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समाजवाद के वापसी का मुद्दा – 3

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रूस की आम जनता सोवियत संघ और समाजवाद की ओर लौटना चाहती है। जिसका सीधा सा मतलब है, कि वह सिर्फ लेनिनग्राद की वापसी नहीं चाहती, उसे लेनिनवाद भी चाहिये। लेवाडा सेंण्टर द्वारा कराये गये सर्वेक्षण की रिपोर्ट यही है। जिसका उल्लेख हमने पहले किया। अब हमारे सामने संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोपीय संघ है।

हाॅवर्ड यूनिवरसिटी के द्वारा हाल ही में कराये गये सर्वेक्षण के अनुसार अमेरिका के ज्यादातर युवाओं ने पूंजीवादी व्यवस्था को खारिज कर दिया है। सर्वेक्षण में हिस्सा लेने वाले 18 से 29 साल के बीच के 51 प्रतिशत युवाओं ने अमेरिका के पूंजीवादी व्यवस्था के विरोध में अपनी राय दी। 42 प्रतिशत लोगों ने पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के पक्ष में अपनी राय दी। 33 प्रतिशत लोगों ने समाजवाद के पक्ष में मत दिया।

इस प्रकार सर्वेक्षण सभी उम्र के लोगों के बीच कराया गया। अमेरिका के 50 साल से ऊपर के लोगों ने पूंजीवाद का समर्थन किया, किंतु उनके समर्थन में अनिश्चयता भी है। पूंजीवादी समाज व्यवस्था के पक्षधर होने के बाद भी वो उसके सही होने के प्रति आश्वस्त नहीं हैं। उनकी यह अनिश्चयता या पूंजीवाद के प्रति उनकी यह प्रतिबद्धता अपने आप में इस बात का प्रमाण है, कि पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के बार-बार संकटग्रस्त होने की वजह से वो सवालों से घिर गये हैं। समाजवाद उनके लिये दशकों से फैलाया गया, ऐसा डर है, जिसे वो नहीं जानते।

सोवियत संघ के उदय के साथ ही अमेरिकी सरकार और साम्राज्यवाद के समर्थकों ने इस बात का भरपूर प्रचार किया, कि ‘‘समाजवाद अमेरिकी साम्रज्य और उसके वैश्विक वर्चस्व के लिये सबसे बढ़ा खतरा है।‘‘ समाजवाद का विरोध उनकी सोच, उनकी समझ में बैठाया गया। इसके बाद भी हाॅवर्ड विश्वविद्यालय द्वारा कराये गये सर्वे में यह कहा गया है, कि ‘‘आम अमेरिकी युवा वर्ग में पूंजीवाद के प्रति विश्वास में कमी आयी है, वह हताश हुआ है।‘‘

साल 2011 में ‘पीयू रिसर्च सेण्टर‘ ने पाया था, कि ‘‘अमेरिका के लगभग आधे लोग ‘मुक्त व्यापार व्यवस्था‘ के प्रति निराश हैं।‘‘ उनकी यह निराशा और बढ़ी है।

‘हाॅवर्ड‘ के इस सर्वे से एक बात और साफ हुई है, कि अमेरिका के सिर्फ 27 प्रतिशत लोगों का कहना है, कि ‘‘सरकार को अर्थव्यवस्था के संचालन (नियमन) में बड़ी भूमिका अदा करनी चाहिये।‘‘ यह सोचने का आधार बनता है कि, उन्होंने राज्य के नियंत्रण से बाहर हुए पूंजी का विरोध किया। देश की अर्थव्यवस्था पर राज्य की सरकारों के खोये हुए नियंत्रण का विरोध किया। इसके बाद भी यह सच है कि यह समाज का छोटा प्रतिशत है, और आम अमेरिकी की समाजवादी समझदारी के बारे में हम यकीन के साथ नहीं कह सकते। क्योंकि मात्र 30 प्रतिशत लोगों का मानना है, कि ‘‘सरकार को आय में आयी असमानता को कम करने के लिये बड़ी भूमिका अदा करनी चाहिये।‘‘

लेकिन सरकारें चाह कर भी ऐसी कोई बड़ी भूमिका अदा करने की स्थिति में नहीं हैं। व्हाईट हाउस और अमेरिकी कांग्रेस भले ही संयुक्त राज्य के राजनीतिक केंद्र है, जहां उनका राष्ट्रपति और लोक एवं राज्यों के प्रतिनिधि बैठते हैं, किंतु कांग्रेस दलालों का अड्डा बन गया है जहां डाॅलर ले कर सवाल पूछे जाते हैं, और अमेरिकी काॅरपोरेट के हितों की ‘कैम्पेनिंग‘ की जाती है। अमेरिकी राष्ट्रपति की वास्तविक औकात फेडरल रिजर्व के गर्वनर से काफी कम है। अमेरिकी राजसत्ता का वास्तविक केंद्र ‘वाॅल स्ट्रीट‘ बन गया है। जिसके नियंत्रण में फेडरल रिजर्व और अमेरिका के सबसे बड़े बैंक एवं वित्तीय इकाईयां हैं।

सच यह है, कि अमेरिकी साम्राज्य के केंद्र में व्हाईट हाउस या कांग्रेस नहीं, बल्कि अमेरिकी डाॅलर और अमेेरिकी अर्थव्यवस्था को अपने गिरफ्त में ले चुकी निजी कम्पनियां और दैत्याकार काॅरपोरेट है। जिनके हितों के लिये अमेरिकी सेना से लेकर खुफिया तंत्र तक काम करती है। अमेरिकी लोकतंत्र वित्तीय पूंजी की तानाशाही में बदल गया है। वह दुनिया की सबसे बौनी सरकार है। जिस डाॅलर के दम पर अमेरिकी साम्राज्य टिका हुआ है, वह डाॅलर भी उसके नियंत्रण में नहीं है। सही अर्थों में अमेरिकी सरकार और अमेरिकी लोकतंत्र का अपहरण हो चुका है। आर्थिक रूप से वह दीवालिया है। उसके नियंत्रण में कुछ भी नहीं है। अमेरिकी साम्राज्य और उसकी पूंजीवादी व्यवस्था अपनी समस्याओं को हल करने की क्षमता खो चुकी है।

