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एक कदम पीछे हटना, पराजय नहीं

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जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्रों का जारी भूख हड़ताल यदि टूटता है, या उसका रूख बदलता है, तो इसका मतलब यह नहीं होगा कि छात्रों का आंदोलन टूट गया, मुद्दे खत्म हो गये। स्थितियां सामान्य हुई। संघ की सख्ती को सरकार ने लागू कर के बड़ी सफलता हासिल कर ली है।

कि अब किसी भी आंदोलन या जन संघर्ष को तोड़ने के लिये ‘खबरों का ब्लैकआउट‘ और वार्ताहीन उपेक्षा कारगर नीति है।

नहीं हुजूर, आप गलत हैं।

कठपुतली और बहरूपियों से,

सख्ती और उपेक्षा से और जन समस्याओं को बरगलाने से, सरकारें नहीं चलतीं।

जन समस्याओं को खूंटी पर टांग कर, उसकी ऊर्जा के खत्म होने का इंतजार करना गलत है। वो सूखती नहीं गहरा जाती हैं।

एक छद्म सरकार को भी लोगों को धोखे में रखने के लिये, समस्याओं को हल करने का स्वांग चलाते रहना पड़ता है। आपने तो अपनी नौटंकी ही बंद कर दी। यह प्रमाणित कर दिया कि आप देश की चुनी हुई सरकार नहीं, चुनावी तरीके से सत्ता पर काबिज फाॅसिस्ट हैं।

इसलिये, यह सोचने की जरूरत है, कि हम फाॅसिस्टों से कैसे लड़ें? जिसके पास ‘देश की चुनी हुई सरकार‘ का तिकड़मिया खिताब भी है? जिसके धोखे में देश की जनता है।

हम देश की आम जनता तक कैसे पहुंचें? कैसे उसे समझायें? फासीवाद और वित्तयी पूंजी की तानाशाही का व्यावहारिक अनुभव देश की आम जनता को नहीं है। भाजपा की सरकार आदिवासियों को माओवादी बता कर छत्तीसगढ़ में जो कर रही है, उसकी सही जानकारी आम जनता को नहीं है। सूखा और अकाल को वह प्राकृतिक आपदा बता लेती है। सरकार के पास झूठ का बड़ा खजाना है। संघ वह खदान है, जहां से झूठ की नयी खेप रोज निकलती है, और वित्तीय ताकतों की चालबाजियों का कोई अंत नहीं है। सदियों का अनुभव उनके पास है।

संघ, भाजपा और सरकार को किसी भी बात पर शर्म नहीं आयेगी। यह हम जानते हैं।

वैचारिक रूप से यह भी हम जानते हैं, कि मुद्दों की एकजुटता और जन एकजुटता जरूरी है। जरूरी है, आर्थिक, सामाजिक एवं राजनीतिक एकजुटता।

मगर, एकजुटता की दशा और दिशा उलझी हुई है।

यह कड़वी सच्चाई है, कि देश की वामपंथी ताकतें, राजनीतिक रूप से दलगत आधार पर कमजोर हैं।

यह कड़वी सच्चाई है, कि कांग्रेस के कंधों पर सवार हो कर ही नवउदारवादी वैश्वीकरण और वित्तीया ताकतें इस देश में आयी हैं। उसने ही बुरे दिन की शुरूआत की है, भले ही अच्छे दिन नहीं थे।

यह भी कड़वी सच्चाई है, कि संघ और भाजपा के राजनीतिक एकाधिकार और वित्तीय तानाशाही का मतलब देश के राजनीतिक दलों की समझ में आना अभी बाकी है। यह समझना अभी बाकी है, कि जिन ताकतों ने राजसत्ता पर अपनी पकड़ बना ली है, जिन्होंने देश के लोकतंत्र को कठपुतलियों और जोकरों के हवाले कर दिया है, वो अपनी पकड़ ढ़ीली नहीं करेंगे। उनके लिये तो भारत मुक्त व्यापार, खुला बाजार है, जहां अकूत प्राकृतिक सम्पदा है, मानव श्रम और बौद्धिक सम्पदा है।

जो सरकार अपने देश की प्राकृतिक, मानव श्रम और बाद्धिक सम्पदा की नीलामी कर रही है, वह सरकार उन्हें सुरक्षित नहीं रख सकती। शिक्षा भी उसके लिये बाजार की चीज है।

आज देश में जो भी हो रहा है, वह प्राकृतिक सम्पदा को बेचने, मानव श्रम सम्पदा को बेचने, और बौद्धिक सम्पदा को बेचने के करार और देश को बाजार बनाने के लिये हो रहा है। चाहे वह मजदूरों के अधिकारों पर हमला हो, चाहे वह किसान-आदिवासियों को उनकी जमीन से बे-दखल करने की ज्यादती हो, या छात्रों के संघर्षों के खिलाफ उन्हें ‘देशद्रोही‘ करार देने का मुद्दा हो। यहां तक कि मीडिया की खरीदी और खबरों पर लगाम लगाने की नीति की वजह भी यही है। लोगों को उत्पादन का साधन और उपभोक्ता की, बाजारवादी सोच में बदलने की तैयारियां चल रही हैं। सरकार की नजरें दिखावटी लोकतंत्र पर टिकी हुई हैं, जिसे बचाने के नाम पर मिटाने की साजिशें हैं। ऐसे में लोकतंत्र को बनाने और बचाने की लड़ाई आसान नहीं।

