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दमन के छोटे-बड़े हथियार उठाती सरकार-3 (राष्ट्रवाद में घुला वित्तीय पूंजी का रंग)

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किसके पास कितना राष्ट्रवाद है?

यदि हम यह सवाल करें और विज्ञापन दें, तो पता चलेगा कि राष्ट्रवाद की इतनी गठरियां जमा हो गयी हैं, कि उन्हें रखने के लिये हमारे पास जगह नहीं है।

भाजपा अपनी गठरी को सबसे बड़ा दिखाने का अभियान छेड़ देगी और संघ के सभी कार्यकर्ता भिड़ जायेंगे उस गठरी को बढ़ाने के लिये। दूसरों की गठरी को छोटा दिखाने के लिये मीडिया का एक दस्ता भी वजूद में आ जायेगा। राष्ट्रवाद के गठरी की लूट और छिनतई भी होने लगे, तो कोई बड़ी बात नहीं।

वैसे, बिना किसी सवाल या विज्ञापन के भाजपा लूट और छिनतई शुरू कर चुकी है। वह गांधी से लेकर सरदार पटेल तक और सुभाषचंद्र बोस से लेकर डाॅ0 भीमराव अम्बेड़कर तक को, अपने गठरी में बांधे-बांधे कर रही है, बिना यह सोचे और समझे-जाने बिना कि वह कर क्या रही है?

वह अपने बुनियाद पर हमला कर रही है।

वह अपने को वैचारिक रूप से दिवालिया घोषित कर रही है।

वह यह प्रमाणित कर रही है, कि उसका होना देश और समाज के लिये सबसे बड़ा खतरा है।

भाजपा यह सोच नहीं पा रही है, कि यदि वह महात्मा गांधी को स्वीकार करती है, तो गोडसे को देशभक्त कैसे कहेगी?

यदि सरदार पटेल को लोहे में ढ़ाल कर उन्हें अपना बना रही है तो, ‘कांग्रेस मुक्त भारत‘ का सपना किसे दिखा रही है?

यदि सुभाषचंद्र बोस को अपनी गठरी में भाजपा बांध लेती है, तो मुसोलिनी के फासीवाद का क्या होगा? जो संघ के रगों में है।

डाॅ0 भीमराव अम्बेडकर के लिये मोदी सरकार और भाजपा का प्रेम तो अथाह हो गया है। लोटे में बाल्टी भर प्यार उड़ेल रही भाजपा, क्या यह समझ पायेगी कि अम्बेडकर हिंदू राष्ट्रवाद और मनुस्मृति के कितने बड़े विरोधी थे? उन्होंने भारतीय संविधान के लिये इसे ही सबसे बड़ा खतरा माना था। लेकिन इन बातों में मोदी की कोई दिलचस्पी नहीं है, उनके लिये अम्बेडकर इसलिये खास हैं, कि उन्होंने ऐसा संविधान बनाया कि ‘‘एक बर्तन मांजने वाली का बेटा प्रधानमंत्री बन गया।‘‘ पहले उन्होंने ‘चायवाले‘ को कैश कराया अब बर्तन मांजने वाली को कैश करा रहे हैं। यदि वो प्रधानमंत्री नहीं बनते तो अम्बेड़कर भी खास नहीं होते। अम्बेडकर के खास होने की यह सबसे गंदी सोच है। उन्होंने भगत सिंह पर भी हाथ डाल दिया है। शायद वह सोच रही है, कि कम्युनिस्टों की पाली से खींच कर भगत सिंह को अपने मतलब का देशभक्त बन लेगी। उन्होंने सोचा ही नहीं कि उनकी यह हरकत ‘गद्दार कम्युनिस्टों‘ को ‘देशभक्त‘ करार दे रही है।

जिस भगत सिंह को संघी-भाजपाई ठीक से पहचानते नहीं उनके साथियों की सूरत की शिनाख्त तक नहीं कर सकते, उन्हें वो अपनी हंथेली पर रखने का जोखिम उठा चुके हैं। उन्हें ‘वंदे मातरम्‘ और ‘भारत माता की जय‘ के फ्रेम में ‘फिट‘ कर रहे हैं। उन्हें इस बात की खबर ही नहीं है, कि फांसी के फंदे तक पहुंचने से पहले भगत सिंह लेनिन की ‘‘राज्य और क्रांति‘‘ पढ़ रहे थे, जो इस बात का सबूत है, कि भगत सिंह इस देश के लिये कैसा इंकलाब चाहते थे? वे सिर्फ ब्रिटिश साम्राज्य नहीं, औपनिवेशिक साम्राज्यवाद के खिलाफ थे। उन्होंने पूंजीवाद का विरोध किया। उसके नाश के लिये आजादी की लड़ाई लड़ी।

