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वित्तीय हमले के साथ सामरिक घेराबंदी

shutterstock_114785761एशिया में चीन के लिये अमेरिकी नीति सामरिक घेराबंदी के साथ, वित्तीय हमले की है। वह एशिया और दुनिया में बढ़ते चीन के प्रभाव को रोकना चाहता है, जो कि वास्तव में उसके लिये न सिर्फ गंभीर चुनौती बन चुका है, बलिक मुक्त बाजार के नये क्षेत्र की रचना भी कर रहा है, जिसका लक्ष्य अमेरिकी वर्चस्व और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा के रूप में डालर के एकाधिकार को तोड़ना है। वैसे भी उसका वास्ता डालर से सबसे ज्यादा पड़ता है, क्योंकि वह दुनिया का सबसे बड़ा निर्यातक देश है। और दुनिया का ज्यादातर व्यापार अमेरिकी डालर में होता है। 60 प्रतिशत से भी ज्यादा वैशिवक विदेशी मुद्रा विनिमय परसिम्पतित -ग्लोबल फारेन एक्सचेंज रिजर्व- अमेरिकी डालर के रूप में है, जिस पर अमेरिकी सरकार -फेडरल रिजर्व का अधिकार है। जो अब पूरी तरह सुरक्षित नहीं है।

अमेरिका, डालर का एकमात्र निर्यातक देश है। माना यही जाता है, कि जब तक डालर है, अमेरिकी साम्राज्य है। यदि आज अमेरिका के पास डालर न हो, तो वह दूसरे दिन ही दिवालिया हो जायेगा। खुद को 24 घण्टे खड़ा रख पाना भी उसके लिये संभव नही है। अमेरिकी अर्थव्यवस्था अंदर से इस तरह खोखली हो गयी है, कि अब वह अपना बोझ उठाने की सिथति में नहीं है। उसकी वित्तीय एवं राजनीतिक संरचना में निजी कम्पनियों, विशालतम कारपोरेशनों और अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय इकार्इयों ने इतनी बड़ी जगह बना ली है, कि व्हार्इट हाउस और कांग्रेस पर उनका अधिकार हो गया है। आज अमेरिकी साम्राज्य इन्हीं वित्तीय इकार्इयों और संस्थानों पर टिकी हैं, जो उसकी पहचान और उसकी पूंजीवादी व्यवस्था के लिये सबसे बड़ा संकट है। यह संकट ऐसा है, जिससे निजात पाया नहीं जा सकता। यदि अमेरिकी सरकार ऐसी कोशिश भी करती है, तो व्हार्इट हाउस और कांग्रेस की बुनियादें हिल जायेंगी।

अमेरिकी शटडाउन और अमेरिका के कर्ज की सीमाओं को बढ़ाने के विवादों ने यह खुलेआम कर दिया है, कि इजारेदार शकितयां अब अमेरिकी सरकार का कारोबार अपने मुनाफे को बढ़ाने और दुनिया की प्राकृतिक संपदा को हड़पने और बाजार पर दबाव को बढ़ाने के लिये कर रही हैं। अमेरिकी सरकार विश्व समुदाय को यह समझाने का खेल खेल रही है कि ”उसकी अर्थव्यवस्था के ढ़हते ही दुनिया की अर्थव्यवस्था भी ढ़ह जायेगी।” पशिचमी मीडिया यह प्रचार कर रही है, कि ‘संकट टल गया है’, मगर खतरा पहले से ज्यादा बढ़ गया है। वैकलिपक व्यवस्था जरूरी है। एक नया युद्ध अब वित्तीय घमासान बन गया है। अमेरिका को अपने विस्तार के लिये अब एकाधिकार चाहिये, उसके पीछे खड़ी शकितयां यही चाहती हैं। मुक्त बाजारवादी वैश्वीकरण उनका हंथियार है। संधि, साझेदारी और सहयोग संगठनों के जरिये वो ऐसे वित्तीय साम्राज्य की बुनावट कर रहे हैं, जहां राज्यों की सरकारें उनके हितों के लिये बिचौलिया हों। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा का ‘ट्रांस पैसेफिक पार्टनरशिप’ ऐसा ही कारनामा है, जिसे वो अमेरिकी कांग्रेस को अंधेरे में रख कर, अंजाम तक पहुंचाने में लगे हैं। जिसका अघोषित मकसद एशिया में चीन के विस्तार को रोक कर, अमेरिकी वर्चस्व कायम करना है। जिसका उल्लेख नवम्बर 2013 के अंक में ‘व्यापार और हथियारों से घिरी दुनिया’ और ‘एशिया में साझेदारी और समझौतों से बढ़ता खतरा’ के अंतर्गत हमने किया है।