जेएनयू ने संघ, भाजपा और मोदी सरकार की सोच को आधारहीन प्रमाणित किया है।

उसने यह प्रमाणित किया है, कि शेहला राशिद, उमर खालिद, फैयाज़ अहमद और ऐसे छात्र इस्लामी नहीं हैं।

कन्हैया कुमार, रामा नागा, अनिर्बान भट्टाचार्य और उनके जैसे छात्र हिंदूवादी नहीं, ना ही रोहित वेमुला सिर्फ दलित है।

(ऐसी जुबान में बात करने की बेहूदगी के लिये क्षमा चाहता हूं।)

आपने प्रमाणित कर दिया है, कि फाॅसिस्ट एवं साम्राज्यवादी ताकतों के विरूद्ध लोकतांत्रिक एवं जनवादी ताकतों की एकजुटता ही सही विकल्प है।

कि जेएनयू सिर्फ जेएनयू नहीं, ना ही विश्वविद्यालयों और छात्रों का मुद्दा सिर्फ उनका मुद्दा है, बल्कि यह समाजवाद और लोकतंत्र की लड़ाई है। देश की संघर्षशील आम जनता ने जेएनयू का समर्थन किया है।

आपकी ईमानदारी शक के दायरे से बाहर है।

आपके जांबाज होने पर हमें शक नहीं। आपकी सोच और समझ को सम्मान मिला है। ‘‘काॅमरेड‘‘, ‘‘लाल सलाम‘‘ और ‘‘इंकलाब जिन्दाबाद‘‘ को एक बार फिर सम्मानित जगह मिली है।

ऐसी सोच और समझ रखने वालों की हमें फिक्र है। आपको यह स्वीकार करना चाहिये कि हत्यारों के खिलाफ जीने की लड़ाई भी हमें ही लड़नी है। इसलिये अपनी जिंदगी की पकड़ ढ़ीली करने का हमें कोई अधिकार नहीं है।

इसका यह मतलब नहीं है, कि ‘‘मैं अपनी खाल की फिक्र करने और कांख दबा कर लड़ने की सलाह दे रहा हूं।‘‘

नहीं! यह गलत है। हमें आपकी, संघर्षों की और आने वाले कल की बनती उम्मीदों की फिक्र है।

हमारी तादाद कम है, भले ही समाज के बहुसंख्यक वर्ग के हम सदस्य हैं। उस वर्ग के सदस्य हैं, जिसे धोखे में रखा जा रहा है। जिसमें वर्गगत सामाजिक एवं राजनीति चेतना का अभाव है। उसे इस बात की खबर नहीं है, कि राजसत्ता ने उसे अपने ही खिलाफ रचे साजिशों में शामिल कर लिया है।

गांधी के हत्यारे, गांधी के पक्षधर बन रहे हैं।

संविधान को जलाने वाले डाॅ0 अम्बेडकर के खैरख्वाह बन रहे हैं।

सरदार पटेल को लोहे में ढ़ाल कर समाज को तोड़ने वाले, देश की अखण्ड़ता का प्रतीक बना रहे हैं।

वे सुभाषचंद्र बोस को ऐसा देशभक्त बना रहे हैं, जिनके लिये आजाद हिंद फौज ‘निजी सेना‘ थी। वे संघ की फाॅसिस्ट सेना के लिये तर्क रच रहे हैं। सुभाषचंद को फाॅसिस्टों की जमात में शामिल कर, अपने फासीवाद को देशभक्ति का जामा पहना रहे हैं।

भगत सिंह और उनके साथियों की शहादत को, उनकी सोच से काटने की कोशिश कर रहे हैं।

जिनके पास विश्वासघात, देशद्रोह और जनविरोध है, जो वैश्विक वित्तीय ताकतों और राष्ट्रीय पूंजीपतियों का जुआ देश और समाज पर रख रहे हैं, उनके लिये जेएनयू का होना एक बड़ा खतरा है, वो किसी भी कीमत पर अपने खिलाफ बढ़ते जन विरोध को कुचलना चाहते हैं, लेकिन हम ऐसा नहीं चाहते, हम ऐसा होने नहीं देंगे।  हमें रक्तबीज बनने की लड़ाई भी लड़नी होगी। यह समझना होगा कि यदि रोहित वेमुला को जेएनयू का साथ नहीं मिला होता तो, उनकी साजिशें कामयाब थीं।

हमें मुद्दों को मारने की राजनीति के खिलाफ खड़ा होना होगा।

हमें यह मानना होगा, कि आज देश और समाज को, समाज के शोषित वर्ग को जिंदा भगत सिंह की जरूरत है।

आपके भूख हड़ताल ने एक मुकाम हासिल कर लिया है। जहां तक आपकी बात पहुंची है, वहां तक लोगों ने आपके पक्ष में खड़ा होना कुबूल किया है। इसलिये, बढ़े हुए कदम को पीछे हटाना, पराजय नहीं। संघर्ष की ताकत को समेटना है। जेएनयू परिसर की एकजुटता को जेएनयू के बाहर की एकजुटता में बदलना है, जिसकी शुरूआत हो गयी है। हमारे सामने मुद्दों की एकजुटता और एकजुट संघर्ष के अलावा और कोई हथियार और कोई विकल्प नहीं है।

‘‘एक कदम आगे, दो कदम पीछे‘‘ लेनिन ने ही कहा है। उसे मौजूदा संदर्भों से जोड़ना है।

-आलोकवर्द्धन

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