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सरकार अपनी सूरत दिखा रही है

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सरकार अपनी सूरत दिखा रही है। यह हम पर है, कि हम उसे देखें या न देखें। वैसे देखने की सुविधा है।

देशभक्त बनाम देशद्रोही का आईना है। आप देख लें कि संघ, भाजपा और सरकार कितनी देशभक्त है? और जो ‘देशद्रोही‘ कहे जा रहे हैं, वो क्या हैं?

बजट का आईना है। आप देख लें कि आर्थिक विकास की दिशा क्या है? जो दिखाया जा रहा है, वह कितना वास्तविक है?

संसद का सत्र चल रहा है। संसद में स्मृति ईरानी, राजनाथ सिंह, अरूण जेटली और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी हैं। आप देख सकते हैं, कि कौन सच के कितना करीब है? किसकी फिक्र क्या है? और वो कह क्या रहे हैं?

राष्ट्रवाद की फिक्र हमें करनी चाहिये और राष्ट्रीय होने के सवाल पर आमने-सामने बैठ या खड़ा हो कर हमें बातें भी करनी चाहिये। इस बात को अच्छी तरह समझ लेना चाहिये, कि राष्ट्रवाद को हंथियार बनाना खतरनाक है। और उसे अपने तरीके का कपड़ा पहनाना, जरूरत से ज्यादा खतरनाक है। सरकार किसी हिंदू के माथे पर टीका, मौलाना की दाढ़ी या किसी फादर का सफेद चोंगा नहीं हो सकती है। उसे होना नहीं चाहिये। वह सेना के हाथों का हथियार भी नहीं है। यदि ऐसा होगा, तो राष्ट्रवाद खतरनाक मुद्दा है। राष्ट्रवादी होना खतरनाक हरकत है। जबकि, अपनी जमीन, अपने लोग और अपने देश को प्यार करना स्वाभाविक है।

लेकिन, जो स्वाभाविक है, उसे टुकड़ों में बांटने से मुश्किलें बढ़ रही हैं। यह मुश्किल सिर्फ देश और आवाम के लिये नहीं है, बल्कि सरकार के लिये भी है। सरकार समर्थक लोग और संघ जैसे हिंदूवादी संगठन बे-लगाम हो गये हैं। उनकी हरकतों में पागलपन आ गया है। वो हर उस चीज को तोड़ने पर आमादा हैं, जिसे लोकतंत्र और चुनी हुई, सरकार की छवि बनती है।

जेएनयू प्रकरण का जो सबसे बुरा पक्ष हमारे सामने आया है, वह यही है, कि इसे देशद्रोह बनाम देशभक्ति का मामला बना दिया गया है। एक ऐसा नारा बना दिया गया है, जिसे लगा कर चोर-उच्चके भी देशभक्त बन रहे हैं। और सोचने वाल हर वह आदमी जो देश और समाज की फिक्र करता है, किंतु जिसकी फिक्र देश की चुनी हुई सरकार की नीतियों के विरूद्ध है, उसे देशद्रोही बना दिया जाता है। उसे लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात भी रखने नहीं दी जा रही है। ऐसे लोगों के खिलाफ प्रचार अभियान चलाया जा रहा है। उनके आयोजनों पर हमले हो रहे हैं, और ऐसे हमलावरों के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं हो रही है। जो खुले मंच पर देश के संविधान की धज्जियां उड़ा रहे हैं, उन्हें देशभक्त कहा जा रहा है। ऐसे लोग भी ‘देशभक्त‘ हैं, जो झूठे आरोप रचते हैं, फर्जी सबूत बनाते हैं, ‘देशद्रोहियों‘ पर हमला करते हैं, मार-पीट और जान से मारने की धमकी देते हैं, यह बताते हैं, कि अब तो लाठी की ही चलेगी।

यदि लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात कहने और विरोध करने को आप रोक देंगे, तो अपनी बात कहने और विरोध का तरीका क्या होगा?

