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सिर के बल चलती विकल्प की बहस

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बहस जारी है और लम्बी खिंच चुकी है।

सवाल यह है- ‘‘क्या हमारे पास कोई विकल्प है?‘‘….. ‘‘यदि है, तो क्या? और नहीं है, तो हम बहस क्यों कर रहे हैं?‘‘

संघर्ष का विकल्प।

सत्ता का विकल्प।

विकल्प के रूप में मान लिया गया कि पूंजीवाद का विकल्प समाजवाद है। जन विरोधी सरकार के विरूद्ध जनसमर्थक सरकार का विकल्प हमारे सामने है। यह भी मान लिया गया है, कि वैचारिक रूप से कोई मतभेद नहीं है। समाजवाद के लिये समाजवादी क्रांति हो या विकास के जरिये समाजवाद की स्थापना हो, दोनों का आधार माक्र्सवाद है। लेनिनवाद और माओवाद के बीच की दूरियां कोई मसला नहीं है। यदि सोवियत संघ में लेनिनवाद को असफलता झेलनी पड़ी है, तो चीन से भी माओवाद को खदेड़ा जा चुका है। दुनिया भर में यह हुआ है, कि समाजवाद का समाज व्यवस्था के रूप में पराभव हुआ है।

असफलतायें हमें स्वीकार हैं।

इसके बाद भी सच यह है, कि आज भी समाज व्यवस्था के रूप में पूंजीवाद का विकल्प समाजवाद है, और साम्राज्यवाद से छुटकारा समाजवादी वैश्विक एकजुटता से ही संभव है।

जोकि, विश्व परिदृश्य में अप्रभावी है।

या अपने पांव पर खड़ा भी नहीं है।

यदि लातिनी अमेरिका एवं कैरेबियन देशों के समाजवादी सरकारों की बातें करें, तो साम्राज्यवादी ताकतों से उनकी सामरिक सुरक्षा रूस से जुड़ी हुई है और आर्थिक रूप से वो चीन पर निर्भर है। संयुक्त राज्य अमेरिका देश की प्रतिक्रियावादी ताकतों को सहयोग दे, राजनीतिक अस्थिरता पैदा कर रहा है।  संवैधानिक तरीके से सत्ता का अपहरण कर रहा है, आर्थिक हमले कर रहा है।  विकास के जरिये समाजवाद के सामने गंभीर संकट है। क्यूबा आर्थिक सुधारों के लिये विवश हो गया है, वेनेजुएला में सत्ता का क्रमिक अपहरण जारी है। विकास के जरिये समाजवाद की अवधारणां को गहरा आघात लगा है। किंतु यह आघात समाजवाद की विसंगतियां नहीं हैं, बल्कि पूंजीवादी एवं साम्राज्यवादी ताकतों के द्वारा उस पर थोपी गयी है।

मतलब, समाजवादी दुनिया के बिना समाजवादी व्यवस्था नहीं चला सकते। देश की आम जनता कुछ भी चाहे, मुट्ठी भर लोगों के पीछे खड़ी साम्राज्यवादी वित्तीय ताकतें समाज के विकास की सही एवं स्वाभाविक दिशा को रोक सकती है। युद्ध और आतंक को जरिया बना लेती है।

समाजवादी क्रांति के बाद, जिस सर्वहारा वर्ग की तानाशाही का जिक्र माक्र्सवाद-लेनिनवाद में है, उसे भी सोवियत संघ में स्टाॅलिन के बाद ख्रुस्चेव के काल से भ्रष्ट होते हुए हम देख चुके हैं। संशोधनवादियों ने समाजवादी व्यवस्था को सिर्फ सोवियत संघ में ही नहीं, वैश्विक समाजवादी संरचना को ही तोड़ दिया।

साम्राज्यवादी हमलों और विश्व बाजार की अनिश्चयता से समाजवादी दुनिया को प्रभावित किया जा सकता है, उसे तोड़ा जा सकता है, यह सबक सिखा दिया।

यह स्वाभाविक तो नहीं है।

इन वैश्विक वित्तीय ताकतों ने इतनी आर्थिक, इनती सामरिक एवं राजनीतिक ताकतें हासिल कर ली हैं, कि ये किसी भी देश के खिलाफ दशकों आर्थिक एवं सामरिक लड़ाईयां लड़ सकती हैं।

