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निदा नवाज़ की पांच कविताएं

Nida Nawaz

1. जीवन झांकता

जीवन बुझे हुए
चेहरे की पॉवडर-तले छुपी
हर उस झुर्री में से झांकता है
जो ग्राहक के निकलते ही
पछतावे और मजबूरी की पीड़ा से
और गहरी हो जाती है .

***

जीवन पसीने की हर उस
पवित्र बूंद में से झांकता है
जो एक अपमानित मज़दूर के माथे से
रोटी और पेट के बीच की
थका देने वाली दूरी
काटते गुए गिरती है .

***

जीवन कलम से टपकने वाले
हर उस कठोर शब्द में से झांकता है
जो मेरे आदिमख़ोर शहर में
अपनी घायल पीठ पर
घटनाओं-भरे इतिहास को
बंधुआ मज़दूर की तरह उठाता है .

***

जीवन मेरी कविताओं की
हर उस सिमटी हुई पंक्ति
में से झांकता है
जो गोलियों की वर्षा में बैठे
डर और ख़ौफ़ से
बीच में ही काट दी जाती है .

***

जीवन समय की सूली पर चढ़े
हर उस व्याकुल पल में से झांकता है
जब कविता के बीच में ही
विचार का चंचल पंछी उड़ कर
अन्तरिक्ष के शून्य में
खो जाता है .

***

जीवन हमारे दिलों ही हर उस
बेतरतीब धड़कन में से झांकता है
जो रात के समय
अजनबी क़दमों की आहट सुनकर
दरवाज़े की कुण्डी चढाते हुए
गूंज उठती है .

 

2. अमावस

सिरहाने रखे सपने
सांप बन जाते हैं
जब बारूदी धुएँ में
पूर्णिमा
अमावस बन जाती है
बच्चों के पालने
प्रश्न बन जाते हैं
जब गोलियों की गून्ज
लोरी बन जाती है .

 

3. काले बादल का टुकड़ा

दोपहर की रूपहली धूप को
जाते हुए मैंने भी देखा
ऊँचे नंगे पर्वतों से
एक काले बादल का
टुकड़ा आया
और धूप की सारी किरणों को
समेट लिया
नगर-नगर अंधियारा फैला
घर-घर से
चमगादड़ों की चीखें गूंजी
पेड़-पेड़ पर
उल्लू बोले
बादल के इस
काले बिछू ने
बुद्धि को भी डंक मार दिया
लोग एक दूसरे का मांस
नोचने लगे
बेटे ने बाप को
काट के फेंका
भाई ने भाई का
गला घोंटा
अब हर एक के हाथ में
टूटी तलवारें
हर एक के कपड़ों पर
अपने ही ख़ून की छींटे
हर दिशा हैं
लाशों के ढेर
उन पर झपटते
आवारा कुत्ते
मंडलाती चीलें और कौए
मैं
हड्डियों के पंजरे के अन्दर
अपनी आँखों की ठिठकी ठहरी
सहमी बूँदों में
सिमट गया हूँ
कौए,चीलें और
आवारा कुत्ते
मुझको एक हड्डियों का
पिंजरा समझ कर छोड़ गये हैं
और मेरी भर्राई आँखों में
यह रिसता सपना
कि उस दोपहर को
केवल एक बार, मैं
फिर से देखूँ
हड्डियों के पिंजरे से निकलूँ
आकाशों में उड़ जाऊँ .

 

4. रचनात्मक वेदना

गहरा जाती है ख़ामोशी
मेरे बाहरी व्यक्तित्व पर
मेरी जीभ पर
चढ़ जाते हैं चुप्पी के ताले
सूंघ जता है मुझे
अचानक कोई
काला भूरा सांप
धीरे-धीरे मेरे भीतर
जल उठती है एक मशाल
फड़फड़ाने लगते हैं
मेरे विचारों के सारे कबूतर
देखते ही देखते भरते हैं वे
ऊँची उड़ान
मेरे भीतरी ब्रम्हाण्ड के
सभी आसमानों पर
(रौशन होजाता है
मेरा विवेक संसार )
मेरे भीतर बदलने लगते हैं
बहुत से मौसम
होती है कहीं पर भरी वर्षा
और कहीं खिल उठती धूप
कहीं पर सागर ठाठें मारे
और कहीं बिछ जाती रेत
कहीं ग्रीष्म की गर्मी पिघलाए
कहीं जम जाए बर्फ़ की सिल
कहीं कोई नाग डंस ले मुझको
कहीं दहाड़े बबर शेर
कसी मरघट पर कहीं
बोलते हैं बहुत सारे उल्लू
लटक जाते हैं कहीं
मेरे भीतर
मेरे बचपन की यादों पर खड़े
किसी भूतिया पेड़ पर
बहुत से चमगादड़
कहीं कोई हिरण
भर रही है कुलाचें
कहीं गाती है कोई
कोयल गीत
कहीं किसी भीतरी क़तलगाह में
मुझे दी जाती हैं
संसार भर की सभी मौतें
एक साथ
कहीं मेरे रिश्तों के
सूखे खलिहान में
लग जाती है भयंकर आग
(वे कुतरना चाहते हैं
मेरे एक एक कबूतर का पंख )
कहीं मेरे सामने खड़ा होजाता है
वही कंकाल आदमी
झुर्रियों की जकड़न झेलता
उसकी अधजली चमड़ी पर
भिनभिनाती हैं मक्खियाँ
उसकी उदास नज़र
छेदती है मेरी आत्मा
मेरे भीतर जन्म लेता है
जैसे कोई मसीहा, सुकरात
मार्क्स ,लेनिन
जैसे मैं खड़ा हो जाता हूँ
अर्ब के किसी
रेगिस्तानी टीली पर
एथेन्ज की गलियों में
लेनिनग्राद के बिलकुल सामने
कहीं मैं टहलने लगता हूँ
अतीत के किसी गलियारे में
मुझे याद आती है
मीफि़या मंत्री की गाली
फौजी का चांटा
आतंकवादी की हिट-लिस्ट
मेरे देश के लोकतंत्र पर से
जैसे गुज़र जाते हैं हज़ारों हाथी
संविधान के पन्नों पर
मुझे दिखते हैं रेंगते दीमक
मेरी भीतरी चौखट पर
लेता है आख़री हिचकी
आतंकवादी का काल्पनिक ईश्वर
बाहरी चुप्पी
और भीतरी हलचल के बीच
किसी सोनामी की तरह
रास्ता निकालती है
मेरी रचना
मेरे सारे कबूतर
लोट आते हैं वापस
छुप जाते हैं
मेरी बौद्धिक कोशिकाओं में
और एक ऊँची उड़ान
भरने के लिए
आने वाले करोड़ों वर्षों पर फ़ैले
बहुत सारे आसमानों पर.

