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बड़ों का चक्कर बड़ा है! कोल ब्लाक आबंटन- चौदहवां एफआर्इआर

coal_scam__660_071013100246सवालों के दायरे में कुछ ऐसे सवाल हैं, जिसका जवाब देश की आम जनता दे सकती है, मगर उसके पास इन सवालों का ठीक-ठीक जवाब नहीं है, और ऐसी कोर्इ जगह नहीं है, जहां से उन्हें सवालों का सही जवाब मिल सके। यही हमारे जनतंत्र के विकास की राजनीतिक संस्कृति है। आप इसे समझदारी की विवशता भी कह सकते हैं। यह भी कह सकते हैं, कि जिनके पास हर एक सवाल का सटिक जवाब है, वो ही सवालों को उलझाने और जवाब को छुपाने में लगे हैं। लीप-पोत कर बराबर करने का उनका अनुभव दशकों पुराना हैं राजनीतिक भ्रष्टाचार और आर्थिक घोटालों की बरसात ने लोगों को इतना गीला कर दिया है, कि नयी बारिश या बारिश का घूम फिर कर बरसने का कोर्इ असर नहीं होता है।

कोल ब्लाक आबंटन का मामला, फिर से हुर्इ बारिश है। कांग्रेस के लिये बाढ़ और डा0 मनमोहन सिंह के लिये चक्रवाती तूफान है। मगर जानकार जानते हैं, कि यह सब अनसुलझे सवाल हैं। मामला उनका है, जो सियासत ही नहीं, सियासतबाजों के हुक्मरां हैं। जिनके आगे लालू यादव महज बेचारे हैं। जिनके खिलाफ निर्णय हुआ और अब वो जेल से निकलने की फिराक में हैं।

सीबीआर्इ ने कोल ब्लाक आबंटन घोटाले में आदित्य बिड़ला ग्रुप के चेयरमैन कुमार मंगलम बिड़ला और उनकी कम्पनी हिंडाल्को इंडस्ट्रीज लिमिटेड के खिलाफ एफआर्इआर दर्ज किया। इस चौदहवें एफआर्इआर में कुमार मंगलम के साथ पूर्व कोयला सचिव पी0 सी0 पारिख और कोयला मंत्रालय के कुछ अनाम अधिकारियों को भी आरोपी बनाया गया है। सनसनी कुमार मंगलम बिड़ला हैं।

अभी कुछ दिन पहले -शायद पिछले महीने में- रिलायंस ग्रुप के अनिल अम्बानी भी अदालत में हाजिर हुए थे। जहां सम्बंधित मामले में उनकी याददास्त खो गयी। यदि कोल ब्लाक आबंटन का मामला इस मुकाम तक पहुंचा, तो उनकी याददास्त बची रहेगी या चली जायेगी? बताया नहीं जा सकता। पत्र-पत्रिकाओं और टीवी चैनलों ने बताया कि कुमार मंगलम बिड़ला बड़े आदमी हैं। आदित्य बिड़ला ग्रुप के चेयरमैन हैं। जो 6 महाद्वीप के 36 देशों में कारोबार करती है, और कुमार मंगलम भारतीय एवं वैशिवक कम्पनियों के बोर्ड के प्रमुख हैं। 2.45 लाख करोड़ का उनका साम्राज्य है। एक लाख तीन हजार छ: सौ लोग इनकी सेवा करते हैं, ताकि आर्थिक साम्राज्य खड़ा रहे, पले-बढ़े और बड़े-बड़े काम करे। भारत में उदारीकरण के पैगम्बरों का नाम रौशन करें।