चीन की योजना अमेरिकी वित्त व्यवस्था को ‘अकेले’ दुनिया पर एकाधिकार जमाने से रोकना है। वह एक ओर अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत करते हुए उसकी विश्वसनियता बढ़ा रहा है, वहीं दूसरी ओर अमेरिका के कर्ज के संकट का मजाक उड़ा रहा हैं। चीन के वित्तीय अधिकारियों ने सार्वजनिक रूप से कहा कि ”अमेरिकी कर्ज की खरीदी बंद की जाये।” वह बड़ी तेजी से अपनी मुद्रा में व्यापार समझौता -‘करेंसी स्वैप एग्रीमेण्ट’ कर रहा है। उसने गये साल ही, अमेरिकी डालर के विकल्प के रूप में अपनी मुद्रा को अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के लिये पूरी व्यवस्था के साथ विश्व बाजार में उतार दिया है। वह दुनिया के महत्वपूर्ण देशों एवं अपने मित्र देशों के साथ द्विपक्षीय एवं बहुपक्षीय समझौते कर रहा है। दुनिया में हुए ऐसे महत्वपूर्ण 11 समझौतों में चीन 9 समझौतों का सदस्य देश है। पांच महाद्वीपों में उसके सम्बंध न सिर्फ बन गये हैं, बलिक उसकी पकड़ भी मजबूत होती जा रहा है। हम कह सकते हैं कि चीन अमेरिका की जगह लेने की तैयारी कर चुका है, और वह बड़ी जगह बना भी चुका है। यह जगह अमेरिकी अर्थव्यवस्था में भी इतनी बड़ी है, कि उसके हटते ही अमेरिकी वित्त व्यवस्था की आंतें बाहर निकल आयेंगी।

आज की तारीख में अमेरिकी अर्थव्यवस्था दुनिया की अर्थव्यवस्था का संचालन केंद्र है, क्योंकि दुनिया का तेल व्यापार डालर से होता है। यही कारण है, कि वैशिवक मुद्रा बाजार में अमेरिकी डालर की मांग हमेशा बनी रहती है। ज्यादातर तेल उत्पादक देश अपने तेल उत्पादन का निर्यात पेट्रो-डालर से करते हैं, जिसका सीधा लाभ अमेरिकी अर्थव्यवस्था को मिलता है। 1970 में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति निक्सन के कार्यकाल में, जब विदेशमंत्री हेनरी किसिंगर ने सउदी अरब पर दबाव बना कर यह समझौता किया था कि ”सउदी अरब अपना तेल व्यापार अमेरिकी डालर में करेगा।” तब से आज तक तेल व्यापार के साथ अन्य अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में डालर की उपयोगिता लगातार बढ़ती चली गयी। अमेरिकी अर्थव्यवस्था में निर्णायक विकास हुआ, तेल व्यापार में पेट्रो-डालर अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा में बदल गया। जिसका व्यापक प्रभाव विश्व व्यापार पर पड़ा। जिसे दशकों चुनौती नहीं मिली।

मगर अब, अमेरिकी अर्थव्यवस्था ढ़लान पर है। विश्वव्यापी मंदी ने उसे गहरी खायी दी है। वह गोते लगा चुका है। नवउदारवादी वैश्वीकरण के खिलाफ एक नया समिकरण बन चुका है। सीरिया में उसे रूस के हस्तक्षेप की वजह से कूटनीतिक पराजय का सामना करना पड़ा। चीन उसके सामने जर्बदस्त वित्तीय चुनौती है। रूस और चीन एक दूसरे के सामरिक एवं आर्थिक सहयोगी हैं। रूस पूर्व सोवियत संघ की विदेश नीतियों की ओर लौट चुका है, और चीन समानांतर वैशिवक वित्तव्यवस्था एवं वैकलिप अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा व्यवस्था का निर्माण कर चुका है।

6 सितम्बर 2012 को चीन ने अधिकृत रूप से घोषणां की कि ”उसकी बैंकिंग प्रणाली, संचार व्यवस्था और मुद्रा के स्थानांतरण की व्यवस्था पूरी तरह तैयार है। यदि कोर्इ देश चाहे तो, कच्चे तेल की खरीदी-बिक्री का व्यापार चीनी मुद्रा में कर सकता है।” यही नहीं रूस और चीन के लिये इस बाबत समझौता है कि रूस चीन को पर्याप्त तेल की आपूर्ति करता रहेगा।