सरकार यह तय करेगी या आम जनता को यह तय करने के लिये आप विवश कर रहे हैं?

सरकार ऐसा क्यों कर रही है?

जिसके एक कंधे पर वित्तीय ताकतों के हितों की जिम्मेदारी है, और दूसरे कंधे पर संघ सवार है। एक के लिये अपना मुनाफा ही सबकुछ है, और दूसरे के सिर पर हिंदू राष्ट्रवाद का भूत सवार है।

12 मार्च को ‘एडवांसिंग एशिया सम्मेलन‘ में अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष के प्रमुख क्रिस्टीन लोगार्ड ने मेक इन इण्डिया और डिजिटल इण्डिया की बातें की और भारत के द्वारा ‘और अधिक सुधारों के वायदों‘ को बढ़ावा दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सुधारों के लिये बदलाव की गति और तेज करने का आश्वासन दिय। यह आयोजन अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष और भारत सरकार ने किया।

12 मार्च को ही भाजपा के अध्यक्ष अमित शाह ने संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा में मोदी सरकार की उपलब्धियों का ब्योरा दिया। उन्होंने सरकार के हिंदुत्व के एजेण्डे को आगे बढ़ाने के लिये ‘नमामिगंगे‘ अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस जैसे अभियान का जिक्र किया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि ‘‘सरकार ने हिंदूत्व के एजेण्डे से समझौता नहीं किया है, बल्कि उसे आगे बढ़ाया है।‘‘ संघ ‘देशद्रोहियों‘ के खिलाफ सख्त कदम उठाने का दबाव बना कर रखा है।

अब अपने दोनों ही कंधों पर सवार बोझ को केंद्र की मोदी सरकार आम जनता के कंधों पर न सिर्फ डाल रही है, बल्कि विरोध को कुचलने की नीति पर चल रही है। जेएनयू के मुद्दे को ‘देशद्रोह बनाम देशभक्ति‘ के सांचे में ढ़ाल रही है। आम जनता तक उनके पहुंच के तमाम राहों को रोक रही है। फर्जी सबूतों और मीडिया ट्राॅयल और विरोध प्रदर्शनों के जरिये जेएनयू को देशद्रोहियों का गढ़़ और उसके छात्र संघ अध्यक्ष से लेकर चुनिंदा छात्रों को देशद्रोही और आतंकी करार दे रही है।

13 मार्च को ‘‘मैं जेएनयू बोल रहा हूं‘‘ (जेएनयू स्पीक्स) अभियान के तहत मुजफ्फरनगर के कार्यक्रमों में रूकावटें पैदा की गयीं। हैदराबाद में जेएनयू छात्रसंघ उपाध्यक्ष शेहला राशिद ने ‘ईएफएलयू‘ और ‘हैदराबाद विश्वविद्यालय‘ में छात्रों को सम्बोधित किया। उन्होंने मुद्दे की सही पहचान कराई। मुजफ्फरनगर में आयोजित कविता कृष्णन और आशुतोष कुमार के आयोजन में एबीवीपी और भाजपा युवामोर्चा के लोगों ने भारी बवाल मचाया, पत्थराव किये। आम्रपाली आॅडिटोरियम के आरक्षण को निरस्त कराया, उसके बाहर आयोजन में व्यवधान पैदा किये- पत्थराव, मार-पीट की। वहां कार्यक्रम होने नहीं दिया। अंत में भाकपा-माले कार्यालय के सामने एक बड़ा आयोजन हुआ। कविता कृष्णन ने सरकार के जनविरोधी चरित्र को उजागर किया।

यदि 12 और 13 मार्च की घटनाआं को एक सीध में खड़ा कर दें, तो पता चल जायेगा कि सरकार और भाजपा-संघ ऐसा क्यों कर रही हैं?

सरकार अपनी जनविरोधी सूरत दिखा रही है और चाहती है, कि उसकी ‘देशभक्ति‘ पर लोगों का यकीन पक्का हो।

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