यह मामला तो नवम्बर 2005 का है, जब सार्वजनिक उपक्रमों की कम्पनियों के लिये कोयले के खदानों के आबंटन को निजी कम्पनियों के हवाले कर दिया गया। और विवादहीन रूप से इसके लिये तात्कालिन कोयला मंत्री डा0 मनमोहन सिंह की जिम्मेदारी बनती है। साथ ही सरकार की भी जिम्मेदारी बनती है, कि राष्ट्रीयकृत कोयले के खदानों का आबंटन निजी क्षेत्र की कम्पनियों को क्यों किया गया? सीबीआर्इ के द्वारा दायर एफआर्इआर के मुताबिक 2005 में कुछ लोगों ने (बाद में जिन्हें आबंटित किया गया) प्रशासनिक अधिकारियों के साथ मिल कर अपराधिक साजिशें की (क्या मंत्रालय और सरकार की अनुमति के बिना?) और तालाबीरा-2 तथा तालाबीरा-3 कोयला खदानों के आबंटन में पक्षपात किया। तालाबीरा-2 खदान तमिलनाडु सरकार की पीएमयू नेवेली लिग्नाइट को दी जानी थी, लेकिन तत्कालीन कायेला सचिव पी0सी0पारिख ने हिंडाल्को को फायदा पहुंचाया। उन्हाेंने पीएसयू नेवेली लिग्नाइट के साथ साझा करने की अनुमति दी।

राष्ट्रीयकरण के ओट में कोयला खदानों के निजीकरण की शुरूआत मनमोहन सिंह के मंत्रालय ने की।

कोयला मंत्रालय की स्क्रीनिंग कमेटी की बैठक में बिजली उत्पादन के लिये सार्वजनिक क्षेत्र की कम्पनियों का आबंटन हुआ था। किसी भी निजी कम्पनी के नाम से यह आबंटन नहीं हुआ था।

सवाल यह है कि इस निर्णय को किसने बदला? कोर्इ सचिव तो इस निर्णय को बदल नही सकता। यदि कोर्इ बदल सकता है, तो मौजूदा सरकार और उसके कोयला मंत्रालय के सर्वोच्च द्वारा ही बदला जा सकता है। जोकि मनमोहन सिंह थे। और यह मामला अकेला नहीं है। अन्य निजी कम्पनियों को भी ऐसे आबंटन से लाभ पहुंचाया गया है। वर्तमान एफआर्इआर में सीबीआर्इ ने बिड़ला व हिंडाल्को के साथ पूर्व कोयला सचिव पर अपराधिक साजिश और भ्रष्टाचार निरोधक कानून के तहत केस दर्ज किया है।

क्या आपको ऐसा नहीं लगता, कि राष्ट्रीयकरण के ओट में निजी करण का यह अपराध स्वयं सिद्ध है?

इसमें किसी भी न्यायिक कार्यवाही या जांच की जरूरत ही नहीं है, मामला बिल्कुल साफ है, कि उदारीकरण के मौजूदा पैगम्बरों ने यह काम किया है, जो आज भी उदारीकरण को राष्ट्रीय नीति बना रहे हैं। या यूं मानें कि बना चुके हैं।

क्या ऐसा नहीं लगता कि जांच की लम्बी प्रक्रिया गैर जरूरी है?

सीबीआर्इ किस चीज की जांच कर रही है? और जांच से हमें हासिल क्या होगा? क्या यह मुददा सिर्फ भ्रष्टाचार और अपराधिक साजिश का है?

वास्तव में यह मुददा राष्ट्रीय नीति को बदलने का है, वह भी बिना किसी वैधानिक प्रक्रिया के। बिना संसद और आम जनता की सहमति के।

राष्ट्रीयकरण के लिये यदि संसद की स्वीकृति आवश्यक थी, तो उसे बदलने के लिये की गयी मनमानी क्या संसद से ऊपर किसी और के होने का प्रमाण नहीं है?

क्या यह राज्य और समाज की प्राकृतिक संपदा की लूट नहीं है? इस लूट का क्या मतलब है?

