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अपने हिस्से का मई दिवस

may_day_2013_05

दिल की गलियों से
गुजरते हैं वो लोग
जिन्होंने
अपने हिस्से की लड़ाईयां मिल कर लड़ी।
आज एक मई है- ‘‘दुनिया के मजदूरों एक हो!‘‘
‘‘काॅमरेड, लाल सलाम!‘‘ कहता हूं मैं
और पूछता हूं आपसे
आपने अपने हिस्से का मई दिवस
कैसे मनाया?
कैसे जीया उसे आपने?
दिन बीता, बातें खत्म, या बाकी हैं?

क्या कहेंगे आप
दिल की गलियों में कौन रहता है?
खौफ…?
खयाल…?
उम्मीदें…?
‘देशभक्ति‘ के नशे में चूर
‘देशद्रोहियों‘ को ढूंढ़ती हुई
एक ऐसी सरकार है देश में
जिसने अपनी सूरत नहीं देखी।
वह आदमी
जो मोम का पुतला बना खुश है,
हत्यारों की जमात में जगह बना कर।

वह आदमी
सूख कर फटी हुई जमीन
बुझी हुई आंखों में झांक कर
अंदाजा लगा रहा है- नफा-नुक्सान का।
उसे, उन सौदागरों की फिक्र है
जिनके लिये मौसम
न जाने कब से खुशगवार है?
जबकि आग के गोले
बरस रहे हैं,
बरस रही है आग
पानी के बूंदों को सोखती
अनाज के दानों में आग लगाती हुई।

मुल्क
और आवाम की,
उसके ताकत की नीलामी हो रही है
बंधी हुई मुट्ठियां खोली जा रही हैं
तोड़ी जा रही हैं अंगुलियां।
मुल्क की गलियों में घूमता
बेरहम कालित बे-खौफ है
वह अपने टीन के मुखौटे को
बदल रहा है जंग लगे लोहे में।
कपड़ों की वर्दी को
जिरह-बख्तर बना रहा है।
जिसकी भी गर्दन जहां भी तनी है
उसके लिये सख्त हंथौड़ा है।

जरा सोच कर बतायें-
हमारे हाथों का
हंसिया और हथौडा कहां है?
कहां हैं वो लोग
जिन्होंने एक सोच को खड़ा किया,
कुर्बानियां दी?
कितनी जगह है उनकी हमारे बीच?
मार्क्स-एंगेल्स से मिले?
लेनिन-माओ से बातें हुईं?
भगत सिंह से हाथ मिलाया आपने?
फिदेल-चे से मिल कर हुआ यकीन
कि दुनिया में जो भी है, अच्छा वह हमारा है?

शाॅवेज भी
एक रास्ता हैं।
दुनिया में ऐसी कोई जगह नहीं,
जहां हम नहीं।
हम अपने होने की जगह तय करें,
जहां भी
लड़ी जा रही हैं लड़ाईयां वहां चलें
दिल की गलियों से गुजरते
लोगों के बीच चलें,
जेएनयू चलें।
कहां हैं आप?
काॅमरेड लाल सलाम
आज एक मई है।
हम जहां हैं, वहीं
लोगों से मिल कर अपनी लड़ाईयां लड़ें।

-आलोकवर्द्धन

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