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अजीत सिंह चन्देल की पांच कविताएँ

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सोचता हूँ
टाट वाला लम्बा सा बोरा
लाद कर पीठ पर
किसी दिन मैं भी निकलूँ
अपने शहर की हर गली में
चिल्लाते हुए कबाड़ी वाला कबाड़ी वाला
तुम बेंच देना अपने पुराने ज्ञानार्जन की किताबें
घोंट घोंट कर याद करके लिखी हुई कापियां
बेच देना फटे बिखरे रामायण और महाभारत की पुस्तकें
अब तो रद्दी हो चुकी सोच भी बिकती है
आश्चर्य नहीं बेचता कोई सड़ी गली मानसिकता को
तैयार हूँ मैं हर वोर्थलेस यूजलेस को खरीदने को
काश कोई ऐसा भी मिलता
जो तैयार होता बेंचने को नग्नता हैवानियत दरिंदगी
पशुता
बेचारगी आवारगी छिछोरापन बेहूदगी
तो रद्दी में खरीद कर सच फेंक आता समुद्र की उस अनंत गहराई में
जहाँ से फिर न
लहुलुहान होता बदायूं निर्भया या मोहन तेरा वाला लाल गंज
मत बेचना मुझे उस लाडो की कोई ऐसी तस्वीर
जिसे देखकर या अपने कंधो पर रखकर
मैं एक कदम भी ना चल पाऊं
खेद व्यक्त करने को फोटो नहीं जरूरी है
हां ये अलग बात है हाय हाय करना मजबूरी है
हे विधाता तू क्या क्या करवाएगा
कब तक जननी को बेटे से ही मरवाएगा।।

 

2.

समंदर की गहराई रख
थोड़ी सी अंगड़ाई रख
चल निकल घर से
बहुत से चिरागों को तेरी जरूरत है
किसी में तेल किसी में बाती
डाल और कर दे रोशन इस जहाँ को
उजाला किसी एक का नहीं
यह सार्वभौम होगा।
अपनी शक्ति अपनी सामर्थ्य का सौवां हिस्सा दान कर
उठा संकल्प किसी बेबस का कल्याण कर।
नरम बिस्तरों की नीद
तेरे तरफ देखती आँखों की उम्मीद
भर ज़रा पूरी कर ज़रा
क्या कहेगा क्या करेगा जब परवरदिगार पूछेगा
कितने आँखों की आंसू पोंछा तुमने
कितने भूखे पेटों के भीतर झाँक कर देखा
तो तैयार रख
कहीं तू निरुत्तर ना रह जाए
वक़्त अब भी साथ है तेरे संभाल होश
कहीं तेरे सारे जज्बात बचपने में ना बह जाएँ।
जन्म तेरा या मेरा अल्लाह का एक फरमान है
कुछ कर जुड़ कुछ जरूरत मंदों से
तू इसीलिए तो इंसान है।।

 

3.

खुली सड़क पर नंगा नाच
और
सरे आम सांच पर आंच
रोज देखिये।
सारी उम्र जाने पर बीत
पूछ रहे जीने की रीत।
खोज रहे झूठे रिश्तो में प्रीत।।
रोज देखिये।
झूठ बेगारी औ रेजगारी
पाली कई बीमारी
धंधा मंदा फंदा डाले
गोरा बदन और आत्मा कारी।।
रोज देखिये।
प्रेम प्यार प्यास बवंडर
नकली चोंगा मस्त कलंदर
जोगी भोगी रोगी दुनिया
बस एक छलावे का सिकंदर।।
रोज देखिये।
सीता गीता सब कुछ बीता
सही मायने क्या क्या जीता
सच्चे होकर गच्चे खाओ
निकला मेरा पलीता।।
रोज देखिये।।

 

4.

शब्द कानों से टकरा कर वापिस आ जाते हैं
क्या है ये मेरे बहरे होने का प्रमाण।
तुम निकलो घर से देखो आँखों को खोल के
हजारों मिलेंगे बिलबिलाते हुए भूख से।
समझने की शक्ति ख़तम हो चुकी हो तो
छोड़ो सामने की थाली और दो किसी भूखे को
और अपलक निहारो उसके चेहरे को
तब समझोगे भूख क्या होती है
चंद सिक्कों के लिए ही तो बिक रहा ईमान है
ऊँची ऊँची कोठरियों में बंद सोने से लदा भगवान् है।
खा रहा है दूध मलाई जो जन्म दिया है
भ्रमित हो तुम
उसका खाना भी तो चटाकर मुंह से तुम्ही चट कर जाते हो
फिर भी हर मंदिर हर मस्जिद भटक कर आते हो।
चिल्लाते हो कि हे विधाता शांति दे
भरे पेट ओ नहीं सुनता
खाली ओ रखता नहीं
हम सब दोषी हैं इस अर्थतंत्र में
भूख बढ़ाना हो तो झांको किसी झोपड़ी में
भिलनी के जूठे बेर मिलेंगे
भूखे जन पर भूखे ही ढेर मिलेंगे।।
राम अब जंगल जायेंगे नहीं
ओ जूठी बेर खायेंगे नहीं।
तुम छोड़कर अपनी हर विलासिता मेरे साथ चलो
दिखाता हूँ तुम्हे असली सच असली भूख असली पीड़ा।।
हाथ जोड़ता हूँ दो वक़्त की रोटी छोडो
किसी एक भूखे का कमसे कम एक दिन तो बिना भूख से जोड़ो।।

 

5.

मेरे शहर में आदमी नहीं रहते
बस टहलती हैं कुछ परछाइयाँ
क्या तेरे शहर में भी ऐसा है
अगर हाँ तो मुझे भी बताना
उसका रूप रंग आकार प्रकार
क्या ओ किसी के दर्द में रोता है
दूसरों के आगे की रखी थाली
चट करके सोता है
बदहवास सा सपने सजाकर
उड़ता है जमीन छोड़कर
बिना आधार के
कसाई बना हरजाई बना
बिना प्यार के
सौदे घरौदे मसौदे में उलझा हुआ
भांग खाए रहता है
बुत बना सा धुत बना सा
खुद को आदमी कहता है
हे भाई अगर यही आदमी है वहां भी
तो इससे अच्छी मेरी परछाईं है
क्या कहूं एक तरफ कुआँ तो एक तरफ खाई है।।

– अजीत सिंह चन्देल

 

कवि परिचय :

अजीत सिंह चन्देल आज़मगढ़ की ग्रामीण पृष्ठभूमि में जन्म। 1997 में प्रांतीय लोक सेवा आयोग से चयनित। सम्प्रति डिप्टी कमिश्नर वाणिज्य कर उ0 प्र0

प्रस्तुति : नित्यानन्द गायेन

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One comment

  1. ऋषि कुमार

    सशक्त कविताओं के लिए बधाई।

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