क्या देश के प्रधानमंत्री और पूर्व कोयला मंत्री मनमोहन सिंह की छवि इतनी उजली है, कि वो कोयले को उजला कर सकते हैं? पी0 सी0 पारिख का कहना है, कि प्रधानमंत्री को आरोपी नं0 एक बनायें। बात में दम है, कि ”यदि कोर्इ साजिश हुर्इ है तो इसमें कर्इ लोग शामिल हैं। कोल ब्लाक पाने के लिये प्रधानमंत्री के सामने प्रस्तुति देने वाले कुमार मंगलम बिड़ला एक साजिशकर्ता हैं, तो मैंने सभी दस्तावेजों की जांच की थी और सिफारिश की थी, इसलिये दूसरा साजिशकर्ता मैं हूं। प्रधानमंत्री के पास उस समय कोयला मंत्रालय भी था, अंतिम मुहर तो उन्होंने लगार्इ थी, इसलिये वो तीसरे साजिशकर्ता हुए। यदि साजिश हुर्इ है, तो सभी को आरोपी बनाया जाये। प्रधानमंत्री को पहला साजिशकर्ता बनाया जाये, क्योंकि सबसे बड़ी जिम्मेदारी उन्हीं की थी।” उन्होंने कोयला राज्य मंत्री दसारी नारायण राव को भी आरोपी बनाने की पेशकश की, क्योंकि सभी फार्इलें उनके टेबुल से गुजरी थीं। इस मामले में पारिख अकेले नहीं हैं। उनका साथ देने वाले लोग भी हैं। मनमोहन सिंह की पूरी र्इमानदारी उने कार्यकाल के अंतिम घड़ी में दम तोड़ रही हैं। सरकार की फिक्र मनमोहन सिंह नहीं उधोग जगत है। उसे विवादों से बाहर रखने की नीति है।

सरकार को बा-र्इज्जत बरी कैसे किया जा सकता है?

क्या इस नजरिये से ऐसा नहीं लग रहा है, कि जांच की प्रक्रिया और उसके बाद जो होना है, वह एक ओट है?

नव-उदारवादियों ने सारी दुनिया में अपने देश की संसद एवं अपने देश की जनता के साथ अपनी आर्थिक नीतियों को लागू करने के लिये, ऐसा ही किया है। उन्होंने लोकतंत्र और संसद की सर्वोच्चता को ताक पर रख कर मुक्त बाजारवादी नीतियों को लागू किया है। हमारे देश में कोल ब्लाक आबंटन का मुददा अन्य राजनीतिक भ्रष्टाचार और आर्थिक घोटालों की तरह जांच की खिड़की के सामने लार्इन लगाये खड़ी रहती और धीरे-धीरे या तो बिखर जाती या वहीं बैठ जाती, मगर प्रधानमंत्री बनने से पहले मनमोहन सिंह कोयला मंत्री थे, और यही इसके चर्चित रहने की वजह है। यही इसका राजनीतिकरण है। भारतीय जनता पार्टी एवं एनडीए के कार्यकाल के दौरान भी निजी कम्पनियों को ऐसी हिस्सेदारी दी गयी है। यही कारण है कि राजनीतिक रूप से इस मुददे को राष्ट्रीयकरण की ओट में निजीकरण के नजरिये से नहीं देखा जा रहा है।

आज भी सरकार या विपक्ष की चिंता यह नहीं है कि की गयी गलितयों को सुधार कर राज्य की सम्पतित और देश की प्राकृतिक सम्पदा को सुरक्षित किया जाये। उसे आम जनता के हितों से जोड़ा जाये। उनकी चिंता यह है कि अर्थव्यवस्था के उदारीकरण को ऐसे विवादों से झटका लगेगा। टू-जी स्पेक्ट्रम की तरह ही निजी कम्पनियों का आकर्षण घट जायेगा। प्रचारित यह किया जा रहा है कि ऐसे ‘विवादों’ (वो घोटाला नहीं कहते) से देश के आर्थिक विकास एवं आर्थिक सुधारों की गति रूक जायेगी।

ऐसा कह कर, ऐसा प्रचारित करके, क्या आप यह नहीं कह रहे हैं, कि निजी कम्पनियों और कारपोरेशनों के बिना अब देश का आर्थिक विकास संभव नहीं है। क्या आप यह नहीं कह रहे हैं कि आर्थिक विकास और सुधारों के लिये रजानीतिक भ्रष्टाचार और आर्थिक घपले-घोटालों को नजर अंदाज कर देना ही अच्छा होगा? कुछ लोग तो यह भी कहते हैं, कि इससे देश की संसद और देश का आर्थिक विकास कर रही निजी कम्पनियों की छवि खराब हो रही है।