अमेरिका एवं पशिचमी देशों के वित्त विशेषज्ञों ने माना है, कि ”चीन एक तेल उत्पादक देश नहीं है, उसके पास तेल का भण्डार नहीं है, इसलिये ‘डालर’ को प्रभावित करने की क्षमता ‘युआन’ में नहीं है।” मगर 7 सितम्बर 2012 को चीन और रूस के बीच एक व्यापार समझौता हुआ। समझौते के तहत रूस ने इस बात की सहमति जतार्इ कि ”चीन को जितने भी तेल की आवश्यकता होगी, उसकी आपूर्ति वह करेगा।” और यह व्यापार अमेरिकी डालर में नहीं होगा। रूस दुनिया के सबसे बड़े तेल उत्पादक देशों में एक है। र्इरान और रूस के नजदीकी सम्बंध हैंं। चीन र्इरान के कच्चे तेल का सबसे बड़ा खरीददार है। अमेरिकी प्रतिबंधों ने दोनों देशों को और भी करीब ला दिया है। अमेरिकी समर्थक देश मैकिसको से भी कच्चे तेल की खरीदी का गुप्त समझौता चीन कर चुका है। यही नहीं 2009 में वैशिवक मंद की बाद अपनी वित्त व्यवस्था को डालर से मुक्त करने के लिये मैकिसकन सेण्ट्रल बैंक ने 100 टन सोने की खरीदी की और यह खरीदी चीन के जरिये भी की गयी। चीन स्वयं सोने का विशाल भण्डार जमा कर रहा है। अमेरिकी मुद्रा के अनुपात में चीनी मुद्रा की सिथति अंतर्राष्ट्रीय बाजार में ज्यादा मजबूत है। बरका ओबामा को संभालने वाले अमेरिकी फेडरल रिजर्व के प्रमुख बर्नानकी भी यह मानते हैं, कि यह झटका बड़ा है। उन्होंने फेडरल रिजर्व के नीति निर्धारकों से कहा- ”मैं, नहीं समझता कि हमारे संसाधन इतने मजबूत हैं कि हम इन वित्तीय झटकों की क्षतिपूर्ति कर सकें। इसलिये हमें सोचना होगा कि हम क्या करें?”

और करने के नाम पर ओबामा सरकार जो कर रही है, उसकी वजह से न सिर्फ शीतयुद्ध की वापसी हो गयी है, बलिक एक नये वैशिवक वित्तीय युद्ध की शुरूआत भी हो गयी है। वित्तीय हमले के साथ सामरिक घेराबंदी हो रही है। जिसका विरोध विश्व जनमत, विश्व समुदाय, सम्बद्ध देशों की आम जनता और स्वयं आम अमेरिकी कर रहे हैं। ‘ट्रांस पैसेफिक पार्टनरशिप’ के साथ जैसी गोपनियता अमेरिकी सरकार बरत रही है, और जिस तरह से कारपोरेट जगत के इशारे पर काम कर रही है, वह अपने आप में इस बात का ठोस प्रमाण है कि ”सब कुछ सही नहीं है।” अमेरिका के अलावा आस्ट्रेलिया, बु्रनेर्इ, चिली, कनाडा, जापान, मलेशिया, मैकिसको, न्यूजीलैण्ड, पेरू, सिंगापुर और वियतनाम की सरकारें भी कुछ ऐसा कर रही हैं, जैसे वो अपने देश की जनता को धोखा दे रही हैं, क्षेत्रीय संतुलन और विकास के खिलाफ षडयंत्र कर रही हों।

वास्तव में, ‘ट्रांस पैसेफिक पार्टनरशिप’ राज्य की सरकारों के द्वारा किये गये समझौतों से कारपोरेट जगत को उस क्षेत्र की वित्तीय कमान सौंपना है। यह कारपोरेट जगत द्वारा राज्य की सरकारों का अधिग्रहण है। जिसके बाद वल्र्ड ट्रेड आर्गनार्इजेशन के मुददे को स्थगित करना आसान हो जायेगा। बराक ओबामा कारपोरेट जगत की दलाली कर रहे हैं। जिससे मुक्त बाजार के ऐसे क्षेत्र का निर्माण करना संभव होगा जहां सरकारें दुनिया के एक प्रतिशत से भी कम लोगों के लिये काम करती नजर आयेंगी।

पिछले महीने हुए ‘आशियान’ और ‘एपेक देशों’ की बैठक में यह मुददा छाया रहा है। एशिया में यह चीन और अमेरिका के बीच की प्रतिद्वनिदता में बदल गया है। अपने विरूद्ध की जा रही सामरिक घेराबंदी और पड़ोसी देशों से विवादों को बढ़ाने की अमेरिकी नीति के खिलाफ चीन काफी सक्रिय हो गया है। अमेरिका एशिया-प्रशांत क्षेत्र को अति संवेदनशील क्षेत्र बनाने की साजिशें रच रहा है, ताकि चीन के विरूद्ध वह अपने वर्चस्व को मजबूत कर सके।

