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दमन के छोटे-बड़े हथियार उठाती सरकार-2 (किसके पास कितना राष्ट्रवाद है?)

rahulfull

राष्ट्रवाद पर जारी बहस में मोदी सरकार के द्वारा ‘राष्ट्रगान‘ और ‘राष्ट्रीय ध्वज‘ को भी शाामिल कर लिया गया। 10 अप्रैल को केंद्रिय गृह मंत्रालय के द्वारा राज्य सरकारों को एक फरमान जारी कर कहा गया है- ‘‘उसे राष्ट्र ध्वज और राष्ट्रगान का अपमान किये जाने की शिकायतें मिली हैं। राज्य सरकारें राष्ट्रगान और राष्ट्रध्वज का सम्मान सुनिश्चित करें।‘‘ गृह मंत्रालय ने ‘राष्ट्रीय सम्मान कानून‘ (1071) और ‘फ्लैग कोड‘ (2002) के प्रावधानों का पालन सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है।

इस निर्देश को भी जेएनयू के मामले से जोड़ दिया गया है।

इस देश में, क्या ‘राष्ट्रवाद‘ जैसा कोई मुद्दा है?

क्या जेएनयू में ‘देशद्रोह‘ (कानूनन जिसे ‘राजद्रोह‘ कहना चाहिये) जैसी कोई बात है?

क्या ‘राष्ट्रगान‘ और ‘राष्ट्रध्वज‘ के अपमान का कोई मामला है?

कम से कम वहां तो नहीं ही है, जहां उसे ढूंढ़ा और बनाया जा रहा है। ‘अफजल गुरू एक बहस है‘, और जिन्होंने अफजल गुरू के पक्ष में नारे लगाये वो लोग कहां हैं? उनकी खोज क्यों नहीं? जिसमें संघ की छात्र इकाई एबीवीपी का हाथ होने की आशंकायें हैं। जिन्होंने भाजपा एवं सरकार को यह मुद्दा दिया। जेएनयू के प्राध्यापक और छात्रसंघ दोषी क्यों? कन्हैया कुमार, उमर खालिद और अनिर्बान भट्टाचार्य की गिरफ्तारी और अदालत से जमानत क्यों? देशद्रोह का आरोप क्यों? जेएनयू को बंद करने, उसे ध्वस्त करने का इरादा क्यों? एक झूठ के बाद दूसरा झूठ और मीडिया वार क्यों?

यह सवाल भाजपा, संघ और एबीवीपी से है।

दमन के छोटे-बड़े हथियार उठाती सरकार से है,

लेकिन हर एक क्यों? का जवाब जेएनयू ने दिया है, उसकी सोच और समझ ने दिया, कन्हैया कुमार, उमर खालिद, अनिर्बान भट्टाचार्य और शेहला राशिद ने दिया है। उन तथ्यों को सामने रखा है, जिसका जवाब सरकार के पास नहीं है। सरकार की दिलचस्पी जवाब सुनने या जवाब देने में नहीं, दमन का हथियार उठाने में है। वह जेएनयू के मुद्दे को, उसकी एकजुटता को और उसके सामाजिक विस्तार को रोकने में लगी है। अपनी बात कहने के अधिकारों का हनन कर रही है। उसने राष्ट्रवाद, राष्ट्रगान और राष्ट्रध्वज को अपना हथियार बना लिया है। वह यह दिखाने में लगी है, कि देशभक्ति की गठरी उसके पास है। जबकि उस गठरी में कहीं गोडसे तो कहीं मुखबरी है। देश के संविधान की अधजली प्रतियां और उदार राष्ट्रवाद के विरूद्ध ऐसा हिंदू राष्ट्रवाद है, जो हिन्दुत्व का प्रतिनिधित्व नहीं करता। सामाजिक द्वेष और ऐसी हिंसा है, जो सोच को विकृत और समाज को विभाजित करती है।

इस पूरे प्रकरण में जेएनयू की गल्ती सिर्फ एक है, कि वह समझदार लोगों की जगह है। वहां सोच, समझ और विचार है। सवाल, जवाब और खुली बहंस है। वह उन वामपंथियों का गढ़ है जो नवउदारवादी वैश्वीकरण, मुक्त व्यापार और बाजारवाद के पक्ष में नहीं हैं। जो शिक्षा, स्वास्थ्य और आम जनता के प्रति देश की सरकार को गैर जिम्मेदार होने को स्वीकार नहीं करते। वो इस बात को स्वीकार नहीं करते कि केंद्रिय विश्वविद्यालयो को दिया जाने वाला आर्थिक सहयोग खैरात है, जिसे सरकार जब चाहे बंद कर सकती है। वो जनसमर्थक सरकार के पक्षधर हैं। उनके लिये देश और देशभक्ति करोड़ों-करोड़ लोगों की जिम्मेदारी है। यह देश सरकार और मुट्ठी भर लोगों का नहीं देश की आम जनता का है।

कोई ऐसा आदमी जो जर-जमीन बेच दे।

कोई ऐसा आदमी जो लूटेरों, सेंधमारों को लूट और सेंधमारी के लिये जमा करे।

कोई ऐसा आदमी, जो अपनो के दिल, दिमाग, उनके श्रम का सस्ते में सौदा करे।

कोई ऐसा आदमी, जो हथियारों को जमा करे और लड़ाई-झगड़ों को दावत दे, उसे आप क्या कहेंगे?

क्या देश की मौजूदा सरकार और उसके शीर्ष पर बैठे प्रधानमंत्री और उनका मंत्री मण्डल कुछ ऐसा ही नहीं कर रहे हैं?

हां, एक काम वो और कर रहे हैं, अपने देशभक्त होने का दावा भी कर रहे हैं। और जो भी उनसे असहमत है, उसे देशद्रोही करार दे रहे हैं। यह खयाल बांट रहे हैं, कि यही विकास है, यही राष्ट्रवाद है, यही देशभक्ति है। जिसे नापने का कोई पैमाना नहीं है, मगर वो नाप रहे हैं। ऐसा वो उन लोगों के साथ मिलकर कर रहे हैं, उन वैश्विक वित्तीय ताकतों के साथ मिलकर कर रहे हैं, जिन्होंने अपने देश और अपनी दुनिया को धोखा दिया, आम लोगों को धोखा दिया।

कांग्रेस ने जिस उदार राष्ट्रवाद को अपना जरिया बनाया और एक पतनशील पूंजीवादी लोकतंत्र की स्थापना की, भाजपा ने उग्रराष्ट्रवाद को अपना हथियार बनाया और नव उदारवादी बाजारवाद को स्थापित करने में लगी है, जिसकी दिशा आर्थिक एवं राजनीतिक एकाधिकार है। इसलिये जो भी वित्तीय तानाशाही और राजनीतिक एकाधिकार के खिलाफ है, देश की सरकार उसके खिलाफ है। वह उस पूरी संरचना और समाज व्यवस्था के खिलाफ है, जो देश की आम जनता को ऐसे अधिकार, ऐसी आजादी देती है।

अब आप ही तय करें, किसके पास कितना राष्ट्रवाद है और कैसा राष्ट्रवाद है? यह तो मानी हुई बात है, कि सरकार और आम जनता के राष्ट्रवाद में दोस्ती नहीं है।

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