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छात्रों पर हमला, हर वर्ग पर एकसाथ हमला है

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लोकतंत्र की यदि आप राहें बंद कर रहे हैं, तो मानी हुई बात है, कि लोकतंत्र की लड़ाई को आप दूसरी राह पर डालना चाहते हैं। आप चाहते हैं, कि संघर्षों की दिशा अलोकतांत्रिक हो, ताकि लोकतंत्र के नाम पर दमन का अधिकार आपको मिल सके।

इस अधिकार को हासिल करने के लिये ही केंद्र की मोदी सरकार ने जेएनयू छात्र आंदोलन को समझने के बजाये, उसे देशद्रोहियों के सांचे में ढ़ाल दिया। किसी बात की निष्पक्ष जांच कराने के बजाये छात्रों को देशद्रोह के आरोपों से घेर कर उन्हें हिरासत में ले लिया।

यह गलत है।

मगर इस गल्ती को मानने के बजाये सरकार न्यायालयों के द्वारा सुधार की जो दिशा दी गयी कि, ‘‘इस आरोप का कोई आधार नहीं है‘‘, गलत नीतियों पर चलना न सिर्फ जारी रखी है, बल्कि उन गल्तियों को ही जायज ठहराने पर तुली है। न्यायालय में केस लम्बित होने के बाद भी जेएनयू प्रशासन -हाई लेवल इन्क्वायरी कमेटी- के द्वारा गलत कार्यवाही का निर्णय सुना देती है, जिसमें छात्रों का कोई प्रतिनिधि तक नहीं है, छात्रों को अपना पक्ष तक रखने नहीं दिया गया।

सरकार और विश्वविद्यालय प्रशासन छात्रों क भूख हड़ताल को अवैध करार दे रही है।

मामले को खतरे के निशान के ऊपर पहुंचा चुकी है।

भूख हड़ाल में बैठे छात्रों के हालत गंभीर है। कन्हैया कुमार की स्थिति चिंताजनक है। कई छात्रों की हालत गिड़ती जा रही है। जिसकी खबर देश की आम जनता को नहीं है।

खबरें खामोश

बिकी हुई मीडिया सरकार को ताक रही है।

उनकी समझ में यह नहीं आ रहा है, कि उनकी ऐसी हरकत लोकतंत्र के मुंह पर तमाचा है। यदि आज एक आंदोलन का गला ऐसे घोंटा जायेगा, तो लोकतंत्र का दम भी घुट जायेगा। और घुटी हुई चीख जब गला फाड़ कर निकलेगी तो कान के परदे ही नहीं फटेंगे, जो है उसकी भी चिन्दियां उड़ जायेंगी। यदि हालात नहीं बदले, तो हालात की सूरत बिगड़़ेगी।

सच और खबरों का दम नहीं घुटता।

जन असंतोष को प्रकृति की नाराजगी समझें, जिसके सामने किसी की कोई वकत नहीं होती।

यह ठीक है, कि आम जनता से खबरें आज छुपा ली जायेंगी।

यह भी ठीक है, कि आम जनता के कानों में गलत खबरें आप डाल लेंगे, मगर कब तक?

सताये हुए नाराज लोगों में आज नहीं तो कल दोस्ती होगी ही होगी। उनकी एकजुटता का समय जरूर आता है।

यदि अपने देश, अपनी दुनिया और समाज के लिये सोचने वाले छात्रों को कुछ हो गया तो वह आपके ताबूत पर कील ही होगा, फिर अपनी कब्र तो आपने पहले से खोद रखी है। एक ऐसी व्यवस्था के पक्षधर हैं, आप जो अपने को बचाने के लिये किसी को भी मार देती है। वह फाॅसिस्ट ताकतों को खड़ा करती है, और फिर उन्हीं फाॅसिस्ट ताकतों को मार कर पूंजीवादी लोकतंत्र का तमाशा खड़ा करती है।

आप नये मुल्ला हैं मोदी जी, प्याज कुछ ज्यादा खा रहे हैं, सम्भल कर खाईये। दो साल में ही आपने इतना खा लिया है, कि मुंह से बदबू आने लगी है। आम जनता के बिना कोई भी सरकार नहीं चलती। वर्दी और हथियारों की सुरक्षा किसी के काम नहीं आती, क्योंकि हर वर्दी के नीचे किसान होता है। चाहे वह सेना की वर्दी हो, पुलिस की वर्दी हो या संघ की वर्दी हो। छात्रों पर हमला समाज के हर एक वर्ग पर एकसाथ हमला है। मीठी जुबान से फीके पकवान बार-बार नहीं बिकते। फिर आप तो किसानों को भी मार रहे हैं, मजदूरों को भी मार रहे हैं, आदिवासी, दलित और समाज के कमजोर वर्ग को भी मार रहे है। चंद लोगों की खुशहाली सबकी खुशहाली नहीं बन सकती।

आपने रोहित वेमुला को मारा, देख रहे हैं न मौत की परिस्थितियों को बनाने का परिणाम।

सबक लीजिये, मामला गंभीर है।

कन्हैया, उमर, रामा नागा और वो तमाम लोग जो अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल कर बैठे हैं, उन्हें आंख के पुतलियों की तरह बचायें, नहीं तो अंधापन आपकी नियति बन जायेगी, क्योंकि जेएनयू धीरे-धीरे हिंदुस्तान बन रहा है। लोकतंत्र की राहें बंद करना गलत है।

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