चीन के राष्ट्रपति शि जिन पिंग ने अमेरिकी नेतृत्व में बन रहे ‘ट्रांस पैसेफिक पार्टनरशिप’ के विरूद्ध ‘ट्रांस पैसेफिक रिजनल फ्रेमवर्क’ की घोषणा की है। चीन अपनी विश्वसनियता तेजी से बढ़ा रहा है। चीन के राष्ट्रपति ‘एपेक देशों’ की बैठक में भाग लेने से पहले मलेशिया और इण्डोनेसिया की यात्रा करते हैं, तो चीन के प्रधानमंत्री ‘आशियान देशों’ की बैठक में भाग लेने से बाद थार्इलैण्ड और वियतनाम की यात्रा करते हैं। जिसका एक ही मकसद है अमेरिकी वर्चस्व के खिलाफ चीन की विश्वसनियता को बढ़ाना और अमेरिका के बिना मुक्त बाजार के नये क्षेत्र की रचना करना।

एशिया को दुनिया का केंद्र बनाने की अमेरिकी साजिशों की वजह से क्षेत्रीय तनाव काफी बढ़ गया है। चीन की क्रेडिट रेटिंग एजेन्सी डैगौंग ने अमेरिका ग्रेड को घटा दिया है, और उसके और घटने की संभावना व्यक्त की है। दुनिया में हुए ज्यादातर वित्तीय संधि और सहयोग समझौतों की सिरायें आपस में जुड़ती जा रही हैं। चीन ने कुछ महीने पहले ही ‘यूरो जोन’ के साथ एक बड़ा ‘करेंसी स्वैप एग्रीमेंट’ किया है। जिसे चीनी मुद्रा युआन के लिये उठाया गया बड़ा कदम माना जा रहा है। जून में बि्रटेन से भी चीन ने ऐसे ही समझौते किये हैं। ये सभी समझौते अमेरिकी डालर के अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा की मांग को घटाने के लिये हो या न हो, अमेरिकी सरकार इसे अपने लिये खतरा मानती है। चीन अपनी मुद्रा की मजबूती और विश्वसनियता को बढ़ाने के लिये भी लगातार सोने की खरीदी कर रहा है। स्टीफन लीब, मनी मैनेजर, ने कहा कि ”उनके स्त्रोतों के अनुसार चीन की योजना और 5000 टन सोने की खरीदी करना है।” उसने संभावना जतार्इ है कि ”हो सकता है कि चीन की योजना युआन को स्वर्ण मानक बनाने की हो ताकि युआन अमेरिकी डालर का विकल्प बन सके।”

यदि चीन अपनी मुद्रा युआन को सोने पर आधारित करने का निर्णय लता है, और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में अमेरिकी डालर के उपयोग को बंद कर देता है, तो चीन का यह कदम अमेरिकी अर्थव्यवस्था के लिये सबसे बड़ा सदमा होगा, जिससे उबर पाना उसके लिये आसान नहीं होगा, क्योंकि अमेरिकी डालर और अमेरिकी कर्ज की मांग बेमोल पत्थर की तरह गिर जायेगी और अमेरिका के रोजमर्रा की चीजों के दाम आसमान छूने लगेंगे। सस्ता गैसोलिन और चीन से सस्ता आयात अमेरिका के लिये असंभव हो जायेगा। सच तो यह है, कि अमेरिकी साम्राज्य के डूब मरने का जो खतरा है, वह तय हो जायेगा। और अमेरिका ऐसा कभी नहीं चाहेगा। लेकिन सिथतियां ऐसी ही बनती जा रही हैं। जिसे रोक पाना अमेरिका के लिये मुशिकल हो गया है।

अमेरिकी साम्राज्य का विकल्प अमेरिकी साम्राज्य और अमेरिकी डालर का विकल्प अमेरिकी डालर अंतर्राष्ट्रीय व्यापार और विश्व समुदाय में नहीं बन सकता, जिसके विरूद्ध वैकलिपक व्यवस्था की अनिवार्यता बन गयी है। मतलब साफ है, कि अमेरिकी साम्राज्य खतरे में है, और चीन की दावेदारी मजबूत है। ‘अमेरिकी अर्थव्यवस्था के ढ़हते ही वैशिवक वित्त व्यवस्था ढ़ह जायेगी’ का अमेरिक दबाव अब उसके खिलाफ है। वित्तीय हमले के साथ सामरिक घेराबंदी विस्फोटक होती जा रही है। यह खतरा अब भितरघात की सीमाओं को लांघ कर खुलेआम हो गया है।

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