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अपना हौसला बढ़ाने में जुटी सरकार

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8 अप्रैल को

‘भारत का सर्वाधिक पढ़ा जाने वाला अखबार‘ के भीतरी पन्ने में पढ़ने को मिला -एक मीडिया के सर्वे में लोगों ने मोदी सरकार पर अपना विश्वास व्यक्त किया है। नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता बरकरार है।

मोदी सरकार के आर्थिक प्रदर्शन को 86 प्रतिशत,

रोजगार सृजन के मामले में 62 प्रतिशत,

‘अच्छे दिन आयेंगे‘ के चुनावी नारे पर 58 प्रतिशत लोगों ने अपना विश्वास व्यक्त किया है।

‘राष्ट्रवाद‘ के मुद्दे पर भी लोगों ने भाजपा का साथ दिया। मानी हुई बात है, कि यदि ऐसा है, तो विपक्ष के पास 22 महीने की सरकार के विरूद्ध कोई मुद्दा नहीं है।

यह अपना पीठ थपथपाने

और अपना हौसला आप बढ़ाने की

अच्छी मिसाल है।

ऐसा हो सकता है। और ऐसा ही होने की संभावनायें ज्यादा हैं। यह अपने को सही दिखाने की नीति का हिस्सा है। अपने स्थापना दिवस में जो बातें भाजपा ने की, यह उन्हीं की पुष्टि है। मीडिया का बहुत बढ़ा हिस्सा मोदी की छवि को बनाये रखने के लिये सक्रिय है। सोशल मीडिया पर भी सरकार और मोदी के विवादास्पद स्थिति को निरापद दिखाने का अभियान चल रहा है। ‘राष्ट्रवाद‘ के जिस मुद्दे को उछाला गया है, वह अपने आप में इस बात का प्रमाण है, कि सरकार इस बात को अच्छी तरह समझ रही है, कि उसके पांव के नीचे की जमीन निकलती जा रही है, उसके जनाधार में गिरावट आ गयी है। टाईम्स आॅफ इण्डिया ग्रूप के सर्वे से ही यह बात सामने आयी थी, कि भाजपा के जनाधार में 10 प्रतिशत की गिरावट आयी है।

सरकार की नीतियां सरकार के निर्णय और सरकार के प्रचारित उपलब्धियों के पक्ष में कोई ठोस प्रमाण नहीं है। वह अपनी असफलताओं को छुपाने के लिये अमूर्त और ऐसे भावनात्मक मुद्दों को बनाने में लगी है, जिसकी अपनी कोई परिभाषा ही नहीं है।

भाजपा का राष्ट्रवाद संघ के हिन्दू राष्ट्रवाद से अलग नहीं।

भाजपा की देशभक्ति ‘भारत माता की जय‘ के दायरे से बाहर नहीं।

सरकार की देशभक्ति और राष्ट्रवाद इन दोनों के अलावा, वित्तीय ताकतों के हितों को सुरक्षित करने की नीति है।

तमाम नीतियों और अभियानों का आधार चुनावी समर में जीत दर्ज कराना है। मोदी सरकार झूठ और फरेब की सरकार है। ऐसी सरकार है, जिसके बारे में यकीन के साथ आप नहीं कह सकते कि वह जो दिखा और बता रही है, वह सही है। उसने गलतबयानी का ठेका ले लिया है।

यदि 86 प्रतिशत लोग मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों के पक्ष में हैं, तो मानी हुई बात है, कि वो नवउदारवादी बाजारीकरण के बारे में कुछ नहीं जानते। वो नहीं जानते कि अर्थव्यवस्था के निजीकरण का मतलब क्या है?

यदि 62 प्रतिशत लोग ‘रोजगार सृजन‘ के मामले में मोदी सरकार के पक्ष में है, तो उन्हें पता नहीं है, कि लाखों-लाख रिक्त पदों को सरकर भरना नहीं चाहती और सरकार देश की शिक्षा से लेकर रोजगार के अवसर तक को निजी क्षेत्रों के हवाले करने में लगी है। जिसके खिलाफ छात्रों का आंदोलन चल रहा है। जेएनयू ने यह प्रमाणित कर दिया है, कि उनकी लड़ाई सिर्फ जेएनयू और विश्वविद्यालयों की लड़ाई नहीं है, बल्कि, मौजूदा सरकार के जनविरेाधी नीतियों के खिलाफ है।

यदि 58 प्रतिशत लोगों को यकीन है, कि ‘अच्छे दिन आने वाले हैं‘ तो यही कहा जा सकता है, कि अक्ल के अंधों की तादाद आंख के अंधों से इस देश में अधिक है। या आप हमें जरूरत से ज्यादा बेवकूफ समझते हैं। देश की आम जनता अपने रोज की जरूरतों और मुसीबतों से देश और सरकार को समझती है।

सरकार जिस सच को छुपाने के लिये राष्ट्रवाद के चेहरे चमका रही है, भले ही आम जनता नवउदारवादी बाजारपरक अर्थव्यवस्था, अर्थव्यवस्था का निजीकरण और सरकारी सम्पत्ति एवं संपदा के अपहरण सहित विजय माल्या के फरारी को न समझे, मगर वह 9 राज्यों में पड़े सूखे को समझती है। बुंदेलखण्ड और विदर्भ में पानी के एक-एक बूंद और एक-एक दाने की मुंहताजी को समझती है। वह सुप्रिम कोर्ट की फटकार को शब्दसः भले न समझे, मगर इतना जरूर समझती है, कि जिंदगी और मौत के बीच की लड़ाई में सरकार उनके साथ नहीं है।

अच्छे दिनों की सूरत यदि मोदी की सूरत है, तो इस यकीन के साथ कह सकते हैं, कि वहां चमक और चिकनाई आ गयी है। चड्डी पैंट बन गया है। भाजपा छोटे से छोटे मुद्दों का सहारा ले कर राष्ट्रवाद के घातक मुद्दे रच रही है। उसे शायद इस बात का एहसास नहीं है, कि चुनावी नारे और वायदों से बना यकीन स्थायी नहीं होता, उसमें अपेक्षायें होती हैं। नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार यह कहने की स्थिति में नहीं है, कि वह जन अपेक्षाओं को नहीं समझती। सच यह है, कि वह जिन ताकतों का प्रतिनिधित्व कर रही है, वह हमेशा से जनविरोधी रही है, चाहे वह बाजारवादी वैश्विक वित्तीय ताकतें हों, या राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ हो। जिसकी सबसे बड़ी विसंगति यह है, कि एक बाजारवादी वैश्वीकरण के पक्षधर हैं, जबकि दूसरी ओर राष्ट्रवादी हैं। जनविरोध ही वह एकमात्र जगह है, जहां वो आपस में जुड़ कर खड़ी हो सकती है। भारत में यह हो रहा है।

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