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सरकार की उपलब्धियां – शटअप इण्डिया

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26 मई को, केंद्र की मोदी सरकार दो साल की हो जायेगी। वह अपनी उपलब्धियां गिनाना चाहती है। हम गिनने को तैयार हैं। गिनायें।

सरकार चाहती है, उसके मंत्री-संतरी, सांसद-भिस्ती, सभी घर-घर जायें और सरकार की उपब्धियों को गिनाने का काम करें। मगर मंत्री-सांसद ऐसा नहीं कर रहे हैं। संतरी-भिस्ती की समझ में नहीं आ रहा है, कि गिनती तो आती नहीं, गिनायें कैसे? मोदी जी परेशान हैं, और अमित शाह जी भी परेशान हैं, और हमारी परेशानी यह है, कि हम एक जगह टिकते नहीं, यहां-वहां होते हैं, और जहां होते हैं, वहां कुछ खास नजर नहीं आता।

सूखा ग्रस्त-अकाल पीडि़तों के बीच, उनके लिये कुछ करने वाली सरकार नजर नहीं आती। 33 करोड़ से अधिक लोगों की जान सूखी हुई धरती, सूखे हुए पत्ते पर अंटकी है। पानी है नहीं, दाना है नहीं, सरकारें हैं नहीं, और उम्मीदें भी नहीं हैं। सुप्रिम कोर्ट सरकार की आंखों में अंगुली डाल कर दिखाती है, कि ‘‘आम जनता की जिम्मेदारी आप पर है।‘‘ सरकार आम जनता की आंखों में अंगुली डाल कर दिखाने पर तुली है, कि हमारी उपलब्धियां बड़ी हैं। यह बड़ी उपलब्धि है, कि प्रधानमंत्री जी सूखे की स्थिति पर नजर रखे हुए हैं। और जहां उनकी नजर है, वहां आम जनता की फजीहत है, दुश्वारियां हैं, मरने की परिस्थितियां हैं। मुद्दों को बहकाने की नीतियां हैं।

हमें लगता है, जहां जेएनयू है, वहां हक की लड़ाई है। लोकतंत्र को बचाने की लड़ाई है। मगर सरकार को लगता है, वहां देशद्रोही है। संघ को लगता है- सख्ती से पेश आओ। हो सके तो मार दो। भाजपा संघ की जुबान में बात करती है। सरकार झूठ की बुनियाद पर खड़ी हो कर ‘मीडिया ट्राॅयल‘ को न्यायालयों के खिलाफ, सच बनाने पर तुली है। प्रधानमंत्री जी बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, मगर जहां जेएनयू है, वहां चुप हैं। जहां सूखाग्रस्त क्षेत्र है, वहां चुप हैं। जहां आर्थिक विकास की बात है, वहां आदिवासी, किसानों पर गाज है, मजदूरों पर मार है। छत्तीसगढ़ में लोगों को अपनी जमीन से बेदखल करने के लिये सरकार काॅरपोरेट के पक्ष में मुस्तैद हैं मुस्तैदी का आलम यह है, कि हवाई हमले की तैयारियां चल रही हैं। यह हवा है या सच है? पता नहीं। लेकिन जो भी किसान-आदिवासियों के पक्ष में है, वो माओवादी हैं, देशद्रोही हैं। सलाखों के पीछे सामाजिक कार्यकर्ता और पत्रकार हैं।

समझना मुश्किल है, कि यह देश किसका है? सरकार किसकी है? मीडिया के चेहरे पर खुली आंख और मुस्कुराते होंटो की बंधी पट्टी है। गजब की जकड़बंदी है। जो हो रहा है, उसकी किसी को खबर नहीं। खबरे यदि कानों कान न फैलें, सोशल मीडिया न हो, तो कहीं कोई खबर ही नहीं है। ऐसी जकड़बंदी तो आपातकाल में भी नहीं थी, जैसी जकड़बंदी है। मोदी ओबामा और देश अमेरिका बनने के फिराक में है।

मोदी जी जहां जाते हैं -देश में- वहां सुरक्षा के नाम पर सन्नाटा पसर जाता है, और भांट एक स्वर में स्तुतिगान गाते हैं। 1 मई को प्रधानमंत्री जी बनारस आये। 2 मई को अखबारों ने खबर बांटी मजदूर दिवस पर मोदी जी ने सौगातों की बौछार लगा दी।

आईये देखें, इस कृत्रिम बौछार में कितने लोग भीगे? बलिया में 10 महिलाओं को मुफ्त में गैस कनेक्शन दिया गया, और तीन साल में 5 करोड़ महिलाओं को मुफ्त में गैस कनेक्शन देने की बात को तीन साल के लिये टांग दिया गया। कहा गया यह उज्जवल योजना है, गरीबी की सीमा रेखा से नीचे रहने वाली महिलाओं के लिये।

एक चुल्लू पानी से पांच करोड़ परिवार भीग गया।

दूसरा चुल्लू पानी बनारस में 16 रिक्शा चालकों को ई-रिक्शा दिया गया, और 11 नौका चालकों को ई-नौका दिया गया। बाद में ‘‘भारतीय माइक्रो क्रेडिट‘‘ नामक संस्था ने 1000 ई-रिक्शा बांटे।

