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‘यूथ फाॅर राइट टू एम्प्लाॅयमेंट’ ने प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों को भेजे मांगपत्र

youth-for-right-to-employmentदेश में बेरोज़गारी लगातार बढ़ती जा रही है। लोग काम माँग रहे हैं। बेरोज़गारी से पैदा अवसाद के चलते युवा आत्महत्या कर रहे हैं। सरकारें सिर्फ भाषणों से पेट भरना चाहती हैं और दूसरे मुद्दों में उलझाए रखना चाहती हैं। बेरोज़गारी को इस स्थिति तक पहुँचाने में अबतक सत्ता में रही सभी सरकारें ज़िम्मेदार हैं। सभी राजनीतिक दल जिम्मेदार हैं, क्योंकि उन्होंने इस विषय पर कोई बड़ा जन-दबाव नहीं बनाया। जिसका परिणाम हुआ कि बेरोज़गारी बढ़ती जा रही है। अबतक रोज़गार-बाज़ार में सिर्फ उच्च वर्ग और पुरुषों का कब्ज़ा था, परन्तु अब बैकवर्ड क्लास, दलित और स्त्रियाँ बड़ी संख्या में पहली बार काम माँग रहे हैं। वे शिक्षित हैं और रोज़गार चाहते हैं। लेकिन रोज़गार के दरवाजे बन्द हैं।

एक आसान-सा प्रश्न है कि अगर सरकारें लोगों को रोज़गार देना चाहती हैं तो अपने तमाम विभागों में रिक्त पड़े पदों को पहले क्यों नहीं भरतीं? सभी राज्यों में लाखों-लाख पद रिक्त हैं, वार्षिक बजट में स्वीकृत सभी पदों के लिए पैसा आवंटित होता है; फिर भी इन पदों को नहीं भरा जाता। सरकारों के पास इसका कोई जवाब नहीं है। जो लोग तमाम डिग्रियाँ लेकर सड़कों पर हैं, जो कुशल हैं, पहले उन्हें रोज़गार क्यों नहीं मिलता?

बेरोज़गारी का दंश झेल रहे तमाम युवा संगठित हो रहे हैं। ऐसे ही युवाओं का एक अनौपचारिक संगठन ‘यूथ फॉर राइट टू एम्प्लॉयमेंट’ के नाम से पिछले कई महीनों से सड़कों पर है। आज इन्होंने भारत के सभी मुख्यमंत्रियों और प्रधानमंत्री को अपना माँग पत्र भेजा है। उनकी दो माँगे हैं- वे चाहते हैं कि लाखों-लाख रिक्त स्वीकृत पदों के भरने के लिए सरकार एक आयोग बनाए। यह आयोग निष्पक्ष हो और इन रिक्त पदों की समीक्षा करने के साथ इन्हें भरने के लिए तत्काल दिशा-निर्देश दे। उनकी दूसरी माँग यह है कि रोज़गार के अधिकार को मौलिक अधिकार बनाया जाए। काम पाना सभी सक्षम नागरिकों का हक़ बनाया जाए। ये दोनों ही माँगें बेहद ज़रूरी हैं। अगर रिक्त पदों को भर दिया जाए तो लाखों लोगों को आत्महत्या से बचाया जा सकेगा। लाखों-लाख परिवार बच सकेंगे। और किसी भी स्वस्थ लोकतन्त्र में रोज़गार की न्यूनतम सुरक्षा होनी ही चाहिए। दुनिया के तमाम देश अपने नागरिकों को यह सुरक्षा देते हैं। हमारे देश को भी इसपर ध्यान देना चाहिए। आप को यह माँग भले ही नक्कारखाने में तूती की आवाज़ लगती हो, पर यह मुद्दा चर्चा में आ जाने के बाद तमाम राज्यों में हो रहे चुनाव में उलट-फेर करने की ताक़त रखता है। हमें यह सोचना चाहिए कि अगर हम बेरोज़गारी को लेकर गम्भीर नहीं हैं, तो हम अपने समाज को अपराधीकरण से नहीं बचा सकते। इस देश में 65% से ज्यादा युवा हैं। उनका आक्रोश और अवसाद सिर्फ देश के लिए नहीं, बल्कि वर्तमान सरकारों के लिए भी संकट पैदा कर सकता है। देखना यह होगा कि सरकारें इससे कैसे निपटतीं हैं।

मुद्दे की बात यह है कि काम के अधिकार को मौलिक अधिकार का दर्जा हासिल नहीं है, और जब तक यह दर्जा हासिल नहीं है, सरकारें अपनी जिम्मेदारियों से बरी हो जाती हैं, जबकि अनिवार्यता इस जिम्मेदारी को उठााने की है। ‘यूथ फाॅर राइट टू एम्प्लाॅयमेंट’ की संगठित कोशिश यही है।

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