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समाजवाद के वापसी का मुद्दा – 2

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सोवियत संघ केे पतन की बाद की दुनिया यूरो-अमेरिकी साम्राज्यवाद की सूरत लगा कर वैश्विक ताकतों के मनमानी की दुनिया है, वैसे यह सूरत उनके पास पहले से थी, जिसका मकसद विश्व पर एकाधिकार है। जिसके लिये उन्हें बार-बार मार्क्सवाद और उसके समाजवादी सोच से आज भी टकराना पड़ रहा है। यह खयाल उनके जेहन से कभी नहीं मिटा, कि मुक्त व्यापार के नये क्षेत्रों की रचना करने वाले रूस और चीन पूर्व समाजवादी देश हैं, जहां सोवियत संघ और समाजवाद के प्रति लोगों की आस्था बढ़ रही है।

शताब्दी के अंतिम दशक में जिन देशों में मार्क्सवाद को खारिज किया गया और समाजवादी व्यवस्था की जड़ें उखाड़ी गयीं, उन देशों में आज मार्क्सवाद की नयी समझ पैदा हो रही है, और समाजवाद की मांग हो रही है।

जिन लोगों ने सोवियत संघ क विघटन के बाद मान लिया था, कि मार्क्सवाद गुजरी हुई सदी की सोच है और लेनिनवाद की अब कोई पूछ नहीं है, उन लोगों के लिये यह चैंकाने वाला सच हो सकता है, कि रूस के आम लोगों में सोवियत संघ और समाजवाद के वापसी के सपने पल रहे हैं। वो सोवियत संघ और समाजवाद की पुर्नस्थापना चाहते हैं। लेकन जिन लोगों ने सोवियत संघ और पूर्वी यूरोप के समाजवादी देशों के पतन के बाद भी मार्क्सवाद को असंदर्भित नहीं माना और लेनिनवाद पर यकीन किया उनके लिये यह अच्छी खबर है, कि हाल ही में कराये गये एक सर्वेक्षण से इस बात का खुलासा हुआ, कि रूस के ज्यादातर लोग सोवियत संघ और समाजवाद के पक्षधर हैं।

लेवाद सेण्टर के अध्ययन और कराये गये सर्वेक्षण के अनुसार रूस के 56 प्रतिशत लोगों का मानना है, कि ‘‘सोवियत संघ का विघटन एक ऐसी दूर्घटना है, जिसे रोका जा सकता था।‘‘ उन्होंने सोवियत संघ की पुर्नस्थापना और समाजवाद के पक्ष में मत दिया। मात्र 28 प्रतिशत लोगों ने विरोध में मत डाले और 16 प्रतिशत लोगों ने इस सवाल का जवाब नहीं दिया। आधे से अधिक -51 प्रतिशत- लोग मानते हैं, कि सोवियत संघ के विघटन को रोका जा सकता था, जबकि 33 प्रतिशत लोग इसे ऐसी घटना मानते हैं, जिसे रोका नहीं जा सकता था। सोवियत संघ की पुर्नस्थापना को पूरी तरह सही मानने वालों की तादाद 14 प्रतिशत है, जबकि 44 प्रतिशत लोग इसे अव्यवहारिक मानते हैं। 31 प्रतिशत लोग इसके विरोध में हैं। 10 प्रतिशत लोगों ने जवाब नहीं दिया।

सोवियत संघ का उत्थान और सोवियत संघ का पतन आधुनिक इतिहास की ऐसी घटना है, जिसने इतिहास के रूख को बदल दिया। पहली बार मार्क्सवादी सोच के आधार पर एक ऐसी समाज व्यवस्था का निर्माण किया गया जिसका लक्ष्य वर्गविहीन समाज और राज्य विहीन विश्व का निर्माण था। पहली मर्तबा समाज के शोषित वर्ग ने अपनी सरकार बनायी और यह प्रमाणित किया कि वह अपनी ऐतिहासिक जिम्मेदारियों निभा सकती है।