मई दिवस मन गया। प्रधानमंत्री ने कहा- ‘हमने जो भी योजना बनाई, वे गरीबों को ताकत देती है, ताकि गरीब स्वयं गरीबी के खिलाफ लड़े, लड़ने की हिम्मत रखे।

उन्होंने जन-धन योजना की तारीफ की कि ‘‘मैंने बैंकों को जीरो बैलेंस पर खाता खोलने को कहा, मगर गरीबों ने इसके तहत 35,000 करोड़ रूपये बैंकों में जमा करा दिये। इस देश का गरीब मुफ्त में कुछ नही लेता, इसलिये मुझे संतोष होता है। गरीबों के लिये दिन-रात दौड़ने का मन करता है।‘‘

और यह दौड़ अड़ानी-अम्बानी के दरवाजे पर खत्म हो जाती है।

उन्होंने मुद्रा योजना का जिक्र किया। और अपनी सरकार को गरीबों के मत्थे ठोंक दिया, कि ‘‘अमीरों को देने वाली सरकारें आ कर चली गयी, यह सरकार गरीबों को देने आई है।‘‘ वो चाहते हैं, कि उन्होंने जो दिया है गरीबों को, उसे वो जानें और बदले में उन्हें भी कुछ दें। ऊपर वाले का दिया तो बहुत कुछ है, नीचे वाला भी कुछ दे।

हमें लगता है, ऐसी सरकार कहां मिलेगी, जो अपनी उपलब्धियों को हर साल गिनाये, आंख में अंगुली डाल कर दिखाये। दिखाये कि मोदी जी ने इन दो सालों में लगभग हर महीने ‘जन उपयोगी कार्यक्रम लाॅन्च‘ किया है।

देश के किसी भी सरकार के पास ऐसा रिकार्ड नहीं है।

मेक इन इण्डिया है।

स्टैण्ड अप इण्डिया है।

स्टार्ट अप इण्डिया है।

भारत में इण्डिया ही इण्डिया है।

अब ‘शटअप इण्डिया‘ आने को है। आ गया है। यदि ऐसा नहीं होता तो मोदी जी और मोदी सरकार की जय जयकार नहीं हो रही होती, लोग सवाल कर रहे होते। सरकार सवालों का जवाब दे रही होती।

लोग सवाल कर रहे होते कि 10 राज्यों में, सूखा प्रभावित क्षेत्रों में पानी कहां है? खाद्य सुरक्षा कहां है? लोगों के अच्छे दिन कहां हैं?

लोग सवाल कर रहे होते, कि किसानों और आदिवासियों को उनकी जमीनों से बेदखल क्यों किया जा रहा है? राष्ट्रीय-बहुराष्ट्रीय कम्पनियों से किये गये समझौतों की शर्तें क्या हैं?

लोग सवाल कर रहे होते, कि देश यदि बाजार है, तो इस बाजार में आपकी देशभक्ति किससे टिक कर खड़ी है? उनकी पहचान क्या है? देशद्रोहियों की शिनाख्त तो कर रहे हैं, मगर देश की प्राकृतिक सम्पदा उसके श्रम एवं बौद्धिक सम्पदा को सस्ते में बेचने वाली सरकार की पहचान क्या है? विश्व व्यापार संगठन, विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष तथा वित्तीय ताकतों से जुगलबंदी का सच क्या है? क्यों देश अमेरिका बन रहा है, और मोदी ओबामा बन रहे हैं? हथियार उत्पादन, हथियारों की खरीदी और युद्ध में शामिल होने का जुनून क्यों है?

क्यों छात्र आंदोलन और जेएनयू के मामले में मीडिया की जुबान बंद है? किसने ताले लटकाये हैं? क्यों कन्हैया कुमार ‘एम्स्‘ में जिंदगी और मौत के बीच पड़े हैं? क्यों छात्रों की जान खतरे में है? क्यों उनके भूख हड़ताल को क्रमिक हत्या का सबब बनाया जा रहा है? क्यों जेएनयू को मारने की कोशिश हो रही है? मीडिया उतनी बे-शर्म नहीं हो सकती जितनी बे-शर्म उसे आपने बना दिया है।

मोदी जी, तंज कसना और झूठ बोलना और मुस्कुराना बंद करें। देश भगवा पहनने के मूड़ में नहीं है। राजनीतिक एकाधिकार और तानाशाही की उम्र घट कर एक दशक भी नहीं रह गयी है, उसे वित्तीय तानाशाही के जाल में फंसाना देशद्रोह है।

यदि ‘शटअप इण्डिया‘ ही देश के लिये अघोषित कार्यक्रम है, तो अपनी ‘उपलब्धियों‘ को घर-घर पहुंचाने की योजना का कोई मतलब नहीं है, वह अपने आप ही पहुंच जायेगी और जिस दिन पहुंच जायेगी, आपको पता ही है, कि आपका क्या होगा? देश की जनता अभी धोखे में है, मगर वह संघ और वित्तीय ताकतों का सच जान जायेगी। लोकतंत्र सिर्फ चुनाव नहीं है।

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