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यह डर है

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किसी मंदिर पर आपने तिरंगा को लहराता हुआ नहीं देखा होगा। किसी मस्जिद, गिरजाघर या गुरूद्वारे के लिये भी यह जरूरी नहीं है। धर्म ध्वज और राष्ट्रीय ध्वज अलग-अलग ही रहे हैं। यह धर्म और राष्ट्र की आपसी समझदारी है….. किसी के ऊपर किसी की वरियता नहीं। लेकिन, भारत में इस समझ को तोड़ा जा रहा है।

पहले केंद्रीय विश्व विद्यालयों में 207 फूट ऊंचा राष्ट्रीय झण्डा लहराने का निर्णय आया।

सनक ही सही। चलो अच्छा है।

मगर नारों और झण्डों से राष्ट्रीय या अराष्ट्रीय तय करने का नजरिया गलत है।

भारत माता की जय

और वंदेमातरम् बोलवाने की जिद्द

या

झण्डा लहराने को अपनी जीत मानना, सहज तो नहीं है।

क्या इसे हम सहज मानें कि मुम्बई के माहिम दरगाह में तिरंगा फहराया गया। भारत माता की जय के नारे लगाये गये। शिवसेना के नेता हाजी अरफात शेख ने कहा- ‘‘यह ओवैसी और देशद्रोही नेताओं को देशभक्ति दिखा कर, दिया गया करारा जवाब है।‘‘

यह करारा जवाब किसको है?

देशद्रोही कौन है?

धर्म, जाति, सम्प्रदाय और राष्ट्र के नाम पर देश और समाज को बांटने वाले या कोई और?

क्या देशद्रोहियों को बनाने, उनकी शिनाख्त के लिये फर्जी सबूत बनाने वाले देशभक्त हैं या देशभक्त कोई और हैं?

यह कौन तय करेगा कि देशभक्ति क्या है, और देशद्रोह क्या है?

ओवैसी ने गलत कहा कि ‘‘कोई उनकी गर्दन पर चाकू रख दे तब भी वो भारत माता की जय नहीं बोलेंगे।‘ क्योंकि देश के संविधान में भारत माता की जय बोलना, जरूरी नहीं है।

ओवैसी का साथ हम नहीं दे सकते, मगर यह सवाल तो पैदा होता है, कि गर्दन पर छुरी रखने की सोच कहां से आयी?

कौन है, जो लोगों की देशभक्ति और देशद्रोही का खिताब दे रहा है?

नारे लगाने या झण्डा फहराने से यदि देशभक्ति आती तो देशभक्त बनना सबसे आसान होता। एक झण्डा एक तस्वीर से ही काम चल जाता अपनों के लिये जीने और मरने, अपने देशवासियों की बेहतरी के लिये लड़ने, शहादत देने की नौबत ही नहीं आती। लेकिन देशभक्ति यह नहीं है।

कन्हैया कुमार को जबरन देशद्रोही बनाने वाले और तीन घण्टे तक पुलिस हिरासत में, मार-मार कर ‘भारत माता की जय‘ बोलवाने वाले वकीलों को तो देशभक्त कहा नहीं जा सकता। जिन्होंने पहली बार हमारे मन में वंदे मातरम और भारत माता की जय से खौफ फैलाया, तिरंगे को लहरा-लहरा कर भय पैदा किया। उन लोगों को तो देशभक्त नहीं ही कहा जा सकता जो सत्ता और सरकार के लिये समाज को बांट रहे हैं?

या उन लोगों को हम देशभक्त कहें जो किसी ‘देशद्रोही‘ का जीभ काट कर लाने वाले के करोड़ और गोली मारने वाले को लाखों का ईनाम देने की घोषणायें करते हैं।

आम लोगों के पास लाख और करोड़ तो है नहीं।

देश के प्रधानमंत्री सेना से जरूरी उद्योगपतियों को बताते हैं, कोई कुछ नहीं कहता। मगर ‘अफ्सपा‘ को हटाने और सेना की ज्यादतियों का जिन्होंने जिक्र कर दिया, वो देशद्रोही हो गये।

प्रधानमंत्री ने ‘विश्व सूफी सम्मेलन‘ में ‘इस्लाम को शांति का धर्म‘ करार दिया।

मानी हुई बात है तारीफ होनी थी, तारीफें हुईं।

आप कह कर देखिये तो, देशभक्ति का खिताब आपसे छिन जायेगा। आपको उमर खालिद बना दिया जायेगा। मास्टर माईण्ड बना दिया जायेगा।

देखते हैं, चड्डी को पैंट बनाने से समझ कितनी बदलती है?

हम तो यह भी देख रहे हैं, कि ‘देशद्रोह‘ के कानून को बदलने की बात हो रही है।

इस बीच समाज में इतने देशद्रोहियों को बनाया गया है, कि समझना मुश्किल हो गया है, कि इस देश में देशद्रोही ज्यादा है, या देशभक्त?

लोगों को डराना बंद करें। देशद्रोह से डराना बंद करे। आम आदमी ही देशभक्त होता है।

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