हाॅवर्ड विश्वविद्यालय के द्वारा कराये गये सर्वेक्षण के बारे में जब गाॅलअप के ‘एडिटर इन चीफ‘ फ्रैंक न्यूपोर्ट से, जारी किये गये सर्वे रिपोर्ट के बारे में पूछा गया, तब उन्होंने ‘वाॅशिंगटन पोस्ट‘ से कहा- ‘‘हो सकता है, कि देश के युुवा यह कह रहे हों कि पूंजीवादी व्यवस्था के अंर्तविरोधों से उन्हें समस्या है। मैं निश्चित रूप से नहीं जानता कि उनके दिमाग में क्या चल रहा है।‘‘

हालांकि ‘‘आॅकोपायी वाॅलस्ट्रीट मोमेंट‘‘ से ही यह स्पष्ट हो गया है, कि आम अमेरिकी क्या चाहता है?

वह साम्राज्यवादी युद्ध और आतंक से ऊब चुका है।

बढ़ती हुई बेरोजगारी, घटते हुए आय, गिरता हुआ जीवन स्तर और सरकारी सुविधाओं में हो रही कटौतियों के खिलाफ है।

एनएसए प्रोग्राम हो या अपने ही देश के नागरिकों की निगरानी हो, वह अमेरिकी सरकार की नीतियों से नाराज है।

आर्थिक अनिश्चयता, सामाजिक असमानता और लोकतंत्र में सुधार की खोयी हुई उम्मीदों ने उसे हताश कर दिया है।

वह सरकार और अपने ऊपर बढ़ते कर्ज के बोझ और दीवालियापन से असंतुष्ट है।

उसकी नाराजगी के सैंकड़ों ऐसे कारण हैं, जिसका समाधान पूंजीवादी अमेरिकी लोकतंत्र में नहीं है। वह एक ऐसी वैकल्पिक व्यवस्था चाहता है, जिसमें उसकी समस्याओं का समाधान हो।

अमेरिकी सरकार खुद इस बात को समझने में नाकाम है, कि जन समस्याओं का समाधान क्या है?

यही कारण है, कि बढ़ती हुई नाकामी और ना उम्मीदी के बीच अमेरिका में समाजवाद की संभावनायें बढ़ रही हैं। कम-ओ-बेश यही स्थिति यूरोपीय संघ के प्रमुख सदस्य देशों की है।

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इंटरनेट पर आधारित मार्केट रिसर्च फर्म- यूगोव द्वारा फरवरी में कराये गये ‘पोल‘ के अनुसार जर्मनी में समाजवाद के पक्ष में 45 प्रतिशत लोगों ने मत दिया और विरोध में मात्र 26 प्रतिशत लोगों ने मत डाले। जबकि पूंजीवाद के पक्ष में 26 प्रतिशत लोगों ने अपनी राय दी और 47 प्रतिशत लोगों ने विरोध में मत डाले।

ब्रिटेन में समाजवाद के पक्ष में 36 प्रतिशत और विरोध में 32 प्रतिशत लोग हैं। जबकि पूंजीवाद के पक्ष में 33 प्रतिशत और विरोध में 39 प्रतिशत लोग हैं।

रूस, अमेरिका और यूरोपीय संघ के सदस्य देशों में समाजवाद की जैसी संभावनायें नजर आ रही हैं, वह महत्वपूर्ण है, किंतु तीसरी दुनिया के देशों में बनती संभावनायें हमारे लिये ज्यादा महत्व रखती हैं। जहां माक्र्सवाद की संभावनायें बन रही हैं। ये तमाम संभावनायें साम्राज्यवादी हमलों और नव उदारवादी वैश्वीकरण की बाजारवादी सोच के खिलाफ बन रही है।

हम इस बात को अच्छी तरह जानते हैं, कि समाजवाद की वापसी आसान नहीं है, क्योंकि समाज के विकास की स्वाभाविक राहों को वित्तीय ताकतों ने रोक दिया है। युद्ध, आतंक, आर्थिक हमलों के अलावा सैनिक एवं वैधानिक तख्तापलट को अपना हथियार बना लिया है। उन्होंने विकास के जरिये 21वीं सदी के समाजवाद को न सिर्फ लातिनी अमेरिकी महाद्वीप में रोकने की पहल की है, बल्कि समाजवादी सरकारों के खिलाफ आर्थिक हमले और राजनीतिक अस्थिरता पैदा करने का अभियान भी चला रखा है।

विकास के जरिये समाजवाद खतरे में है।

इस्लामी आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई का मकसद भी एशिया एवं अफ्रीका में नवउदारवादी वैश्वीकरण, मुक्त व्यापार और बाजारवादी अर्थव्यवस्था के विरूद्ध बढ़ती हुई समाजवादी जन चेतना को रोकना है। इसके बाद भी सच यह है, कि पूंजीवाद के पास अपनी समस्याआंे का कोई समाधान नहीं है, उसकी साम्राज्यवादी वैश्विक संरचना टूट रही है, और समाजवाद के पक्ष में विश्व जनमत है। यहां तक कि विश्व समुदाय भी पूंजीवादी साम्राजयवाद से छुटकारा पाना चाहता है।

-आलोकवर्द्धन, अनुकृति

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