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भूख हड़ताल का सोलहवां दिन…

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जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय

15 दिन से जारी छात्रों का भूख हड़ताल सोलहवें दिन, दिल्ली उच्च न्यायालय का ‘स्थगन आदेश‘ आने के बाद, ‘समाप्त‘ हुआ। कुछ लोगों की नजरों में यह ‘टूट‘ गया।

‘समाप्त‘ होने और ‘टूटने‘ के बीच जेएनयू एकेडमिक कांउन्सिल की मीटिंग, वीसी का मीटिंग छोड़ कर भागना, ओबीसी छात्रों की नाराजगी, आंदोलन के विभाजित होने का खतरा और एबीवीपी के पीछे खड़े लोगों की शातीर हरकतें हैं। जो संविधान और देशभक्ति को ढ़ोल-नगाड़े सा बजाते हैं, और यह भी कह रहे हैं, कि ‘‘यदि अदालत से ही न्याय लेना था, तो भूख हड़ताल का नौटंकी क्यों?‘‘ जो यह भूल रहे हैं, कि-

  • हाई लेवल इन्क्वायरी कमिटी की रिपोर्ट के खिलाफ उन्होंने पहले ‘नौटंकी‘ की शुरूआत की थी।
  • जो जुम्मा-जुम्मा 8 दिन भी नहीं टिके और सौरभ शर्मा 10 हजार का फाईन जमा कर अपनी खाल बचाने के साथ, अपनी मांग मनवाने का दावा भी किये।
  • जिन्होंने ओबीसी छात्रों को भड़का कर कि ‘‘उनकी मांगों की उपेक्षा हो रही है‘‘, आंदोलन को विभाजित करने में लगे रहे वो कह रहे हैं, कि भूख हड़ताल टूट गया।

क्या जेएनयू छात्रसंघ ने देश के संविधान और न्यायालयों को ना मानने की बातें की थीं?

क्या देशद्रोह के घटिया आरोपों के खिलाफ न्यायालयों ने ही उन्हें राहत नहीं दी थी?

क्या न्यायालयों में हक की लड़ाई लड़ना और जेएनयू प्रशासन और देश की सरकार के खिलाफ खड़ा होना, गलत है?

क्या भूख हड़ताल असंवैधानिक है? यदि नहीं, तो भगोड़े वीसी, विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता के खिलाफ खड़ी सरकार के खिलाफ खड़े होने और लड़ने की लड़ाई गलत कैसे है?

क्या न्यायालय के आदेशों की अवहेलना न करना, गलत है? नहीं, तो फिर, यह हंगामा क्यों है?

न्यायालय ने छात्रों की मांगों के तहत वीसी को वार्ता के निर्देश दिये हैं और छात्रों से भूख हड़ताल समाप्त करने का आग्रह किया है।

बाहर की गंदी राजनीति को विश्वविद्यालय परिसर में घुसा दिया गया।

संविधान और न्यायालयों को न मानने की सलाह दी जा रही है। मानने पर हड़ताल टूट गया, और न मानने पर ‘देशद्रोह‘ का आरोप तो है ही।

जनाब! अपने पांव के नीचे की जमीन को देखें, जहां खून, मांस, मवाद के कीचड़ हैं। कीचड़ में कभी कमल खिलता होगा, मगर अब कम या तो झुण्डों में है, या बुद्धि के सड़े हुए कीचड़ में लिथड़ा हुआ है। बहरहाल, वह जो भी है, वह राष्ट्रीय पुष्प कमल नहीं है। वह पूराणें की कथा भी नहीं है, जहां विष्णु की नाभी से निकले कमल पर ब्रम्हा विराजमान हैं, वहां एक ऐसा दढ़ियल अवतरित हो गया है, जो अपनी दाढ़ी रोज कतरता है।

जेएनयू छात्र आंदोलन के ऊपर जरूरत से ज्यादा बड़ी जिम्मेदारियां लाद दी गयी हैं। उसने जरूरत से बड़ी अपेक्षाओं को जन्म भी दिया है। उसने जनविरोधी और लोकतंत्र विरोधी सरकार के खिलाफ खड़े होने और लड़ने की खुली पेशकश की है।

हम यह कहने के लायक हैं, कि ‘देशद्रोह‘ के गलत आरोपों के खिलाफ यदि न्यायालय वैधानिक विकल्प है, तो छात्र विरोधी जेएनयू हाई लेवल इन्क्वायरी कमिटी के निर्णयों के खिलाफ संघर्ष और न्यायालायों का विकल्प, गलत नहीं है।

इसके बाद भी भूख हड़ताल का सोलहवां दिन -जिस दिन भूख हड़ताल ‘समाप्त‘ हुआ या ‘टूटा‘, उसके सामने एकजुटता का सवाल खड़ा कर चुका है। क्या यह बाहरी हमला और भितरघात है?    हमले और सेंधमारी के खिलाफ भी खड़ा होना ही होगा। इस तर्क को सही मुकाम तक पहुंचाना होगा, कि अलग-अलग लड़ाईयां लड़कर हम जीत नहीं सकते, शोषितों की जमात एक है।

-आलोकवर्द्धन

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