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वैश्विक मंदी के फिर से उभरते खतरे – 1

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पूंजीवाद और उसकी बाजारवादी अर्थव्यवस्था अनिश्चयता के गहरे दलदल मे है। उसके पास ना तो वापस होने का विकल्प है, और ना ही आगे बढ़ने की कोई सूरत नजर आ रही है। वह जहां है, वहां ठहरने की कोई जगह ही नहीं है। चारो ओर सिर्फ गिरावट है, ऐसी गिरावट जहां उम्मीदें भी टिक नहीं रही हैं।

सालों से चल रहे वित्तीय संकट से उबरने के लिये जहां भी नजरें टिकती हैं, वहीं संकट की नयी सूरतें सामने आ जाती हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका से शुरू हुए वैश्विक मंदी का विस्तार आज भी हो रहा है। अमेरिका के बाद यूरोप संकटग्रस्त हुआ और अब उभरती हुई अर्थव्यवस्था के संकटग्रस्त होने की खबरों से उम्मीदें टूट रही हैं।

चीन गोते लगा रहा है।

रूस मंदी में है।

लातिनी अमेरिकी देशों की हालत बिगड़ती जा रही है।

एशिया और अफ्रीका में राजनीतिक अस्थिरता है। युद्ध और आतंक का रोज बढ़ता खतरा है।

विश्व अर्थव्यवस्था पर कर्ज का बढ़ता बोझ है।

वैश्विक वित्तीय ताकतों की बनती सेहत से न तो विश्व अर्थव्यवस्था की सेहत सुधरती है, ना ही संकटग्रस्त देशों की अर्थव्यवस्था में सुधार की गुंजाईशें बनती हैं।

पूंजीवादी बाजारवाद का संकट गहराता जा रहा है।

अंतर्राष्ट्रीय बाजार में औद्योगिक कच्चे माल की कीमतें लगातार गिर रही हैं।

उत्पादन के क्षेत्र में भारी गिरावट है। इकाईयां बंद हो रही हैं।

श्रम बाजारो में बेरोजगारों की तादाद लगातार बढ़ रही है। लोगों का गिरता हुआ जीवन स्तर भूख और गरीबी की चपेट में है।

तेल उत्पादक देशों की तरह खनिज उत्पादक क्षेत्रों की हालत गंभीर है।

खनिज के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर काम करने वाली दैत्याकार ‘ऐंग्लो-अमेरिकन‘ कम्पनी ने घोषणा की है कि वह दुनिया भर में काम करने वाले 85,000 कामगरों को उनकी नौकरी से निकालेगा। अपने 60 प्रतिशत सम्पत्ति को बेच देगा और अपने 55 माईनिंग साइट को घटा कर 20 कर देगा।

ऐंग्लो-अमेरिकन माइनिंग कम्पनी के इस घोषणा का तात्कालिक प्रभाव यह हुआ कि औद्योगिक कच्चे माल -खनिज उत्पाद- लोहा, कोयला, तांबा, निकल और मैग्नीज जैसे पदार्थों के मूल्यों में गिरावट आ गयी। इनकी कीमत में, साल 2009 के बाद से, अब तक की सबसे बड़ी गिरावट है। यह अपने न्यूनतम स्तर पर है, जिसकी सबसे तीखी प्रतिक्रिया चीन में साफ नजर आ रही है।

चीन विश्व बाजार का उत्पादन केंद्र है।

दिसम्बर 2015 के दूसरे सप्ताह में जारी किये गये अधिकारिक आंकड़े के अनुसार नवम्बर में चीन के निर्यात में, वैश्विक मांग में आयी गिरावट की वजह से भारी गिरावट आई है। चीनी मुद्रा युआन अपने 4 साल के सबसे निचले स्तर पर है। आशंका यह है, कि यदि चीन का वित्तीय विभाग अपना सहयोग हटा ले तो उसके मुद्रा का मूल्य और गिर जायेगा। ऐसा होने पर वैश्विक वित्त व्यवस्था में एक और अपस्फिति पैदा हो जायेगी।

2008 के वित्तीय संकट के तुरंत बाद के सालों में यह आम समझ थी कि ‘ब्रिक्स देश‘ और दुनिया के उभरते हुये बाजारों से, विश्व पूंजीवाद को नया आधार मिल जायेगा। उसे संभलने का मौका मिल जायेगा। किंतु अब इसमें भी दरारें दिखने लगी हैं।

चीन की अर्थव्यवस्थ में- ठहराव और गिरावट है।

ब्राजील की अर्थव्यवस्था सिकुड रही है। वहां 1930 के महा-मंदी को फिर से झेलने की स्थितियां पैदा हो गयी हैं।

रूस मंदी के दौर से गुजर रहा है।

भारत काॅरपोरेट कर्ज के लगातार बढ़ते जाने की समस्या झेल रहा है। और

दक्षिण अफ्रीका महाद्वीपीय अर्थव्यवस्था के साथ कच्चे माल की कीमतों में आयी गिरावट का शिकार हो गया है।

उभरती हुई अर्थव्यवस्था- जैसे कि वेनेजुएला, जिसके पास तेल का विशाल भण्डार है, उसकी अर्थव्यवस्था में इस साल 10 प्रतिशत का संकुचन हुआ है। ऐसी ही स्थितियां तमाम तेल उत्पादक देशों की और उभरती हुई अर्थव्यवस्था की है।

