Home / साहित्य / कहानी / शिनाख्त

शिनाख्त

shadow-people-pic1

हम कहां हैं?

हमारी समझ में नहीं आ रहा है, जैसे कोई भूलभुलइया, कोई तिलस्म हो, जहां आग, आग नहीं। पानी, पानी नहीं। जमीन, जमीन नहीं। यहां तक कि आदमी, आदमी और जानवर, जानवर तक नहीं लग रहा है। चारो ओर फैलती-सिकुड़ती दीवारें हैं। ऐसी दीवारें कि छूते ही हाथ पकड़ लेती हैं।

हाथ छुड़ाने की कोशिश कीजिये तो चिल्लाने लगती हैं- ‘‘देखो-देखो हमें गिराने की कोशिश कर रहा है।‘‘

हाथ सटाये रहिये तो चिल्लाती हैं- ‘‘पकड़ो-पकड़ो सेंधमारी कर रहा है।‘‘

बड़ी मुश्किल है। एक तरफ कुआं, दूसरी तरफ खाई है। चारो ओर झूठ और फरेब का एकरंगा परदा है।

एक घुटी हुई आवाज हम तक पहुंचती है- ‘‘यह एक देश है। देश में चुनी हुई सरकार है।‘‘

परदे के पीछे से घुटी हुई आवाज की चीख उभरती है। लात-घूसों की आवाज आती है। कुछ लोग देशभक्ति के नारे लगाते हैं। नारे के शोर में सबकुछ दब जाता है।

घुटी हुई आवाज, चीख, लात-घूसों और नारों को हमने पहचान लिया।

हमने, जगह और देश की शिनाख्त भी कर ली है।

हमने जान लिया कि जिस भूलभुलइया, जिस तिलस्म में हम फंस गये हैं, वहां से निकलना आसान नहीं।

हमारे जेहन में आपनों की सुरक्षा है।

हम बता नहीं सकते कि ‘‘यह अपने कपड़े बदलता हुआ हिन्दुस्तान है।‘‘

– आलोकवर्द्धन

Print Friendly

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

Select language:
Hindi
English
Scroll To Top