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साहित्य में सब कुछ वैधानिक नहीं

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साहित्य को हम समाज और उसके मानवीय होने से बाहर निकाल दें। उसे जनशून्य बना दें और उसकी प्रकृति का नाश कर दें। उसकी सोच एवं संवेदनाओं को एक खास किस्म का कपड़ा पहना दें। उसके चेहरे पर अपनी पसंद का रंग पोत दें, और राजदण्ड पकड़ कर कहें-

‘‘साहित्य यही है।

उसका स्वरूप और मानक यही है।

लिखने वालों, शुरू हो जाओ।‘‘

जो शुरू हो गये, उनके पास एक धंधा है। और जो शुरू नहीं हुए, उन्हें धंधे की तलाश करनी होगी। और जो अपनी गंगा उल्टी ही बहाने पर आमादा रहे, अपनी बात अपने तरीके से कहने की आजादी के लिये डंट गये, उनका क्या होगा? यह बताने की जरूरत है।

उनके साथ ‘आज‘ क्या करेगा?

और आने वाला कल कैसा सुलूक करेगा?

यह हम जानते हैं। हमने दमन भी देखा है, और ऐसे लोगों को दशकों और सदियों जीते भी देखा है।

कह सकते हैं, कि ‘लेखन में सबकुछ वैधानिक नहीं होता।‘ वह वैध है या अवैध? लेखक की वर्गगत एवं मानवीय सम्बद्धता पर निर्भर करता है, और इस बात पर निर्भर करता है, कि राजसत्ता पर किस वर्ग का कब्जा है।

साहित्य सरकार और राजसत्ता के पक्ष में नहीं होता। पूरी तरह तो कभी भी नहीं। जनसमर्थक सरकारों के पक्ष में खड़ी रचनायें भी ‘जो नहीं है‘ या ‘समाज की विसंगतियां जो हैं‘, उस पर भी उसकी नजरें होती हैं। जनविरोधी सरकारों के खिलाफ खड़ा होना, उसकी सामाजिक एवं नैतिक जिम्मेदारियां होती हैं। यही कारण है, कि साहित्य को तमगा लगे वर्दी में देखने की आदत आज तक नहीं पड़ी। यह अलग बात है, कि सरकारें यही चाहती हैं, और कुछ लोग सरकारों की ऐसी चाहत को पूरा करते हुए इतराते फिरते हैं। यह देखने की उन्हें फुर्सत ही नहीं मिलती कि वो अपने ही लिखे कागज के बोझ से दब गये। मर गये। अपने लगातार मरने का जश्न लोग ठाठ से मनाते हैं।

राजसत्ता के द्वारा जब भी साहित्य पर अपना आधिपत्य कायम करने की कोशिश होती है, ऐसी विसंगतियां तेजी से उभरती हैं। ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता‘ का सवाल खड़ा हो जाता है। मुद्दे अलग-अलग तरीके से अलग-अलग रूप में उभरते हैं, मगर जिनका अर्थ एक ही होता है, कि आप ‘डिवाइडर‘ के इधर हैं या उस पार हैं? प्रचारतंत्र ने इस विभाजन को तीखा कर दिया है, जिस पर कभी राजसत्ता का कब्जा था, मगर अब छः दैत्याकार कम्पनियों और काॅरपोरेशनों ने उसे अपने कब्जे में ले लिया है।

अपनी बात कहने की सुविधा हमें भले ही हासिल है, मगर संसाधनों के रूप में उस पर अधिकार राजसत्ता और इन्हीं दैत्याकार कम्पनियों और काॅरपोरेशनों का है। जिसके खिलाफ उत्पादन के साधन पर मजदूरों के हक की लडाई की तरह ही, संचार माध्यमों पर आम लोगों (समाज) के हक की लड़ाई लड़नी होगी। निजीकरण के खिलाफ जनसंघर्ष की अनिवार्यता रोज बढ़ती जा रही है। जिसका सच यह है, कि यह लड़ाई समाज व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन की लड़ाई का हिस्सा है।

यह साहित्य में समाज के पुर्नस्थापना और उसे सही दर्जा दिलाने की लड़ाई है।

यह प्रकृति के नाश और उसे जनशून्य बनाने वालों के खिलाफ लड़ाई है।

खुले तौर पर कहें तो यह साहित्य को वर्दी पहनाने वालें के खिलाफ होने की लड़ाई है।

आलोकवर्द्धन

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