Home / राष्ट्रीय परिदृश्य / सरकार मुद्दों को भटका रही है

सरकार मुद्दों को भटका रही है

13096164_10153462187035718_6344145631421533094_n

कन्हैया कुमार के हर एक हरकत पर नजर रखी जा रही है। यह नजर भाजपा, संघ और सरकार और उनके विरोधी ही नहीं, उनके सहयोगी और उनके पक्षधर भी रख रहे हैं।

यह स्वाभाविक है, मगर गलत है।

एक व्यक्ति को जेएनयू के आंदोलन और संघर्षों का प्रतीक बनाया जा रहा है।

विरोधियों को घात चाहिये और समर्थकों को खरा होने का ठोस प्रमाण।

जबकि हम सब इस बात को जानते हैं, कि यह दौर संक्रमण का है। जोड़-तोड़ और मिलावट का है। संघ एवं सरकार विरोधी मोर्चा बनाने का है। लोकतंत्र और जनवादी अधिकारों के पक्ष में खड़ा होने का है। इस बात को समझने और समझाने का है, कि देश में एक ऐसी जनविरोधी सरकार खड़ी हो गयी है, जो संघ और राष्ट्रीय बहुराष्ट्रीय वित्तीय ताकतों के हितों से संचालित हो रही है। और ऐसी ताकतों के खिलाफ एकजुटता और पूरे संघर्ष को एक व्यक्ति के सही होने या नहीं होने पर थोपा नहीं जा सकता।

और जेएनयू और छात्र आंदोलन ऐसा है भी नहीं। कन्हैया कुमार की सोच भी यह नहीं है।

विवाद है- कन्हैया कुमार ने नीतीश कुमार से मुलाकात की, लालू प्रसाद यादव के पांव छुये। इससे पहले राहुल गांधी से की गयी मुलाकात का मुद्दा भी खड़ा हुआ था।

जो विवाद है, उसे सवाल की तरह देखें।

क्या लगता है आपको?

क्या भाजपा, सघं और मोदी सरकार के खिलाफ सत्ता से बे-दखल हुई कांग्रेस, वाम मोर्चा या कोई भी एक राजनीतिक दल भाजपा और एनडीए गठबंधन के खिलाफ चुनावी समर जीत सकता है? या लोकतंत्र, संविधान और लोगों के जनवादी अधिकारों पर हो रहे हमलों के खिलाफ खड़ा होने का अधिकार किसी एक को है?

राष्ट्रवाद और देशभक्ति के जिन हंथियारों को संघ के म्यान से निकाल कर सरकार थाम चुकी है, और जिन राष्ट्रीय-बहुराष्ट्रीय कम्पनियों, वित्तीय ताकतों का समर्थन उसे हासिल है, उससे आप अकेले लड़ पायेंगे?

क्या देश में ऐसा एक भी राजनीतिक दल है, जिसकी पकड़ राष्ट्रीय स्तर पर हो, और जिसकी ईमानदारी की आप कसमें खा सकें?

नहीं! मामला खरा नहीं है। खोटा है।

मगर, लड़ाई है। और लड़ाई लड़नी ही होगी। और जीत के लिये लड़ाई अकेले नहीं लड़ी जा सकती।

बिहार ने संघ को, भाजपा को, और नरेंद्र मोदी को बिहार विधान सभा चुनाव में एक सबक दिया है। उसने संघ और भाजपा को सत्ता से बे-दखल करने का रास्ता भी सुझाया है। यह रास्ता राष्ट्रीय स्तर पर आसान भी नहीं है। दो साल में स्थितियां जितनी बदली हैं, बचे हुए तीन साल में स्थितियां और भी बदलेंगी। बद्तर होंगी। फासीवाद अपनी तमाम क्रूरता एवं खतरनाक मंसूबों के साथ चाह कर भी लम्बी उम्र नहीं जी पाता। लम्बी उम्र के लिये वित्तीय ताकतें लोकतंत्र का खेल खेलती रहती हैं। संघ और भाजपा अभी इस खेल के सत्तारूढ़ खिलाड़ी हैं। उनके पास वित्तीय ताकतों के इस खेल का अनुभव नहीं है। हां, वो जानती हैं, कि ‘‘ऐसा हो सकता है।‘‘ इसलिये वो सत्तारूढ़ होने की शर्तों को पूरा करने में लगी हैं।

वैसे भी, वित्तीय ताकतों ने संघ का नहीं, मोदी का समर्थन किया है। जिसके पीछे धूर दक्षिणपंथी और हिंदू राष्ट्रीवादी ताकतें खड़ी हैं।

भाजपा और नरेंद्र मोदी की यह बड़ी उपलब्धि है, कि चुनाव में देश की आम जनता को धोखा देने में वो सफल रहे। और यह सफलता उन्हें इसलिये मिली कि राष्ट्रीय एवं वैश्विक वित्तीय ताकतों ने मोदी को अपना समर्थन दिया। भाजपा मोदी के नाम पर और संघ के हिंदूवादी राष्ट्रवाद को छुपा कर चुनाव में जीत हासिल की। अमेरिका वाॅल स्ट्रीट के बैंकों, वित्तीय इकाईयों ने मोदी में आर्थिक विकास की संभावनाओं को दिखा कर माहौल बनया। वाॅल स्ट्रीट की निजी एजेन्सियों ने ही चुनाव प्रचार को निर्देशित किया। करोड़ो-करोड़ का सौदा हुआ, मुनाफा कमाया।