किसी भी देश के जन समर्थक और जन प्रतिरोध को तोड़ा जा सकता है।

किसी भी देश को इराक और लीबिया की तरह ध्वस्त किया जा सकता है।

किसी भी देश की वैधानिक सरकार का तख्तापलटा जा सकता है।

किसी भी देश को सीरिया बनाया जा सकता है, उसे गृहयुद्ध की आग में धकेला जा सकता है।

समाजवादी क्रांति के लिये संघर्षों की भी यही स्थिति है।

लोकतंत्र को इन ताकतों ने राजनीतिक भुलावा बना दिया है।

यदि हम अमेरिकी लोकतंत्र की बात करें तो आम जनता के सामने या तो डेमोक्रेट है, या रिपब्लिकन है। वो जितायें किसी को, नीतियां एक ही रहनी हैं। वित्तीय पूंजी की तानाशाही ही चलनी है।

दिखावटी लोकतंत्र का चुनाव राजनीतिक धोखा है।

भारत में भी कुछ ऐसी ही स्थितियां बन गयी हैं। चुनावी तरीके से ही काॅरपोरेट ने अपनी सरकारें बना ली हैं। यूपीए की मनमोहन सरकार और एनडीए की मोदी सरकार में नीतिगत एकरूपता है। मनमोहन ने उदारीकण की ओट को बना कर रखा मोदी ने निजीकरण को खुलेआम कर दिया। उसने हिंदूवादी राष्ट्रवाद को भी सिर पर लाद दिया है। लोकतंत्र के लिये गंभीर खतरा पैदा हो गया है। वह एक साथ राष्ट्रवाद (उग्र) और वित्तीय ताकतों के हितों को साध रही है। उसने सरकार विरोधियों को देशद्रोही बनाना शुरू कर दिया है।

मनमोहन सिंह की सरकार ने माओवादियों को आतंकवादी बनाया और मोदी सरकार ने वामपंथियों को देशद्रोही बनाना शुरू कर दिया है।

बहस जहां से चली थी, वहीं पहुंच जाती है, कि विकल्प क्या है? सामाजिक परिवर्तन और बाजारवादी, विश्व व्यवस्था को बदलने का तरीका क्या है? लोकतंत्र की तमाम राहें बंद होती जा रही हैं, और हथियारों से लड़ने की ताकत सरकार से बहुत कम है। उसके पास वैधानिक अधिकार है। ऐसी मीडिया है, जो आम जनता को घुमा देती है। सरकारें बाजर की साझेदार बन गयी हैं। जनविरोधी हो गयी हैं।

विकल्प जनसमर्थक सरकार के लिय वर्गगत राजनीतिक चेतना ही है, और यह आसान नहीं है, क्योंकि अपने देश की सरकार बनाने का अधिकार बड़े ही तरीके से आम जनता के हाथों से छीन लिया गया है। राज्य की सरकारें शोषण और दमन की ऐसी इकाईयां बन गयी हैं, जो अब कारोबार भी करती है। जहां पूंजी की वरियता को स्थापित किया जा चुका है।

इस तरह, संघर्ष और सत्ता के तमाम विकल्पों को रोक दिया गया है। जो हैं, उसे ही मानने की विवसता पैदा की जा रही है। इसके बाद भी इस बहस का सबसे दिलचस्प और निष्कर्ष के मुकाम पर पहुंचा हुआ सच यह है, कि ‘‘पूंजी और बाजार पर टिकी यह व्यवस्था संकटग्रस्त है, इसे बना कर रखा नहीं जा सकता। यह सामाजिक विकास की सर्वोच्च अवस्था नहीं है।‘‘

अब ढ़लान पर लुढ़कती हुई मौजूदा व्यवस्था से हमें यह पूछना चाहये, कि क्या माक्र्सवाद का विकल्प तुम्हारे पास है?

सिर के बल चलती बहस को पांव के बल खड़ा करके देखें, शायद आप निष्कर्ष तक पहुंच जायें। युद्ध-आतंक, शोषण-दमन और बढ़ती हुई विकल्पहीनता से निकलने की राह तो निकालनी ही होगी।

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