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सरकार किस चिड़िया का नाम है?

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[किसी भी दंगे के दौरान दंगाई जो करते हैं, वह उस दंगे की अपनी तस्वीर होती है। जाट आरक्षण आंदोलन की यह तस्वीर जमीन और सड़क के बीच जीने वालों की अपनी भयावह तस्वीर है। जिसे पेश किया है अंजुले एलुजना और नित्यानन्द गायेन ने।]

‘देश फिर से गुलाम हो जाएगा’.

छाछ पिलाने वाले अंकल जब राजधानी के कनॉट पैलेस इलाके में ये बोलते हैं. हम चौक जाते हैं,

‘वो कैसे अंकल’?

अंकल उल्टा सवाल करते हैं, ‘ आपको क्या लगता है जो कुछ भी मेरे हरियाणा में हुआ क्या आपको उसी की सुगबुगाहट नहीं लगी?.

‘हाँ क्यों नहीं, जो भी हुआ बहुत बुरा था’. हम बोलते हैं.

‘आदमी के अंदर इंसानियत नहीं बची है भाईसाब! हमारे यहाँ मचे दंगे के दौरान एक बिहारन औरत थी, फंस गई थी. उसने लाख हाथ जोड़े, बाबू जी मुझे जाने दीजिए. दंगाइ नही माने बोले, तुझे नाच कर दिखाना पड़ेगा. क्या करती मिन्नत-आरजू बेकार चली गई? भरी सड़क पर रोते हुए, दंगाइयों के बीच में उसे नाचना पड़ा. तब उसे जाने दिया गया’. ये बोलकर अंकल कुछ देर के लिए चुप हो जाते हैं…

मेरे दिमाग में हरियाणा की सड़कों और खेतों के बिच औरतों के अन्तःवस्त्रो की वो तस्वीरें नाच जाती हैं और तमाम ख़बरें भी. शायद अब सम्भव नहीं है उस बिहारन औरत की तरह इन कपड़ों के मालिकानों के साथ हुए ज़ुल्म का क़ानूनी पन्नों पर दर्ज़ हो पाना. छाछ वाले अंकल की तरह ही वे किसी गरीब की याद में दर्ज़ हो गईं होगी और दर्ज़ हो गया होगा, ‘यूं इंसान का हैवान हो जाना’.

10 रूपये में CP इलाके में हरियाणा के पानीपत से लाकर छाछ पिलाने वाले इन अंकल का दर्द कहाँ दर्ज़ किया जायेगा, जो 15-20 दिन दंगों की वजह से बेरोजगारी के दिनों में इनको हुई? ट्रेन चली नहीं, ‘छाछ’ लाकर ये बेच ना सके. कौन वित्तमंत्री होगा जो करेगा इनके लिए मुआवजे की घोषणा ? 10-10 लाख का मुआवजा उनके लिए जरूर घोषित कर दिया गया, जो दंगों में मरे, बिना इस जाँच के कि वो मरने वाले कहीं खुद तो दंगाई नहीं थे? कौन देगा रोहतक जैसे शहरों को उनके जले चेहरे का मुआवज़ा, जिनकी शक्लें लोगों की आँखों में बस गए शहर की तस्वीर से अब मैच नहीं करती हैं ?

अंकल का नाम ‘अशोक’ है. इनका यही कारोबार है रोज़ अपने गांव-घर से ट्रेन से लेकर आते हैं ये छाछ. यहाँ किसी ठिकाने पर साईकिल रखी हुई है. उसपर अपनी दुकान सजाते हैं और राजधानी के इन् पॉश इलाकों में लाकर बेच देते हैं. अंकल को दुःख है कि दंगों के इतने दिनों बाद भी पैसेंजर ट्रेनों की आवाजाही सही से संचालित नहीं की जा रही. सामान्य दिनों में चलने वाली 5-6 ट्रेनों के बजाय अभी 1-2 पैसेंजर ट्रेने ही हरियाणा से दिल्ली आने वाले आस-पास जिलों के रोज की सवारियों को लाने की जिम्मेदारी उठा रही हैं. अंकल ये भी बताते हैं कि,

‘मेरा हरियाणा 100 साल पीछे चला गया. गांव के बगल में कुछ कम्पनियाँ लगने वाली थीं, ज़मीन की पैमाइश कर ली गईं थी. दो तीन रोज़ में ज़मीन के मालिकों को उसके पैसे मिलने थे कि ये सब हो गया. अब वो कम्पनियां नहीं बनेगी, उन्होंने हाथ खिंच लिया. बताइए अगर ये कंपनियां लगी होती तो रोजगार किसे मिला होता ?

अंकल को शिकायत है कि विकास की बात करने वालों ने दंगाईयों को रोका तक नहीं. सरकार किस चिड़िया का नाम है? दंगों के दौरान जिसका पता नहीं था ?

वैसे अंकल की छाछ बहुत अच्छी थी. डाइजेशन के लिए बहुत अच्छी. पेट को उसने राहत जरूर पहुंचाई लेकिन उनकी बातों ने, उनके सवालों ने, दिलो-दिमाग में एक ऐसी हलचल पैदा दी, जिसको किसी भी मेडिसिन से शांत कर पाना संभव नहीं है.

लेखन : अंजुले एलुजना

प्रस्तुति : नित्यानन्द गायेन

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