Home / राष्ट्रीय परिदृश्य / भारतीय जनतंत्र पर बाजार का बढ़ता खतरा

भारतीय जनतंत्र पर बाजार का बढ़ता खतरा

congress irked by goldman sachs report on modi_0_0_0_0_0_0जनतंत्र में जन आकांक्षाओं को पूरा करने से ज्यादा उन्हें अपने पक्ष में खड़ा करने की राजनीतिक कवायतों को आम चुनाव का आधार मान लिया गया है। यही कारण है, कि जन समस्यायें खड़ी की खड़ी रह जाती हैं, और राजनीतिक दल वायदों से काम चलाते रहते हैं। ऐसे प्रचार अभियान चलाते हैं, कि आम जनता भुलावे में आ जाये। यह भुलावा भारत में दशकों से चल रहा है। आज भी कोशिशें कुछ ऐसी ही हो रही हैं।

पहले आम जनता धोखा खाती थी, मगर अब धोखे से बचने का उसके सामने कोर्इ विकल्प ही नहीं है। इसलिये कह सकते हैं, कि धोखाधड़ी अब खुलेआम है। आम जनता जिस सीढ़ी पर खड़ी है, उससे कर्इ सीढ़ी ऊपर वो लोग खड़े हैं, जो वास्तव में सरकार बनाते हैं, राजनीतिक दल उन्हीं के हितों की ऐसी जुबान हैं, जिसमें आम जनता का हित नजर आता है।

सरकार गोल्डमैन के सर्वेक्षण से नाराज है। जिसमें कहा गया है कि ”बाजार को मोदी के नेतृत्व में सत्ता परिवर्तन की उम्मीद है।” आगे कहा गया है कि ”निवेशक इसे ले कर आशानिवत हैं, जिससे अगली दो तिमाही के दौरान बाजार में अच्छा माहौल बन सकता है।”

बाजार और निवेशकों का हाथ से निकलने की रिपोर्ट और उनका नरेंद्र मोदी की ओर देखना, सरकार और कांग्रेस की बड़ी परेशानी है। वाणिज्य और उधोग मंत्री आनंद शर्मा ने कड़ी आपतित जाहिर की है। ‘ग्लोबल इन्वेस्टमेण्ट बैंक’ की 5 नवम्बर की आयी रिपोर्ट पर नाराजगी जाहिर करते हुए ‘फिक्की’ के एक कार्यक्रम के दौरान आनंद शर्मा ने कहा कि ”गोल्डमैन साक्स की रिपोर्ट लोकतंत्र और 80 करोड़ भारतीय मतदाताओं का अपमान है।” उन्होंने बैंक की ओर संकेत करते हुए सवाल किया कि ”क्या आप भारत के मतदाताओं को बतायेंगे कि वे क्या फैसला करने जा रहे हैं?”

सुनने में यह बात चाहे जितनी बुरी लगे वाणिज्य एवं उधोग मंत्री जी, मगर सच यही है। देश की गिरेबां तक पहुंचे इन हाथों के मददगार देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और उनकी टीम रही है। वर्तमान वित्त मंत्री पी0 चिदम्बरम, पूर्व वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी और योजना आयोग के मोन्टेक सिंह अहुलवालिया जैसे लोगों ने कड़ी मेहनत की है। आपकी नाराजगी बड़ी जायज है, कि सबकुछ किया तो आप लोगों ने मगर अब बाजारवादी ताकतें नरेंद्र मोदी को सपोर्ट कर रही है। भाजपा के प्रत्याशी को प्रधानमंत्री बनाना चाहती है। आप इस बाता को अच्छी तरह जातने हैं, कि ”गोल्डमैन’ की रिपोर्ट आपके लिये कितना बड़ा खतरा है। और अब तो ‘टाइम्स’ भी नरेंद्र मोदी के पक्ष में खड़ा नजर आ रहा है।

ऐसा नहीं है, कि जिन्होंने बाजार को खतरा बनाया, वो बाजार के खतरों को नहीं जानते। वो जानते हैं, और अच्छी तरह जानते हैं। इन ताकतों ने किसी भी देश की सरकार को गिराने या बनाने की ताकत हासिल कर ली है। भारत का वास्ता अभी इन ताकतों की शराफत से पड़ा है, और वो उसके संवैधानिक ढांचे में राजनीतिक प्रक्रिया के तहत सरकारों को निर्णायक ढंग से प्रभावित कर रही है। 2014 के आम चुनाव के पास देश की आम जनता को कुछ भी अच्छा देने को नहीं है, जो है, उससे बुरा ही उनके हाथ कुछ लगेगा। क्योंकि बाजारवादी शकितयां अब एक कदम और आगे बढ़ आयी हैं। पहले वो बनी हुर्इ सरकारों से अपना काम चला लेती थीं, मगर अब वो राजनीति के दूसरे दुकानों से भी सौदा करने लगी हैं। यही कारण है कि नरेंद्र मोदी के भाजपा के दुकान पर भीड़ बढ़ रही है।

