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युद्ध और आतंक की बढ़ती अनिवार्यता

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मुक्त व्यापार और बाजारवादी अर्थव्यवस्था का व्यापक प्रभाव दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ा है। जहां गिरावट, आर्थिक अनिश्चयता और वित्तीय संकट है। जिससे लातिनी अमेरिकी एवं कैरेबियन देशों की वित्त व्यवस्था भी प्रभावित हुई है। वैश्विक वित्तीय संकट का सीधा प्रभाव उन पर भी पड़ा है इस बात का दबाव भी उन पर पड़ा है, कि वह अपनी अर्थव्यवस्था को ‘आपसी सहयोग एवं समर्थन‘ की नीति से संभालने के अलावा उसे वैश्विक अर्थव्यवस्था के अनुरूप बनाने की कोशिश भी करें।

और यह कोशिश उनकी अपनी अर्थव्यवस्था और महाद्वीपीय अर्थव्यवस्था के लिये सबसे बड़ा खतरा है।

संयुक्त राज्य अमेरिका के ‘बैकयार्ड‘ बने रहने के जिस विवशता से कैरेबियन और लातिनी अमेरिकी देश निकल चुके थे, वित्तीय संकट ने उन्हें उसी रास्ते पर ला कर फिर से खड़ा कर दिया है। कहा जा सकता है, कि वित्तीय संकट उनकी समाज व्यवस्था के राजनीतिक संकट को भी आमंत्रित कर चुका है। वेनेजुएला में दक्षिणपंथी ताकतों ने वहां के नेशनल असेम्बली पर कब्जा कर लिया है।

‘विकास के जरिये समाजवाद की अवधारणा‘ के सामने गंभीर संकट है। यह संकट क्यूबा के समाजवादी क्रांतिकारी सरकार के सामने भी है। जिसकी अर्थव्यवस्था चीन के सहयोग और जिसकी सामरिक सुरक्षा रूस पर टिकी हुई है और जहां अब संयुक्त राज्य अमेरिका की राजनीतिक मौजूदगी भी है। राजनीतिक दूतावास की स्थापना के बाद, अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने क्यूबा की दो दिवसीय यात्रा की। यह किसी भी अमेरिकी राष्ट्रपति की पहली यात्रा थी।

कुछ अमेरिका समर्थक विश्लेषकों ने ओबामा की क्यूबा यात्रा को अपने कार्यकाल के आखिरी साल में, एक कूटनीतिक सफलता के रूप में रेखांकित किया। वो इस रूप में देख रहे हैं कि सीरिया और यूक्रेन के मुद्दे में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से मिली मात की भरपायी क्यूबा और लातिनी अमेरिकी देशों से हो रही है।

यह बात अपने आप में महत्वपूर्ण है, कि आतंकवाद के खिलाफ जिस साम्राज्यवादी युद्ध की शुरूआत अमेरिका और उसके सहयोगी देश कर चुके हैं, उसने आतंकवाद को विस्तार ही दिया है। यह ठीक है, कि इन साम्राज्यवादी ताकतों ने आतंकवाद को अपने हित में हथियार की तरह उपयोग किया है, किंतु इस सच को अस्वीकार नहीं किया जा सकता, कि इससे राजनीतिक अस्थिरता भी बढ़ी है और आर्थिक संकट भी गहरा हुआ है। जो साम्राज्यवादी देशों के लिये भी घातक प्रमाणित हो रहा है।

यूरोप के महत्वपूर्ण देशों पर आतंकी हमले हो रहे हैं- बु्रसेल्स पर हुआ आतंकी हमला उसी की नयी कड़ी है।

एशियायी देशों पर हो रहे साम्राज्यवादी हमलों ने यूरोप को शरणार्थी संकट की सौगात भी दी है। इस संकट से हो यह भी रहा है, कि ‘‘आर्थिक संकट और कटौतियों से नाराज लोगों के बीच नस्लवाद तेजी से फैल रहा है। यूरोप की पूंजीवादी लोकतांत्रिक व्यवस्था फाॅसिस्टवाद का शिकार हो रही है।

कह सकते हैं, कि पूंजीवादी लोकतंत्र के चेहरे पर फाॅसीवाद का चेहरा उभर रहा है। खुद अमेरिका वित्तीय तानाशाही के जाल में है। ओबामा के ‘पिवोट टू एशिया‘ ने चीन में असुरक्षा की भावना और अपने विस्तार को सुरक्षा की ऐसी अनिवार्यता में बदल दिया है, कि एशिया एक बड़े युद्ध के मुहाने पर खड़ा है। सीरिया का संकट अमेरिकी नीति के संतुलन को रूस के पक्ष में, बदल दिया है। विश्व का बंटवारा मुक्त व्यापार के दो शिविरो में हो गया है। यही कारण है कि विश्व युद्ध का खतरा भी बढ़ गया है।

सोवियत संघ और समाजवादी विश्व ने वैश्विक युद्ध के खतरे को हमेशा नियंत्रित किया है। यह ऐतिहासिक सत्य हैं इसलिये समाजवादी शिविर का न होना या पूर्व समाजवादी देशों में अमेरिकी साम्राज्यवाद का बाजारवादी अर्थव्यवस्था के साथ होना, एक बड़े युद्ध की अनिवार्यता को बढ़ा रहा है। वैश्विक वित्तीय ताकतों के लिये युद्ध हमेशा से एक अवसर रहा है। इसलिये अमेरिकी साम्राज्य के नीतियों की सफलता और उसकी असफलता, दोनों ही स्थिति में एक बड़े युद्ध की अनिवार्यता को सुनिश्चित करता सा लग रहा है।

यूरो-अमेरिकी साम्राज्यवाद अपनी तमाम कुरूपताओं के साथ हमारे सामने है। उसकी सूरत पहले से ज्यादा खतरनाक है, क्योंकि वह बुरी तरह घायल है। उसकी वैश्विक आर्थिक एवं राजनीतिक संरचना टूट और बिखर रही है। क्यूबा में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा और क्यूबा के राष्ट्रपति राउल कास्त्रो के बीच (मानवाधिकार और लोकतंत्र के बीच) का मतभेद खुले तौर पर इस बात का प्रमाण है, कि आपसी सम्बंधों में घात और प्रतिघात हैं खुले में हो रही सेंधमारी है। आतंक का विस्तार युद्ध की अनिवार्यता का भी विस्तार है।

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