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घुंघरू परमार की कविता

ghungru-parmarबिगड़ी हुई लड़कियां

1.

गाँव की लड़कियां
अब बिगड़ने लगी हैं
वे जाने लगी हैं स्कूल साईकिल से
पढ़ने लगी हैं किताबें
छोड़कर सिलाई –कढ़ाई, अचार-पापड़
सीखने लगी हैं कंप्यूटर
तर्क करने लगी हैं कुतर्कों के खिलाफ़
लड़ने लगी हैं
राह चलते लम्पटों से
पुरुष प्रधान समाज हैरान हैं
लड़कियों की नई हरकतों से !

 

2.

छोटे कस्बों की लड़कियां
संभालने लगी हैं
पिता का व्यापार
रखने लगी हैं
खर्चों का हिसाब –किताब
पढ़ाने लगी हैं ट्यूशन
छोड़कर कित-कित
खेलने लगी हैं क्रिकेट –फूटबाल
लम्बी चोटियाँ कटा कर रखने लगी हैं
थ्री स्टेप बाल
समाज में फ़ैल गयी बात
बिगड़ने लगी हैं
लड़कियां |

 

3.

वे कहते हैं
महानगरों में जाकर बिगड़ने लगी हैं
गाँव की भोलीभाली लड़कियां
बहसों, जुलूसों में लेने लगी हैं भाग
भूलने लगी हैं परम्परा और संस्कार
मांगने लगी हैं आज़ादी
अधिकार और रोजगार
शहर खतरनाक हैं लड़कियों के लिए
लड़कियों में विद्रोह भरता है शहर और शिक्षा
दोनों से इन्हें दूर रखा जाए !

 -घुंघरू परमार

 

परिचय :-

शिक्षा – हिंदी साहित्य में एम ए , बी.एड
भागलपुर विश्वविद्यालय से हिंदी में साहित्य पीएचडी कर रही हैं
फेसबुक पर सक्रीय। कुछ लेखन प्रकाशित।
निवास – कोलकाता।

प्रस्तुति : नित्यानन्द गायेन

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