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बंदरों ने जनतंत्र में कोहराम मचा रखा है

6efc90b3385780eeec03709d4736be66‘गांधी जी और उनके तीन बंदरों के बारे में तो आप जानते ही होंगे?”

वैसे, आप यह मत पूछियेगा की ”गांधी जी कौन हैं? और वो बंदर काहे पाले थे?”

मुझे आप पर यकीन है, कि आप ऐसे सवाल नहीं पूछेंगे, क्योंकि जवाब का न जानना एक बात है, मगर सवाल को न समझना दूसरी बात है। लोग इसे हिमाकत कहते हैं। और आप ऐसी हिमाकत नहीं करेंगे, आप ऐसे मुस्कुरायेंगे जैसे बात बचकानी है, आप परमज्ञानी हैं।

आप तीर के साथ तुक्का भिड़ा लेंगे, कि अंग्रेज यदि इणिडया को मदारी और संपेरों का देश समझते थे, तो गांधी जी भी इन्हीं में से कोर्इ एक होंगे। आपका जनरलनालेज आपके काम आयेगा कि यदि वो बंदर पालते थे, तो मदारी ही होंगे।

आपके पास आला दिमाग है, आप सोच सकते हैं, कि आज कल राहुल गांधी जी की बड़ी धूम है, जो बड़े-बड़े मंच पर छोटी-छोटी बातें बताते फिर रहे हैं, कि उनकी मां को कब रोना आया? कब उन्हें आतंकवाद पर गुस्सा आया? जोश में वो होश खो बैठते हैं कि उनकी जान को भी खतरा है।

खतरे में जान है, खतरे में कांग्रेस है, खतरे में हिंदुस्तान है। गांधी जी राहुल गांधी के लगा-सगा हैं, या शार्टनेम हैं। जो भी है, आप कह सकते हैं कि मिस्टर गांधी कमाल के चीज हैं।

वैसे कमाल के चीज हम और आप भी हैं, जो बात दिमाग में आ गयी, उसे बताये बिना दम नहीं लेते और जो नहीं आयी, उसे कहीं न कहीं से खींच-तान कर ले आते हैं।

”तब तो आप लाजवाब हैं।” कह सकते हैं आप।

”नहीं! हम बाजवाब हैं। हर एक सवाल का रेडीमेड़ जवाब है।” सेखी बघारना हमें अच्छा लगता है।

तो आप मान लें, कि गांधी जी हमारे राष्ट्र के राष्ट्रपति हैं। जिस आजादी को आप झेल रहे हैं, वह आजादी भी उन्होंने ही दिलार्इ है। देश की तरह कांग्रेस भी उनके प्रति ऋणी है, क्योंकि आजादी को जिस मालगाड़ी पर लाद कर लाया गया, वह मालगाड़ी कांग्रेस की थी। यही कारण है कि 2 अक्टूबर को जब राष्ट्र राष्ट्रपिता का ‘बर्थ डे’ मना रहा था, कांग्रेस के वेबसार्इट के अधिकृत पृष्ट पर, उनको शत-शत नमन कर, पूण्य तिथि मनार्इ गयी। उनके पगचिन्हों पर चलने की कसमें खार्इ गयीं।

”यह तो हद हो गयी।”

इस हद को छोड़ दीजिये, भूल-चूक, लेनी-देनी मान लीजिये। होने को वह भी हो जाता है, जो नहीं होना चाहिये।

जैसे…?

जैसे आदमी के साथ बंदरों का प्रसिद्ध हो जाना।

मतलब?

मतलब, गांधी जी के तीन बंदर, गांधी जी की तरह ही प्रसिद्ध हैं।

एक, बुरा बोलना चाहता है, मगर बुरा न बोलने के लिये, मुंह बंद किये रहता है।

दूसरा, बुरा सुनना चाहता है, मगर बुरा न सुनने के लिये, कान बंदर किया रहता है।

तीसरा, बुरा बोलता है, बुरा सुनता है, मगर बुरा न देखने के लिये आंखें बंद किये रहता हैं

आप चाहें तो कह सकते हैं, कि गूंगा, बहरा और अंधा गांधी जी के प्रसिद्ध बंदर हैं।

बंदर आदमी की सोहबत से वैसे भी बिगड़ गये हैं, जैसे गांधी जी नोटों की सोहबत से बिगाड़ा गया है।

नोट असली भी है, और नकली भी और दोनों पर गांधी जी छपे हैं, उसके असली या नकली की पहचान छपी हुर्इ तस्वीर से नहीं, किसी और चीज से होती है, जिसे मैं नहीं जानता। क्योंकि नोट चाहे असली हो, या नकली, बाजार में चल ही जाता है।

”जैसे…?”

”जैसे क्या? बाजार में जितने भी गांधी हैं, सब चल रहे हैं, और जिसके पास गांधी है, वो भी चल रहे हैं।”

”जिनके पास गांधी नहीं हैं?”

”वो बंदरों से काम चला रहे हैं।” कहना तो मैं यही चाहता था मगर कह नहीं सका, क्योंकि बंदरों ने चुनावी कोहराम मचा रखा है।

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