कह सकते हैं, कि विश्व की वित्त व्यवस्था लड़खड़ा गयी है। संभलने के लिये वह जिसका भी सहारा लेती है, वही ढ़हने लगता है। माना यही जा रहा है, कि ‘‘2007-2008 के विश्वव्यापी मंदी से बड़ी मंदी की आशंका है।‘‘ वैश्विक वित्त व्यवस्था के संभलने की उम्मीदें नहीं हैं।

पिछले सात सालों से भी ज्यादा समय से दुनिया भर की सेंण्ट्रल बैंकों ने वित्त बाजार में अब तक कई ट्रिलियन डाॅलर डाल चुकी हैं, इसके बाद भी वित्त व्यवस्था घूम-फिर कर मंदी के कगार पर है। बाजार की नजर आने वाली थोड़ी सी स्थिरता और प्रवाह की मूल वजह सेंण्ट्रल बैंकों के द्वारा डाले गये ‘चीप मनी‘ है। ये ‘चीप मनी‘ जिस क्षेत्र में सबसे ज्यादा डाली गयी, उसमें एक ‘‘हाई एल्डिंग‘‘-‘जंक‘-बाॅण्ड्स है, जिसे ज्यादातर एनर्जी कम्पनियों ने जारी किये। वास्तव में यह लम्बी अवधि के लिये भरी मुनाफा कमाने के लिये ऐसे बाॅण्ड होते हैं, जो अपने साथ उस क्षेत्र में दीवालियापन की मुसीबतें लिये चलती हैं। ऊर्जा क्षेत्र में- विशेष कर खनिज तेल- में ऐसी स्थितियां बन गयी हैं।

साल 2014 के शुरूआती महीनों में कच्चे तेल का अंतर्राष्ट्रीय मूल्य 100 डाॅलर प्रति बैरल से भी ऊपर पहुंच गया था, मगर अभी वह 40 डाॅलर प्रति बैरल से काफी नीचे पहुंच गया है। जिसमें गिरावट जारी है, और अभी जारी रहना है। ऊर्जा के क्षेत्र में जैसी स्थितियां बन गयी हैं, वास्तव में वह पूंजीवादी बाजार व्यवस्था के आम संकट का हिस्सा है, जहां दीवालियापन तेजी से बढ़ रहा है।

4 दिसम्बर को ‘फाइनेन्सियल टाईम्स‘ ने रिपोर्ट दिया कि साल 2015 के अंत तक 1 ट्रिलियन डाॅलर से ज्यादा के अमेरिकी काॅरपोरेट कर्ज के दर्जे को घटाया गया है। 2008 के वित्तीय संकट के बाद गिरावट का यह संकट अपने सर्वोच्च बिंदू पर है। वित्तीय मामलों के विश्लेषकों सहित तीन प्रमुख्र क्रेडिट रेटिंग एजेन्सीज -स्टैण्डर्ड एण्ड पुअर्स, मूडीज और फिट्ज का अनुमान है, कि अगले 12 महीनों में दीवालिया होने के दरों में वृद्धि होगी। यह वृद्धिदर तब और बढ़ जायेगी, जब फेडरल रिजर्व, यदि अपने मूल ब्याजदरों में वृद्धि करने का निर्णय लेती है। (फेडरल रिजर्व ने ब्याज दरों में बढ़ोत्तरी की शुरूआत कर दी है।)

नवम्बर 2015 में अमेरिका के ‘इन्वेस्टमेंट बैंक‘ -गोल्ड मैन सेज- ने एक रिपोर्ट जारी किया, जिसमें उसने वैश्विक मंदी के, फिर से उभरते खतरे, को प्रमुखता से दिखाया है। रिपोर्ट में कहा गया है, कि ‘‘पिछले एक दशक में, अमेरिका में काॅरपोरेट का मुनाफा अपने उच्चतम दरों पर है। लेकिन अमेरिकी काॅरपोरेट का यह मुनाफा अपने आप में एक धोखा है। जिस तरह से पूंजी का संकुचन हो रहा है और कम्पनियों के विलय में बाॅण्डों के जरिये लेन-देन करने की वजह से शेयर मार्केट में वृद्धि दर तो नजर आ रही है मगर वास्तव में उसमें नगद मुद्रा का कोई प्रवाह नहीं है, परिणाम स्परूप बैलेंसशीट पर कुल कर्ज का स्तर मंदी पूर्व के स्तर से दो गुणा से भी ज्यादा हो गया है। इस प्रवृत्ति के मूल में कम या न्यूनतम ब्याज दर में प्राप्त बैंक पूंजी की भूमिका बड़ी है।

वैश्विक वित्तीय संकट के थमने और उसके संभलने की संभावनायें लगातार घट रही हैं। विश्व अर्थव्यवस्थ पर वित्तीय ताकतों ने ऐसी बढ़त हासिल कर ली है, कि अब वो न तो पूंजी के संकुचन और विस्तार को रोक पा रही है, ना ही राज्य की सरकारों की गिरती हुई साख को संभाल पा रही है। सच यह है, कि पूंजी के जिस दैत्य को राज्य एवं उनकी सरकारों के नियंत्रण से बाहर कर दिया गया है, वह दैत्य अपनी व्यवस्था को ही चबा रहा है। रोज नये खतरों को बढ़ा रहा है।

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