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मतलबी देशभक्त

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राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ अपने राजनीतिक संगठन -भारतीय जनता पार्टी और मोदी सरकार को और देश को, क्या बनाना चाहती है?

संघ प्रमुख मोहन भागवत किसी सनकी राजा की तरह व्यवहार कर रहे हैं।

कभी भारत माता की जय! भारत बोेले

कभी भारत माता की जय! दुनिया बोले

कभी भारत माता की जय! कोई बोले, न बोले, उसकी मर्जी। मगर नहीं बोले तो देशद्रोही।

इस सनक का मतलब क्या है?

ऐसी सनक मोदी और शाह में कम नहीं है। मगर, यह सनक पूरी तरह से सुनियोजित है। पर सनक दशकों से इनके सिर पर सवार रही है, लेकिन पहली बार देश के सरकार की जुबान बनाई जा रही है।

यह भी एक सनक ही है, कि ‘‘लोकसभा चुनाव में हमने जीत दर्ज की है।‘‘ जबकि देश के राजनीतिक मिजाज में तब्दीलियां आ गयी हैं, समाजार्थिक परिदृश्य बदल रहा है। बढ़ती हुई सामाजिक असमानता, और जटिल होते राजनीतिक सम्बंधों के बीच कोई सनकी ही सोच सकता है, कि उतार और चढ़ाव के बीच पानी स्थिर है।

संघ विस्तार देख रहा है।

भाजपा यह मान कर चल रही है, कि मोह भंग नहीं।

सरकार को अब भी यह यकीन है, कि मोदी करिश्माई हैं। देश के लिये ईश्वर का वरदान हैं।

राष्ट्रवाद के लिये ‘भारत माता की जय‘, कारगर हथियार है।

क्या वास्तव में ऐसा है?

ऐसी देशभक्ति आज से पहले देश में कभी नहीं देखी गयी जिसे प्रमाणित करने के लिये ‘देशद्रोहियों‘ की जरूरत पड़े।

यह सच, अपने आप में एक सवाल है।

एक ऐसा सवाल जिसके सही जवाब तक पहुंचने से पहले ही खबर फैला दी जायेगी, कि ‘‘बंदा देशद्रोही बनने की तैयारी कर रहा है।‘‘ खबरिया चैनल आज कल खबरें बनाने लगी है।

‘‘भारत माता‘‘ को जितना आक्रामक और जितना विवादास्पद संघ, भाजपा और मौजूदा सरकार ने बनाया, उतनी आक्रामक और उतनी विवादास्पद वो हैं ही नहीं। ‘अमूल दूध पीता है इण्डिया‘ और ‘टाटा नकम देश का नमक‘ जैसा विज्ञापन का बाजारवादी झूठ भी है। जिसमें बाबा से उद्योगपति बने रामदेव भी सिर से धड़ को अलग करने के इरादे से कूद पड़े हैं। देश को बाजार बनाने की बेचैनी को देशभक्ति में शामिल कर लिया गया है।

सरकार इस बात को छुपाने में पूरी तरह नाकाम रही है, कि राष्ट्रवाद और देशभक्ति उसका राजनीतिक हंथियार है। जिससे वह अपने को बनाये रखने की चाल चल रही है। राष्ट्रवाद और देशभक्ति की वह चाहे जितनी भी उदार परिभाषायें रचे, किंतु हिंदू राष्ट्रवाद और हिन्दूत्व के प्रति आक्रामक देशभक्ति उसकी पहचान है। जिसे वो छुपाना नहीं चाहती। ‘गर्व से कहो हम हिंदू हैं‘ की तर्ज पर ही हिंदू राष्ट्रवाद और देशभक्ति को वह आगे बढ़ा रही है।

सवाल यह है, कि इस नकारात्मक राष्ट्रवाद और विशेष किस्म की देशभक्ति का हासिल क्या है?

आम जनता के लिये, तो सकारात्मक अर्थ में कुछ भी नहीं, और जिन्हें इसे लूटने का शबाब मिल रहा है, वो पक्के कारोबारी हैं। उन्होंने ही सरकार को बाजार का साझेदार बनाया है, वे ही चाहते हैं, कि आम जनता उग्र राष्ट्रवाद के नशे में चूर रहे। उनके लिये देशभक्ति मतलब का सौदा है।

आज इन्हीं मतलबी देशभक्तों के सामने हमें यह प्रमाणित करना है, कि हम देशद्रोही नहीं हैं।

जेएनयू को प्रमाणित करना है, कि वह देशद्रोहियों का गढ़ नहीं। कन्हैया कुमार, उमर खालिद और अनिर्बान भट्टाचार्य को यह प्रमाणित करना है, कि हम देशद्रोही नहीं।

हैदराबाद सेण्ट्रल यूनिव्हरसिटी के छात्रों को यह प्रमाणित करना है, कि हम देशद्रोही नहीं।

छात्र, युवा, दलित, आदिवासी, मजदूरों और किसानों और आम लोगों के पक्ष में खड़े लोगों को यह प्रमाणित करना है, कि हम देशद्रोही नहीं।

क्या देशद्रोह का मामला इतना सस्ता हो गया है, कि आप जिसे चाहें देशद्रोही बना दें? संविधान और न्यायालयों का कोई मतलब नहीं है?

जिनके पास अपनी देशभक्ति का कोई प्रमाण नहीं, वो हमसे देशभक्त होने का प्रमाण मांग रहे हैं।

हमें मतलबी देशभक्तों से पूछ लेना चाहिये कि आप कैसे देशभक्त हैं?

एक राष्ट्र, एक दल और एक नेता की देशभक्ति हमें, मंजूर नहीं क्योंकि हमें मालूम है, कि ऐसी देशभक्ति लोकतंत्र की हत्या और हमारे संवैधानिक अधिकारों को छीनने, हमारे मानवीय दर्जे को खत्म करती है। देश को बाजार और बाजार के लिये युद्ध की अनिवार्यता बढ़ाती है। ऐसी देशभक्ति अपने गले में फांसी का फंदा डाल कर, एक दशक तक उसमें झूलने के अलावा और कुछ नहीं। यह देश-दुनिया और समाज के बहुसंख्यक वर्ग के लिये सबसे बड़ा खतरा है। देश के मौजूदा सरकार के विकास की दिशा यही है।

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