राष्ट्रीय औधोगिक घरानों के लिये नरेंद्र मोदी कुछ ज्यादा ही अनुकूल नजर आ रहे हैं, जिन्होंने ‘मिशन 2014’ के जरिये राज्य की सरकार को बिचौलिया बनाने के प्रस्ताव को पेश कर दिया। यह बात उन्होंने बड़े ही सुनियोजित ढंग से उनके सामने रखी है, कि निजीकरण ही उनके आर्थिक विकास की दिशा है, और मनमोहन सिंह ने जिस उदारीकरण की शुरूआत की है, भाजपा उसी उदारीकरण को और भी प्रभावशाली बनायेगी। उन्होंने विकास के उस माड़ल को पेश किया है, जिसका लक्ष्य वित्तीय पूंजी को खुली छूट देना है। आम जनता जिसमें श्रमशकित का स्थायी स्त्रोत है। ऐसा उत्पादक और उपभोक्ता है, जिसका उत्पादन के साधन पर कोर्इ अधिकार नहीं होता।

राज्य के प्राकृतिक संसाधन पर अधिकार जमाना और उसकी वित्तव्यवस्था पर नियंत्रण कायम करना ही विश्व बाजारवादियों की नीतियां हैं। अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय इकार्इयां और बहुराष्ट्रीय कम्पनियां उत्पादन के साधन पर निजी स्वामित्व की पक्षधर रही हैं। मनमोहन सिंह का उदारीकरण सार्वजनिक क्षेत्रों के स्थान पर निजी क्षेत्रों की वरियता का सिद्धांत है। उसने मिश्रित अर्थव्यवस्था की सोच बदल दी है। बिना किसी संवैधानिक एवं वैधानिक प्रक्रिया के जिस तरह राष्ट्रीय करण की ओट में खनिज, संचार, औधोगिक इकार्इ, वित्तीय क्षेत्रों और बैंकों में निजी पूंजी निवेश को बढ़ावा दिया गया, आज वो आर्थिक एवं राजनीतिक भ्रष्टाचार के दायरे में है। मनमोहन सरकार की परेशानियां हैं। सी0बी0आर्इ0 के वैधानिक-अवैधानिक होने का आधार और फजीहत है।

देश का उधोग जगत कुमार मंगलम बिड़ला के खिलाफ दायर सी0बी0आर्इ0 के आरोप पत्र के खिलाफ है। एफआर्इआर ने उसकी नाराजगी बढ़ा दी है। उधोग जगत घपले और घोटालों को राजनीति के दायरे में रखना चाहती है, वह नहीं चाहती कि उसकी परछार्इ भी उस पर पड़े। वह ऐसी सरकार चाहती है, जो उसे वैधानिक आधार दे और विवादों के दायरे से उसे बाहर रख उसका समाधान करे। इस नजरिये से मनमोहन सरकार नाकाम रही है। 2-जी स्पेक्ट्रम से लेकर कोल ब्लाक आबंटन तक की परछार्इयां राष्ट्रीय उधोगपतियों पर पड़ रही है, और एफडीआर्इ के मामले में वालमार्ट के द्वारा कमीशन और रिश्वत का मामला चर्चा में रहा है।

राष्ट्रीय-बहुराष्ट्रीय कम्पनियां और अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय इकार्इयां यह मानती हैं, कि पूंजी निवेश के लिये सुधार की जरूरत है।

मनमोहन सरकार का घपलों और घोटालों में फंस जाना, या अब तक की सबसे भ्रष्टतम सरकार का तमगा हासिल करना, कोर्इ बड़ी बात नहीं है, बड़ी बात यह है कि सरकार औधोगिक घरानों को, उसकी सम्बद्धता से बचाने में नाकाम रही है।

भारत में अंतर्राष्ट्रीय कारपोरेट जगत ऐसी सरकार चाह रही है, जो उसके आर्थिक एवं सामरिक निर्देशों का पालन करे।

गोल्डमैन साक्स के रिपोर्ट पर यदि नजरें टिकायें और घट रही घटनाओं को नजदीक से देखें तो लगभग यह बात पक्की हो गयी है, कि कांग्रेस के लिये जो खतरा है, भाजपा के लिये वही संभावनायें हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा भाजपा के नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने को अमेरिकी हितों के लिये अच्छा बताया और कहा- ”यह भारत का अपना मामला है, मगर अमेरिकी सरकार को भारत के किसी भी सरकार के साथ सहयोग बढ़ाने में कोर्इ आपतित नहीं है।” बि्रटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने भी परोक्ष रूप से मोदी का समर्थन किया और समय आने पर मुलाकात करने को अपनी मंजूरी दी।

