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लोकतंत्र को वर्दी पहनाने की नीति

Bharat Wich Ghat Gintiyan Da Rakha Kaun - 17

भाजपा का राजनीतिक विकल्प बनने की बातें कुछ ऐसे की जाती हैं, जैसे यह मोदी के खिलाफ खड़े होने की गुस्ताखी है, या अवसरवादी लोगों की राजनीतिक चाल है। उन राजनीतिक दलों की चालबाजी है, जो भाजपा, संघ और मोदी को बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं। मतलब? विकल्पों की खोज गलत है।

यह भाजपा और मोदी की हैसियत बढ़ाने की ऐसी नीति है, जिसमें संघ और मोदी समर्थक नीतिकार, प्रचारतंत्र और उन लिक्खाड़ों को उतार दिया गया है, जिनकी अपनी कोई समझ नहीं है।

यह राजनीतिक एकाधिकार को भावनात्मक आधार देने की ऐसी कोशिश है, जिसकी सफलता का मतलब लोकतंत्र की क्रमिक हत्या है। एक दल की ऐसी तानाशाही है, जिसके शीर्ष पर संघ और सरकार की कुर्सी है, जिसे चुनौतियां स्वीकार नहीं।

यह उन लोगों की सोची-समझी कार्ययोजना है, जो किसी भी कीमत पर दशकों सत्ता में सिर्फ इसलिये बने रहना चाहते हैं, कि हिंदू राष्ट्रवाद और वित्तीय ताकतों के हितों को देश में सुरक्षित रख सकें।

इस देश में प्रधानमंत्री बने रहने की जितनी जर्बदश्त ख्वाहिश नरेंद्र मोदी की है, शायद किसी की नहीं। और सत्ता में बने रहने की जितनी जरूरत राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को है, उतनी जरूरत किसी भी राजनीतिक दल एवं संगठन को नहीं है। क्योंकि सत्ता से बेदखल होते ही इनकेे पांव के नीचे से जमीन खिसक जायेगी। इसलिये बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने सभी गैर भाजपायी राजनीतिक दलों की एकजुटता और ‘‘आरएसएस‘‘ तथा भाजपा मुक्त भारत के लिये एक मंच की बात कर दी, तो नीतिकारों और लिक्खाड़ों ने नीतीश कुमार को पीएम बनने की आकांक्षा से पीडि़त मान लिया। उन्होंने यह निष्कर्ष निकाल लिया कि भाजपा को राष्ट्रीय स्तर पर चुनौती देने की क्षमता कांग्रेस में नहीं है। कि 2019 में नरेंद्र मोदी के सामने अपने दम पर खड़े होने की ताकत इस देश के किसी भी राजनेता में नहीं है। कि मोदी और सिर्फ मोदी ही इस देश की मांग है।

क्या यह सच है?

क्या हिंदू राष्ट्रवाद और भारत माता छाप देशभक्ति इस देश की पहली जरूरत है? जिसे संघ, सरकार और भाजपा हवा दे रही है।

क्या आर्थिक महाशक्ति बनने के बकवास का दम नहीं निकल रहा है?

क्या जेएनयू के मुद्दे ने देश भर के छात्र आंदोलनों का नयी दिशा नहीं दी है?

क्या कारण है, कि अदालतें केंद्र सरकार की हरकतों पर सवाल खड़े कर रही हैं? चाहे वह जेएनयू का मामला हो, चाहे वह 10 राज्यों केे सूखाग्रस्त होने और सरकार की लापरवाही का मामला हो, या उत्तराखण्ड में राष्ट्रपति शासन का मामला हो।

सच यह है, कि सरकार कटघरे में है, और लोगों का भरम तेजी से टूट रहा है। भाजपा ने दो साल बीतते-बीतते ही राष्ट्रवाद का आखिरी हथियार उठा लिया है। जिसके विरूद्ध विकल्प की अनिवार्यता बढ़ती जा रही है। भारतीय लोकतंत्र खतरे में इसलिये भी है, कि सरकार चुनाव को ही चुनौती दे रही है -जो उसके एकाधिकार के राह में सबसे बड़ी चुनौती है। वह लोकतंत्र को अपनी वर्दी  पहनाने का तरीका ढूंढ़ रही है। क्या किसी भी चुनी हुई सरकार की यह हरकत जायज है?

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