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देश की आम जनता से कुछ कहती अदालतें – 1

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देश की आम जनता के प्रति जिम्मेदार रहने, और

देश के लोकतांत्रिक ढांचे में रह कर सरकार चलाने की नसीहतें

देश की उच्च एवं सर्वोच्च न्यायालय दे रही हैं

जिसका सीधा सा अर्थ निकलता है, कि मोदी सरकार देश की आम जनता के प्रति लापरवाह है, और लोकतांत्रिक ढांचे को अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिये तोड़-मरोड़, रही है। यह देश की चुनी हुई किसी भी सरकार के लिये शर्मनाक है, लेकिन सरकार और भाजपा नशे में चूर है। उसकी हरकतें ऐसी हैं, जैसे मोदी से पहले इस देश में कोई प्रधानमंत्री हुआ ही नहीं। जवाहरलाल नेहरू सिर्फ गल्तियों के लिये और इंदिरा गांधी आपातकाल के लिये उल्लेखनिय हैं। हां, अटल बिहारी वाजपेयी नरेंद्र मोदी से पहले एक ऐसे प्रधानमंत्री थे, जिनकी सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वो भाजपायी थे। अभी भी हैं, मगर नरेंद्र मोदी के सामने घटता हुआ कद लिये। अपना कद बढ़ाने के लिये मोदी, मोदी भक्त और भाजपा सहित संघ किसी का भी कद घटाने में परहेज नहीं कर रहे हैं, लेकिन उनकी हरकतें ऐसी हैं, कि न्याय व्यवस्था खुले शब्दों में केंद्र को चेतावनी दे रही है।

21 अप्रैल गुरूवार को उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय ने केंद्र के द्वारा थोपे गये राष्ट्रपति शासन को -लगातार सुनवाई कर- रद्द कर दिया। अदालत ने कहा- ‘‘भारत में संघीय ढांचा है, लोकतांत्रिक सरकार को बिना किसी मजबूत साक्ष्य एवं आधार के गिराया नहीं जा सकता। अनुच्छेद 356 का उपयोग अंतिम विकल्प होना चाहिये। कि जब तक राज्य में संवैधानिक संकट उत्पन्न न हो, राष्ट्रपति शासन नहीं लगाया जाना चाहिये।‘‘

उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय ने कुछ ऐसी स्थापनायें दी हैं, जो देश के संविधान, उसके संघीय स्वरूप और इनका अतिक्रमण करती सरकार पर गंभीर सवाल है।

  • किसी भी निर्वाचित सरकार का निलंबन उसे सत्ता से बेदखल करना है। इससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया में शामिल नागरिकों में राजनीतिक अनास्था फैलती है।
  • इससे लोकतंत्र का बुनियादी ढांचा कमजोर होता है।
  • केंद्र सरकार और राज्य सरकारों के अपने-अपने सम्प्रभु अधिकार हैं। इनका उल्लंघन संघीय गणराज्य के लिये गलत है।
  • उत्तराखण्ड में राष्ट्रपति शासन एकमात्र ऐसा मामला है, जिसमें केंद्र ने राज्यपाल के साथ विधानसभा अध्यक्ष के अधिकारों पर भी प्रहार किया है।
  • एक दल से चुनाव जीतने के बाद दलबदल करना, संवैधानिक पाप है।

और यह काम केंद्र सरकार और भाजपा प्रदेश में अपनी सरकार बनाने के लिये अनिवार्य रूप से कर रही है। उसने शक्ति परीक्षण के विकल्प को ही समाप्त कर दिया। यही नहीं इस निर्णय के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में अपील कर 23 अप्रैल को, 27 अगस्त तक के लिये उसने स्थगन आदेश भी हासिल कर लिया है। किंतु राष्ट्रपति शासन की इस बहाली का लाभ केंद्र सरकार उठाने की स्थिति मे नहीं है, न तो वह सरकार बनाने का दावा पेश कर सकती है, ना ही राष्ट्रपति शासन को समाप्त कर सकती है। वह मुंह में पड़े निवाले को न तो उगल सकती है, ना ही निगल सकती है। कांग्रेस की सरकार को गिराने और सत्ता पर काबिज होने की मोदी सरकार की यह जल्दबाजी उसकी राजनीतिक असफलता में बदल गयी है।

पूरे हिंदुस्तान के हर एक राज्य और उसके हर एक निकायों पर कब्जा जमाने की भाजपा एवं संघ की महत्वाकांक्षा भारतीय लोकतंत्र और उसके राजनीतिक संरचना एवं प्रणाली के लिये खतरा बन गयी है। देश की अदालतें आम जनता से कुछ कह रही हैं, जिसक जिक्र नहीं हो रहा है। देश की मीडिया भी इस बारे में लापरवाह ही है, जबकि बातें होनी चाहिये। इस समझ को बढ़ाने की जरूरत है, कि चुनी हुई सरकारें यदि काॅरपोरेट के हितों से संचालित होने लगती हैं, तो लोकतंत्र असंदर्भित हो जाता है। खतरा इस बात का है, कि सरकार अपने वैधानिक अधिकारों का उपयोग न्यायप्रशासन के विरूद्ध भी कर सकती हैं।

न्यायालयों को ऐसी नसीहतें मिलने भी लगी हैं। कांग्रेस की मनमोहन सरकार की तरह ही भाजपा की मोदी सरकार न्यायालयों के निर्णय एवं निर्देशों को ‘नीतिगत मामलों‘ में हस्तक्षेप की तरह ही देखती है। लेकिन मनमोहन सरकार और मोदी सरकार की आक्रामकता में फर्क है। यह फर्क इसलिये भी है, कि देश की आम जनता पर कांग्रेस की पकड़ दशकों रही है, लेकिन मोदी सरकार के पास यह जन समर्थन वित्तीय ताकतों के उपहार की तरह है जिसे उन्होंने अपने रूके-थमे वित्तीय हितों को तेजी से पूरा करने की शर्तों के तहत, भाजपा एवं नरेंद्र मोदी को, काफी खर्च करके दिया है। जिसे हम ‘संवैधानिक प्रक्रिया के तहत सत्ता का अपहरण‘ मानते और कहते रहे हैं।

इसलिये, मोदी सरकार के सामने दो ऐसी बड़ी जिम्मेदारियां हैं, जिससे उसका अस्तित्व जुड़ा है-

  1. वित्तीय ताकतों के हितों को सुनिश्चित करना और उसे वैधानिक रूप से स्थापित करना।
  2. अपने को बनाये रखने के लिये संघ एवं वित्तीय ताकतों के बीच संतुलन बनाये रखना।

जो देश, उसके संघीय ढ़ांचा एवं लोकतंत्र सहित देश की आम जनता के हितों के विरूद्ध है। वैश्विक स्तर पर वित्तीय ताकतें जिस तरह फेडरल रिजर्व और सेण्ट्रल बैंकों एवं विश्व बैंक तथा अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष के जरिये वित्तीय बढ़त हासिल कर ली है, अब आर्थिक, सामरिक एवं साझेदारी के समझौतों के तहत, किसी भी देश की न्याय प्रक्रिया एवं उनकी अदालतों से ऊपर अपने को स्थापित कर रही हैं। भारत अब इसकी जद से बाहर नहीं है, क्योंकि मोदी सरकार की नीतियां देश को मुक्त व्यापार का प्रतिस्पद्र्धी क्षेत्र बनाना है। जिसकी राह में सबसे बड़ी बाधा लोकतंत्र और न्याय प्रशासन है।

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