M_Id_429623_Kumar_Mangalam_Birlaदर्ज एफआर्इआर के विरूद्ध अन्य निजी राष्ट्रीय एवं बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की तरह हिंडाल्को का पक्ष बिल्कुल साफ है कि कनाडा की एल्युमीनियम कम्पनी एल्कान की भारतीय इकार्इ इंडाल ने 1996 में तालाबीरा-2 कोयले की खदान के लिये आवेदन किया था। इंडाल का हिंडाल्को ने 2000 में अधिग्रहण किया। इंडाल के आवेदन को ही हिंडाल्को ने आगे बढ़ाया और 2005 में उसी आधार पर आबंटन हुआ। इस तरह इस आरोप का कोर्इ आधार नहीं बनता है कि पारेख और कुमार मंगलम की मुलाकात से ‘स्क्रीनिंग कमेटी’ के निर्णय को बदला गया। जो भी हुआ वह मंत्रालय के वैधानिक प्रक्रिया के तहत हुआ। तालाबीरा-2 और तालाबीरा-3 कोयला खदानों को संयुक्त रूप से महानदी कोल फिल्डस और नेयवेली लिग्नाइट को आबंटित किया गया। दोनों सरकारी कम्पनियां हैं। इस साझे में डिंडाल्को की हिस्सेदारी मात्र 15 प्रतिशत है।

अब जांच कायेला मंत्रालय और निजी कम्पनियों के बीच घूमती रहेगी। बड़े-बड़ों के पीछे घूमने का जो परिणाम होता है, यहां भी वही होगा।

• न्यायालय में पेश सीबीआर्इ की जांच रिपोर्ट में कोयला मंत्रालय और प्रधानमंत्री कार्यालय ‘आवश्यक संशोधन’ कराती है- अवैध रूप से, तो होने दीजिये।

• ढेरों आवश्यक फार्इलें मंत्रालय से गायब हो जाती हैं। तो हो जाने दीजिये।

• आर्थिक विकास और उदारीकरण के नाम पर निजी कम्पनियों को फायदा पहुंचाया जाता है, तो पहुंचाने दीजिये।

• यदि निजी कम्पनियां मजबूत नहीं होंगी, तो आर्थिक विकास कैसे होगा? कैसे मनमोहन सिंह जी देश को मजबूत बनायेंगे? करोड़ों गरीब और भुक्खड़ के बीच यदि चंद लोग भी यदि मजबूत होते हैं, तब ही न वो कीचड़ में फंसे गाड़ी को खींच पायेंगे? जिस कीचड़ को उन्होंने ही बनाया है।

यह सवाल गैर जरूरी है, कि आम आदमी की हालत क्यों बिगड़ रही है, और देश की अर्थव्यवस्था क्यों गोते लगा रही है? आप मानें कि गोताखोर ही छुपे हुए खजाने की खोज समुद में करते हैं। गोता नहीं लगायेंगे तो उबरने का मजा कैसे आयेगा? सरकार की चिंता मनमोहन सिंह नहीं जो डूब रहे हैं, उसकी चिंता कुमार मंगलम बिड़ला हैं, जिन्हें ले कर उधोग जगत नाराज है। जिसे विश्वास में लेने के लिये पी0 चिदम्बरम मिल रहे हैं, विराप्पा मोइली कह रहे हैं- ”सीबीआर्इ औरंगजेब हो गयी है। यह भारत है रूस नहीं, जहां उधोगपतियों को जेल में डाला जाता है।” मोइली साहब चीन में भ्रष्टाचारियों को फांसी की सजा भी दी जाती है, आप यह जानें। और अब वहां राजनेता ‘आलोचना और आत्म-आलोचना’ कर रहे हैं, अपनी गलितयों और अपराध को सार्वजनिक रूप से स्वीकार कर रहे हैं, ताकि उदारीकरण की गलितयों को सुधारा जा सके और समाजवाद की ओर वापसी संभव हो सके। मुक्त बाजार व्यवस्था सिर के बल खड़ी व्यवस्था है, उसे आज नहीं तो कल पांव पर तो खड़ा होना ही होगा।

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