यह राजसत्ता पर शोषकों के वर्चस्व एवं एकाधिकार के समाप्ति की घोषणां थी।

रूस में, इस गौरवशाली विगत को पाने की ललक, साल 2000 के बाद से, अब तक के अपने सर्वोच्च बिंदू पर है। विश्लेषकों का अनुमान है, कि साल 2008-09 के वैश्विक मंदी में रूस का आना इसकी सबसे बड़ी वजह है। आम रूसी लोगों को अपने मासिक आय का आधा से ज्यादा, सिर्फ खाने पर खर्च करना पड़ रहा है। ‘इन्स्टीट्यूट आॅफ स्पेशल एनालीसिस एण्ड फोरकास्टिंग इन्स्टीट्यूट‘ के अध्ययन में इस बात का भी उल्लेख किया गया है, कि इसी दौरान सरकार के द्वारा दिये जाने वाले छूट में भी भारी कटौतियां की गयी हैं।

पूंजीवादी बाजारवाद और नवउदारवादी वैश्वीकरण का यह स्वभाव ही है, कि जहां भी निजी वित्तीय पूंजी है, वैश्विक वित्तीय इकाईयां हैं, वहां आम जनता के विरूद्ध कटौतियां रोज बढ़ती जायेंगी। सरकार समाज की जिम्मेदारियों से हाथ खींचती हैं, और जन समर्थक सरकारों का अंत हो जाता है।

यह दौर जन विरोधी सरकारों का है।

यह दौर जन विरोधी सरकारों के विरूद्ध जन उभार का है।

रूस में समाजवादी समाज व्यवस्था और सोवियत संघ की वापसी इन्हीं वैश्विक रूझान और जनअसंतोष का हिस्सा हैं

सर्वेक्षण में शामिल लोगों से जब यह सवाल सीधे तौर पर किया गया, कि ‘‘क्या आप सोवियत संघ की पुर्नस्थापना चाहते हैं?‘‘ तो 58 प्रतिशत लोगों ने जवाब -‘हां‘ में दिया।

रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने अप्रैल 2005 में देश की संसद -डयूमा- में, आम रूसी लोगों को सम्बोधित करते हुए कहा था- ‘‘सोवियत संघ का पतन पिछली सदी की सबसे बड़ी भू-राजनीतिक दूर्घटना है।‘‘ पुतिन के इस वक्तव्य को पकड़ कर अंतर्राष्ट्रीय मीडिया ने यह कहना शुरू कर दिया कि ‘‘क्रैमलिन समाजवाद की ओर लौटने की योजना बना रहा है।‘‘ आज भी पूंजीवादी विश्व -यूरो अमेरिकी साम्राज्यवाद रूस के हर एक वैश्विक गतिविधियों को इसी नजरिये से देखता है। उसकी आशंकायें कम नहीं हैं।

‘शंघाई सहयोग संगठन‘ से लेकर पूर्व सोवियत संघ के सदस्य देशों के साथ आर्थिक सहयोग एवं सामरिक सुरक्षा समझौतों सहित जैसी एकजुटता पुतिन ने कायम की है, और जिस तेजी से रूस ने अपनी वैश्विक स्थिति मजबूत की है, यूरोपीय संघ ओर अमेरिकी साम्राज्य के लिये नयी चुनौती हैं यूक्रेन में रूस की स्थिति और क्रिमिया का रूसी संघ में विलय भी एक कारण है। सीरिया की सुरक्षा और स्थिरता के लिये रूस अनिवार्य शर्त बन गया है। चीन के साथ लातिनी अमेरिकी देशों में भी रूस अमेरिका के लिये बड़ी चुनौती है, जहां आर्थिक एवं वैधानिक तख्तापलट की अमेरिकी नीतियां जारी हैं।

हम मानते हैं, कि सोवियत संघ की वापसी वैसे नहीं होगी, जैसा वह था, किंतु समाजवाद की अनिवार्यता को रोका नहीं जा सकता। संभवतः यह पुतिन का कूटनीतिक वक्तव्य है, कि ‘‘सोवियत संघ के पुर्नस्थापना की हमारी कोई योजना नहीं है।‘‘ किंतु इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि रूस में एवं विश्व में, आम लोगों के बीच समाजवाद की अवधारणां तेजी से बढ़ रही है। वैसे भी पूंजीवाद ढ़लान पर पड़े उस पत्थर की तरह है, जिसका लुढ़कना इतिहास का नियम नियंत्रित सिद्धांत है। वह अपने बढ़ते बजन और बढ़ती हुई विसंगतियों को रोकने की स्थिति में नहीं है। इसके बाद भी सच यह है, कि समाजवाद के वापसी की राहें आसान नहीं हैं। हम संक्रमण के उस घातक दौर में हैं, जहां पूंजीवाद, पूंजीवाद नहीं और समाजवाद, समाजवाद नहीं है।

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