नरेंद्र मोदी ने अपने अघोषित चुनाव अभियान की शुरूआत भारत में नहीं बलिक अमेरिका और बि्रटेन में शुरू किया। उन्होंने इंटरनेट और विडियो कांफ्रेनिसंग से अपनी बातें की। भारतीय मूल के लोगों को अपनी ओर आकर्षित किया। यही नहीं उन्होंने भारत और अमेरिका के लिये अप्रवासी भारतीयों को महत्वपूर्ण प्रमाणित किया। इसी बहाने उन्हाेंने दोनों देशों के विकास की दिशा को एकरूप बनाने की ऐसी कोशिश की जिससे उनकी विश्वसनियता बढ़ी। अमेरिकी सरकार चीन से बढ़ती, आर्थिक प्रतिस्पद्र्धा, रूस से मिले कूटनीतिक पराजय और दुनिया में बन रहे मुक्त बाजार के नये क्षेत्र तथा वैशिवक धु्रवीकरण से परेशान है। केंद्र की मनमोहन सरकार विश्व राजनीति में अपनी पाली को नहीं बढ़ा रही है। जो अमेरिकी हितों से मेल नहीं खाती। जबकि चीन भाजपा के लिये अछूत है और पूर्व सोवियत संघ की तरह रूस अस्पृश्य है। अघोषित रूप से उसकी प्रतिबद्धता अमेरिका और यूरोपीय संघ से है। उनकी नीतियों के पक्ष में है। इन ताकतों के पास इस बात के ठोस आधार हैं, कि मनमोहन सिंह ने जिसकी शुरूआत की है, नरेंद्र मोदी उसे खुली छूट दे सकते हैं।

इस तरह भारत के प्रमुख दो राजनीतिक दल और उनकी गठबंधन का नजरिया देश और देशवासियों से ज्यादा आर्थिक विकास के लिये समाजविरोधी है। उन ताकतों के हित में है, जो देश पर अपनी सरकार चाहती है। सरकार बनाने और सरकार चलाने की ऐसी प्रतिस्पद्र्धा चल रही है, जिसका लाभ साम्राज्यवादी ताकतों को मिलना तय है। इसलिये, चाहे हम जितना भी इसे देश का अंदरूनी मामला प्रचारित करें, सच यह है कि आम चुनाव अब अंतर्राष्ट्रीय अखाड़ा बनता जा रहा है, और आम जनता के हितों को निचली सीढ़ी पर खड़ा किया जा चुका है। यह सोचना अब पूरी तरह सही नहीं है, कि भारतीय जनतंत्र की निर्णायक शकित देश की आम जनता है।

हमारे सामने अब खतरा सिर्फ यह नहीं है, कि आम चुनावों को प्रभावित करने वाली शकितयों का प्रभाव क्षेत्र बढ़ गया है, और वो निर्णायक हो गयी है, बलिक खतरा इस बात का भी बढ़ गया है, कि इन ताकतों की शराफत तब तक ही वैधानिक बनी रहेगी, जब तक उनका हित चुनी हुर्इ सरकारों से सधता रहेगा। जिसके लिये उन्होंने ऐसी परिसिथतियाें की रचना कर दी है, कि सरकार चाहे कांग्रेस की हो या भाजपा की, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह हों या नरेंद्र मोदी या कोर्इ और कोर्इ फर्क नहीं पड़ेगा। लेकिन जिस दिन चुनी हुर्इ सरकारें वास्तविक होना चाहेंगी, इनके वैधानिक तरीकों से सरकार बनाते रहने का भरम टूट जायेगा।

देश को उन वित्तीय ताकतों की गिरफ्त में डाल दिया गया है, जिनके लिये जनआकांक्षा और जनहित का कोर्इ महत्व नहीं है। वो मुनाफा के लिये सरकार बनाते और बिगाड़ते हैं। गोल्डमैन रिपोर्ट से सरकार की नाराजगी सिर्फ इस वजह से है, कि वह उसके पक्ष में नहीं है। भाजपा खुश हो सकती है, कि नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने का दावं चल गया है, मगर देश की आम जनता के लिये यह कोर्इ खास खुशी की बात नहीं है, क्योंकि भारतीय जनतंत्र वित्तीय तानाशाही की ओर बढ़ चुका है। अब राष्ट्रवादी ताकतों का रिश्ता बाजारवादी ताकतों से मजबूत होना तय है। वैसे भी राष्ट्रवाद आधुनिक पूंजीवाद का ऐसा हथियार है, जिससे आम जनता को धोखा देना आसान होता है।

Print Friendly

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

Select language:
Hindi
English
Scroll To Top