मोदी और उनकी सरकार इन्हीं ताकतों के प्रवक्ता हैं। शिक्षा एवं विश्वविद्यालयों पर हो रहे हमलों के पीछे निजी कम्पनियां और विश्व व्यापार संगठन से हुए समझौते हैं। भारत में शिक्षा का बड़ा बाजार है। यह देश की बौद्धिक सम्पदा का सौदा है। प्राकृतिक सम्पदा और श्रम सम्पदा का सौदा। अनुमान से बड़ा यह सौदा है। इसलिये मोदी सरकार की नीतियों का विरोध इन तमाम सौदों का विरोध है।

अब आप अनुमान लगा सकते हैं, कि यह लड़ाई कितनी बड़ी है। इस बात का भी अनुमान लगाया जा सकता है, कि जेएनयू के फ्रिडम स्क्वायर की यात्रा कितनी लम्बी है?

सरकार मुद्दों को बरगलाने में माहिर है।

प्राकृतिक सम्पदा को निजी कम्पनियों को सौंपने के लिये जब वह भूमि अधिग्रहण का अभियान चलाती है, जब वह श्रम सम्पदा को औने-पौने में बेचने का आधार श्रम कानूनों में संशोधनों से करती है, जब वह बौद्धिक सम्पदा को बाजार में उतारना चाहती है, हर एक मुद्दे को एक-दूसरे  के खिलाफ खड़ा करती है, और संघ के घातक हिंदू राष्ट्रवाद और देशभक्ति को अपना हथियार बनाती है। उसकी देशभक्ति अघोषित देशद्रोह है। जिसके विरूद्ध वह विकल्पों को बनने नहीं देना चाहती है। सरकार जरूरत से ज्यादा शातीर है। मीडिया को उसने अपना दलाल बना लिया है। वह देश में जारी विरोध को भी अपने मतलब से जोड़ ली है। यह किस सीमा तक खतरनाक है(?) इसका अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं, कि आज विश्वविद्यालयों में जो हो रहा है, उसकी खबर आम जनता को नहीं है, और जो है, वह सरकारी झूठ है।

यही स्थिति सरकार की जन विरोधी नीतियों के खिलाफ हो रहे जनप्रतिरोधों की है।

सोशल मीडिया में भी सरकार समर्थक ऐसे ‘सेल‘ हैं, जो मुद्दों को भटकाते हैं।

जेएनयू के लोगों ने न सिर्फ मुद्दों की एकजुटता की बातें की है, बल्कि दुश्मनों की सही शिनाख्त और संघर्ष के एकजुटता को भी समझा है।

सरकार इसी सोच, समझ और कार्यनीति के खिलाफ है। वह किसी भी कीमत पर आंदोलन को, उसकी एकजुटता को तोड़ने और संघर्ष की दिशा को बदलना चाहती है।

जेएनयू प्रशासन के निर्णय के खिलाफ जेएनयू के छात्र अनियतकालीन भूख हड़ताल पर हैं। जिसमें कन्हैया कुमार भी शामिल हैं। इस संघर्ष के दौरान उन्होंने पटना में नीतीश कुमार और लालू यादव से मुलाकात ही नहीं की, जनसभायें भी की। यह बड़ी बात है। बहस इस पर होनी चाहिये।

बहस इस पर होनी चाहिये कि छात्र आंदोलन क्यों? भूख हड़ताल के प्रति जेएनयू प्रशासन, मीडिया और सरकार की उपेक्षा क्यो?

बहस इस बात पर होनी चाहिये कि मोदी सरकार क्या कर रही है?

क्यों छात्रों के जायज मांगों के प्रति उसका रवैया निर्ममता की हदें लांघ रहा है?

न्यायालय जिसे देशद्रोह नहीं मानती संघ, सरकार और भाजपा क्यों उन्हें देशद्रोही करार दे रही है?

क्या देश की चुनी हुई सरकार ऐसी ही होती है?

कन्हैया कुमार जैसे लोगों की जरूरत है, किंतु उन्हें जेएनयू और छात्र आंदोलन बनाने की साजिशें बंद हों।

उन छात्रों को सलाम करने की जरूरत है, जो हमसे बेहरत तरीके से सोचते हैं और लड़ रहे हैं। उनकी लड़ाई वास्तव में इस देश में स्थगित होते लोकतंत्र की बहाली की लड़ाई है। उन्होंने देश में राजनीतिक एकजुटता और आम जनता की लामबंदी की दिशा तय की है। भारतीय लोकतंत्र के लिये संक्रमण के इस दौर को समझने की जरूरत है। इस बात को समझने की जरूरत है, कि सरकार मुद्दों को भटका रही है। लोकतांत्रिक एवं जनवादी ताकतों पर हमले कर रही है।

Print Friendly

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

Select language:
Hindi
English
Scroll To Top