भाजपा और मोदी सरकार, जो संघ के चेले और भगवा रंगरूट हैं, वो अपनी बिछी हुई चादर में गांधी से लेकर भगत सिंह और पटेल से लेकर अम्बेडकर तक को सिर्फ इसलिये लपेट लेना चाहते हैं, कि राष्ट्रवाद की उनकी गठरी बड़ी हो सके। वह अपने निर्मम राष्ट्रवाद को उदार दिखाने की विवशता से संचालित हो रहे हैं। जबकि उनकी हरकतें चुगली नहीं कर रही हैं, चीख रही हैं। चीख-चीख कर बता रही हैं, कि संघ और भाजपा एक सड़ी-गली सोच है। वह फाॅसिस्ट बनने के अलावा और कुछ बन ही नहीं सकती।

वर्तमान में भारतीय राष्ट्रवाद की सही परिभाषा जेएनयू है। जिसे इस देश की राजसत्ता (सरकारों) ने नहीं, मार्क्सवादी सोच और उसके जन लोकतांत्रिक मूल्यों ने बनाया है। जिसे भाजपा संघ आौर केंद्र की मोदी सरकार ‘देशद्रोहियों का गढ़‘ बता रही है, ताकि जन लोकतंत्र की अवधारणां और भारतीय राष्ट्रवाद की सही परिभाषा को तोड़ा जा सके। एक ऐसे राष्ट्रवाद को देश पर थोपा जा सके, जो संघ और भाजपा की सोच है। जिसे अपनी देशभक्ति प्रमाणित करने के लिये देशद्रोहियों की जरूरत पड़ती है।

उसने जेएनयू पर हमला यह सोच कर नहीं किया था, कि प्रतिरोध इतना बड़ा खड़ा होगा, बल्कि उसने यह सोचा था कि वामपंथियों के इस गढ़ का रसद-पानी सरकार के कब्जे में है, यदि उसे वह रोक देगी तो किला फतह। आॅकोपायी यूजीसी, रोहित वेमुला के मुद्दे का भी सफाया हो जायेगा। और उसने ‘देशद्रोही‘ बनाने का जो खेल शुरू किया, छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार उसका पहला शिकार बने। आरोप कईयों पर था, मगर हिरासत में कन्हैया कुमार को लिया गया। ‘मीडिया ट्राॅयल‘ को माध्यम बना कर सड़कों पर ही ‘देशद्रोही को निपटाना‘ संभव नहीं हो सका। उमर खालिद और अनिर्बान भट्टाचार्य ने सरेण्डर कर दिया। अदालतों की भूमिका को सरकार नियंत्रित नहीं कर सकी, मगर भाजपा और सरकार अपने राष्ट्रवाद की गठरी में ‘वंदे मातरम्‘ और ‘भारत माता की जय‘ छाप ढ़ेरों देशभक्ति बांधी ली।

इसे ही उसने ‘विधान सभाओं‘ के चुनाव का मुद्दा बनाया है। भारत माता, उनकी वंदना, महात्मा गांधी, सुभाषचंद्र बोस, सरदार पटेल और डाॅ0 भीमराव अम्बेडकर को कांग्रेस से छीन कर वह अपनी राष्ट्रवाद की गठरी सिर्फ इसलिये बढ़ा रही है, कि मतदाता सध जायें और संघ के हिंदू राष्ट्रवाद को हिंदुस्तान पर कील की तरह ठोंका जा सके। अपने ‘संदिगध राष्ट्रवाद‘ को वह देश के स्थापित महामानवों के जरिये वैधानिक बनाना चाहती है। भगत सिंह खप नहीं सके।

राष्ट्रवाद का फैशन अभी चल रहा है। भाजपा को अपने मतलब का राष्ट्रवाद नजर आ रहा है। कहने को उसका रंग तिरंगा है, मगर संघ अैर भाजपा के खेमें में उसका रंग पक्का केसरिया हैं जिसमें नवउदारवादी वैश्वीकरण और वित्तीय पूंजी का ऐसा रंग घुला है, जो सब पर भारी है। जिसने राष्ट्रवाद को अपना हथियार बना लिया है, जिनके हित में संघ, भाजपा और मोदी सरकार दमन के छोटे-बड़े हथियार उठा रही है।

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