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कीचड़ में

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मेरे जेहन से यह बात निकल चुकी है, कि ‘‘कीचड़ में कमल खिलता है।‘‘

बे-मौसम के बरसात से भी, घर के सामने कीचड़ इतना भर जाता है, कि घर के पिछवाड़े बसने वाले सूअर सामने भी डेरा डाल देते हैं।

मैंने कहा- ‘‘कीचड़ में सूअर पलते हैं।‘‘

इतना सुनते ही कुछ लोगों ने डंडे निकाल लिये।

जिससे मैंने यह बात कही थी, उन्होंने डंडे निकालने वालों को बड़ी मुश्किल से समझाया कि ‘‘भैया जी, आप गलत समझ रहे हैं।‘‘

मेरी किस्मत अच्छी थी, कि मैं पिटने से बच गया और भैया जी समझ गये।

आलोकवर्द्धन

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