना चाहिये। पद संचालन करना आना चाहिये। बिना कपड़े के राष्ट्रवाद दिगम्बर होता है। सोच की नग्नता नंगी तलवार है। जुबान काट लें, या गर्दन उतार लें। मुहर्रम और रामनवमी की सूरत भर अलग-अलग है। लोग एक-दूसरे को डराने में लगे हैं। यह बताने में लगे हैं, कि कत्लेआम का खतरा बढ़ रहा है।

बुद्धिजीवियों -खास कर वाम बुद्धिजीवियों- की गर्दन नापने की कोशिश हो रही है।

‘देशभक्ति‘ दिखाने के लिये ‘देशद्रोहियों‘ की मांग बढ़ गयी है। यदि हाल यही रहा तो चाय वाले से लेकर बजरबट्टू कहे जाने वाले लोगों के पास देशभक्ति का खिताब होगा और तमाम बुद्धिजीवियों, शिक्षण संस्थानों और विश्वविद्यालयों में पढ़ाने-पढ़ने वाले देशद्रोही होंगे।

समाज में विभाजन की लकीर खींची जा रही है।

यह समझाने की कोशिश हो रही है, कि ‘‘भौगोलिक अखण्डता और देश की सरकार के प्रतिनिष्ठा ही देशभक्ति है।‘‘

हमें ऐसा लगता है, कि जन साहित्य और समाज में ऐसी देशभक्ति नहीं है।

डर है, कि गोर्की निषिद्ध और प्रेमचंद को निष्कासन न मिल जाये।

डर है, कि कबीर को खण्डनवादी, निराला को विद्रोही, मुक्तिबोध, धुमिल और नागार्जुन को सिरफिरा होने का खिताब न मिल जाये।

डर है, कि ब्रेख्त, नजीम हिकमत और पाश को चपत खानी पड़े।

हिटलर के मूंछ का फैशन चल जाये और चार्ली चैप्लिन को अपनी मूंछ भारत में मुडवानी पड़े।

उन लोगों की मुश्किलें बढ़ जायें, जो देश को जन और उनकी खुशहाली में देखते हैं।

डर और आशंकाओं की कमी नहीं है, मगर अच्छी खबर भी है, कि वाम रचनाकार, सामाजिक सरोकार रखने वाले लोग अब अकेले नहीं हैं। संघर्ष सतह के ऊपर आ गया है। बाजार के लिये जीने वाले, ‘देशभक्तिों‘ की मुसीबतें भी बढ़ रही हैं।

-आलोकवर्द्धन

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