 

5. तुम ज़रुर गाना मेरी लाडली

(हर उस बेटी के नाम जिसके म्यूजि़क बैण्ड “प्रागाश” पर
कश्मीर घाटी में एक फुत्वा द्वारा पाबंदी लगा दी गई)

तुम डरना नहीं मेरी लाडली
बल्कि सीखना
डर को एक सुरेली लय में
ढालने की कला
तुम ज़रुर गाना
और मुस्कुराना भी
अपनी ख़ुशी के लिए
अपने सपनों के लिए
और उन लोगों के लिए भी
जिनके रेतीले विचारों को
तुम्हारे गीतों के तीव्र बहाव से
डर लगता है
वे तुम्हें धकेलना चाहते हैं
प्राचीन घुफाओं में वापस
इनकी नज़रों में तुम्हारे अर्थ
कडुवे क्सीले धुएं
एक मेटर्स के गिलाफ़
और बच्चे जनने की एक मशीन
के सिवा कुछ भी नहीं
वे कुतरना चाहते हैं तुम्हारे पंख
छीन लेना चाहते हैं तुम से
तुम्हारी मुस्कुराहटें
तुम्हारे सपने
तुम ज़रुर मुस्कुराना मेरी लाडली
और मुस्कुराते मुस्कुराते
गाना भी कोई गीत
प्यार का,मानवता का,ब्रम्हाण्ड का
और गाते गाते
तुम डालना तारों पर कमंदें
मुठी में भर लेना
सारे कहकशां
छूना सारे आसमां
कि तुम मेरी लाडली
वह तितली हो
जिस ने तेज़ हवाओं में भी
उड़ना अब सीख लिया है .

-निदा नवाज़

कवि परिचय :-

निदा नवाज़
जन्म :- ३ फरवरी १९६३ ( पुलवामा – कश्मीर)
शिक्षा :- एम.ए.मनोविज्ञान ,हिंदी ,उर्दू ,पत्रकारिता,एम.एड.

प्रकाशन :- “अक्षर अक्षर रक्त भरा”-1997, “बर्फ़ और आग”-2015 -हिंदी कविता संग्रह. “सिसकियाँ लेता स्वर्ग”-2015-हिंदी डायरी.साहित्य अकादेमी द्वारा प्रकाशित“उजला राजमार्ग” में शामिल कश्मीरी कविताओं का हिंदी अनुवाद-स्वास्थ्य मंत्रालय,भारत सरकार की 35 पुस्तिकाओं का अंग्रेजी से हिंदी,उर्दू और कश्मीरी में अनुवाद.विज्ञान प्रसार, विज्ञान मंत्रालय की रेडियो विज्ञान डाक्यूमेंट्रीज़ का निरंतर पिछले पांच वर्षों से कश्मीरी अनुवाद.आकाशवाणी श्रीनगर केंद्र के सम्पादकीय कार्यक्रम”आज की बात” का पिछले २७ वर्षों से लेखन .

पुरस्कार :- * केन्द्रीय हिंदी निदेशालय ,भारत सरकार द्वारा हिंदीतर भाषी हिंदी लेखक राष्ट्रीय पुरस्कार ,*हिंदी साहत्य सम्मेलन प्रयाग द्वारा साहित्य प्रभाकर ,*मैथलीशरण गुप्त सम्मान ,*भाषा संगम,इलाहबाद(उ०प्र०)एवं हिंदी कश्मीरी संगम (कश्मीर)द्वारा युग कवि दीनानाथ नादिम साहित्य सम्मान और ल्लद्यद साहित्य सम्मान .*शिक्षा मंत्रालय जे.के.सरकार का राज्यपाल की ओर से राज्य पुरस्कार .

संपर्क :- निदा नवाज़, एक्सचेंज, एक्सचेंज कोलोनी, पुलवामा -102301
ईमेल :- nidanawazbhat@gmail.com

प्रस्तुति : नित्यानंद गायेन

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