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रमेश प्रजापति की दो कविताएँ

12325007_10154058675528593_381332785_n1. महानगर में मज़दूर

अभी-अभी आए हैं पूर्वांचल से
या शायद मालदा से
रेलगाड़ी में चढ़कर दिहाड़ी मज़दूर
पेट में मचलती इच्छाएँ
और हाथों में लिए रोज़ी-रोटी का हुनर
मुस्कुरा रहे हैं उतर के
महानगर के प्लेटफाॅर्म पर
उमंग से दमक रहा है उनका चेहरा

अभी-अभी आए है वे
यह उनके जीवन के
अच्छे दिन हैं, जिसमें बुरे दिनों को अँगूठा दिखाते
मेहनत के पसीने से
टुकड़ा-टुकड़ा बिखरी खुशियों को समेटकर
भेजने को आतुर हैं वक़्त की धूल में लिपटे
उदास घरों में

स्मृतियों में कौंधते ही
खाली बर्तनों की खनखनाहट
और दमकते ही घर भर के उदास चेहरे के
कोई मायने नहीं रखता रात-दिन होना
इन्हें नहीं अखरता
काम का छोटा-बड़ा होना
इनकी आँखों में झाँकती है उस भूखी माँ की लाचारी
जिसने कुछ दिन पहले
वक्त के हाथों
मासूम बेटियों को बेच दिया कोडि़यों के भाव

संवेदनाओं से दूर खड़ा शहर
अपनी ज़रूरतों की ख़ातिर
जवानी के साथ-साथ निचोड़ लेता है इनकी
हड्डियों का फास्फोरस तक
हाड़ कँपा देने वाली ठंड़ में
मिट्टी में खेलते अधनंगे बच्चे को छोड़कर
श्रम में तल्लीन रहते
उफ! तक नहीं करते ये दिहाड़ी मज़दूर
और
भूखे-प्यासे, धूप, पानी से बेख़बर
ढोते रहते हैं अपनी पीठ पर
महानगर की खुशियाँ

एक दिन भाषा की दुहाई देता हुआ महानगर!
इन्कार कर देता है पहचानने से इनको
इमारतों की नीव में दबी
पसीने की बूँदों
भूखे बच्चों की कुनमुनाहट को
बल्कि इनकी खुशियों के फूलों पर
धड़ाधड़ता गुजर जाता है
महानगर के विकास का पहिया।

 

2. रूखे बालों में कनेर का फूल

जीवन में पसरे
अँधेरे के विस्तार से
डर जाता हूँ कि गाँव की घूल
और शहर की सड़कों पर खेलते
दिन-प्रतिदिन बड़ी हो रही हैं बेटियाँ
एक अनजान डर पसरता जा रहा है भीतर
क्योंकि ‘महिला सशक्तिकरण’ के इस दौर में भी
तार-तार हो जाती है नारी की अस्मिता

आवारा हवा के झोंके में
झड़ने से बचीं ताज़ा कोंपलें
ऐसे मुस्कुराती हैं धरती पर फैले
हरे समुंद्र की सघनता में
जैसे जीवन के कष्टों को भूलकर
उम्मीद से भरी नाव
चमकती है अँधेरे की छाती पर
दुनिया के बेरहम हथकंड़ों और
दहकते पलाश वन से
बचकर निकल आता हूँ चुपके से
झुलसी आत्मा के साथ
कि कुछ ज़रूरतें रखी हैं अभी मेरे कंधों पर
आशा और निराशा की लहरों के बीच
छटपटाता रहता हूँ बाज़ार की दलदल में फँसा
कि बची रहे बच्चों की उछलकूद
और आँगन में झरते रहे खुशियों के फूल
इसी तरह घूमती रहे पृथ्वी अपनी धुरी पर
ध्रुव तारा देता रहे पत्नी को तसल्ली

यूँ ही हँसता रहे अँधेरे की माँद में
सैकड़ों प्रकाश-वर्ष दूर बैठा सूरज
ऐश्वर्य के संसाधनों के बीच वर्चस्व की बहस में
लाभ-हानि के गणित में उलझा
खिसक जाता हूँ अक्सर चुपके से
उस प्रतीक्षारत घर की तरफ
दुःखों की आँच में
मुरझाया हुआ है जिसका चेहरा
दुनियादारी के बाज़ार से
हार जाता हूँ अक्सर
कि बची रहे हिलने से घर की जड़ें
चिडि़या के सपने में
महकती रहे धान की सुगन्ध
विश्वग्राम की परछाई से दूर
मेरे गाँव की भोली-भाली लड़की के
रूखे बालों में
यूँ ही ठूँसा कनेर का फूल
पश्चिम की खिड़की से
कुदकर आए चालक समय को
ठेंगा दिखा रहा है।

-रमेश प्रजापति

2015 का मलखान सिंह सिसोदिया कविता पुरस्कार युवा कवि रमेश प्रजापति को

के॰पी॰ सिंह मेमोरियल ट्रस्ट की अध्यक्ष नमिता सिंह ने एक प्रेस विज्ञप्ति में कहा है कि मलखान सिंह सिसोदिया कविता पुरस्कार-2015 के लिए युवा कवि रमेश प्रजापति के कविता संग्रह ‘शून्यकाल में बजता झुझझुना’ का चयन किया गया है। रमेश प्रजापति अपनी जन-जीवन से जुड़ी लोकधर्मी कविताओं के लिए चर्चित हैं। सन् 2006 में उनका पहला कविता संग्रह ‘पूरा हँसता चेहरा’ प्रकाशित हुआ था। उनकी अनेक कविताओं का मलयालम, पंजाबी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में अनुवाद हुआ है। जीवन संघर्षों से जुड़े कवि रमेश प्रजापति की कविताओं में साधारणजन के संघर्षों के स्वर मुखर होते हैं। ‘शून्यकाल में बजता झुनझुना’ की कविताएँ अपने समय को प्रतिबिंबित करती हैं।

युवा कवि रमेश प्रजापति को यह पुरस्कार के॰पी॰ सिंह मेेमोरियल ट्रस्ट द्वारा 2 अप्रैल, 2016 को अलीगढ़ में आयोजित कार्यक्रम में प्रदान किया जायेगा। कविता पुरस्कार के निर्णायक मण्डल में प्रख्यात कवि श्री नरेश सक्सेना तथा युवा आलोचक और समीक्षक प्रो॰ वेद प्रकाश थे।

प्रस्तुति : नित्यानन्द गायेन

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