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निखिल ‘नादां’ की तीन कविताएं

13082526_955551824565756_4384751737337316809_n1. डायरी बोलती है ..

तुम्हे पता है,
सुलग रही हैं मेरी कितनी डायरियां,
जिस भी पन्ने पर हाँथ पड़ता है ,
दहक उठती हैं उंगलियां |
जो वक्त तब चल रहा था न ,
कभी कभी,
मेरी डायरी से भी गुज़र जाया करता था ,
अब कितना समेटता मैं भी,
ए फोर साइज के पेपर में ?
जितना समेटा जा सकता था,
उतना ही समेट पाया हूँ |
मैं भी कोई बहुत सच्चा व्यक्ति नहीं हूँ ,
हज़ार कमियां लेके  घूमता  हूँ |
मैं खुद को,
तुम्हारी कहानी में  कहीं नहीं पता ,
हलांकि ,
मेरी डायरियों में कभी कभी ,
कुछ पन्नो में ,
वॉटरमार्क की तरह दिख जाते हो तुम ,
शायद कई कई पन्नो में ,
लगातार दिखते हो ,
इस कविता में भी  हो ,
अब पता नहीं,
पढ़ने वालों को केवल अक्षर दिखेंगे,
या,
वॉटरमार्क भी …

 

2. शरारत

लो,
कर दी फिर शरारत,
थकान को आज फिर,
बिना चढ़े ही उतर जाने दिया |
किसी झील की,
छोटी छोटी मछलियों को,
जी भर के देख लिया था,
बस दो नज़रों में |
जितनी देर,
मैं,
झील के किनारे रहा,
वो मछलियाँ,
मेरी नज़रों के इशारों से खेलती रहीं |
फिर,
रेलगाड़ी रुकी,
मछलियों की थिरकन भी ठहरी,
मछलियाँ,
फिर से पुतलियाँ हो गयीं,
झील,
फिर से आँखे हो गयीं,
वो रेलगाड़ी से उतरकर,
आगे आगे चल दी,
मै भी चल दिया,
अपने रास्ते…..

 

3. बेचैनी रंग ….

रात इतनी काली थी,
की ,
अँधेरे में दिख भी नहीं रही थी,
रात की,
रंगत बदलने के लिए,
मैंने ,
मन की दराज़ में रखी,
यादों की चमकीली शीशी उठानी चाही,
लेकिन,
गलती से,
बगल में रखी,
एक दूसरी शीशी गिर के फूट गयी,
और इस तरह,
मेरी रात में,
बेचैनी रंग फ़ैल गया,
और सुबह तक,
मैं उसको समेट नहीं पाया ….

-निखिल पांडेय

सॉफ्टवेर इंजीनियर,
फिनांशियल सॉफ्टवेयर्स,
मुंबई, इंडिया |

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3 comments

  1. Bahut hi khubsurat samavesh kiya hai sabdon ka. Bahut hi aanand mahsus hota hai mitra jab hum tumari kavitayen padte hai. Bahut badiya.

  2. बहुत बढ़िया …

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