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पुस्तक समीक्षा : आदमी और आदमियत के सवालों से जूझती कविताएँ

13124508_10201644338148384_2651585380974881260_nदेश के प्रमुख चित्रकार-कवि कुंवर रवीन्द्र सिंह या के. रवीन्द्र की कविताएँ ‘रंग जो छूट गया था’* के रूप में आई हैं. छोटी-छोटी कविताओं में कवि आदमियत को बचाए रखने के लिए चिंतित नजर आते हैं. ये आदमी निस्संदेह पंक्ति का आखिरी आदमी ही है जिसकी जिजीविषा और जीवन-संघर्ष को बड़ी बेचैनी से कवि महसूस करता है.

ये आदमी रंगों में, आकृतियों में और संविधान के पन्नों में से छिटक कर बाहर निकल जाता है जिसकी बेहतरी के लिए तमाम योजनायें हैं और ज्ञान के तमाम स्रोत जिस आदमी के उत्थान के लिए व्यग्र दिखलाई देते हैं, तो क्या ये सारी चिंताएं खोखली व्याख्याओं के ताने-बाने में उलझ कर रह गई हैं?

के. रवीन्द्र की चिंता है कि—‘सब कुछ देखता हूँ/ एक ही बिम्ब में / ऊँट और पहाड़ / समुद्र और तालाब को / मगर आदमी मेरे बिम्ब से बाहर छिटक जाता है..!’

इसी बिम्ब से छिटके आदमी को खोजती रहती हैं चित्रकार-कवि की निगाहें, क्योंकि—‘शायद इसीलिए छिटक जाता है वह/ क्योंकि सब कुछ है आदमी में / बस आदमी में आदमी नहीं है/ शायद/ इसीलिए आदमी का कोई बिम्ब नहीं बनता.’

इस आदमी को कवि एक कैलेंडर की तरह मानता है जिसमे आदमी की नियति के बारे में कोई जानकारी नहीं मिलती है. ये आदमी अस्तित्वहीन होकर बन जाता है एक मजदूर जो सिर्फ हुक्म सुनने का अभ्यस्त होता है.

चित्रकार चित्र बनाता है और बेचैन होकर कविता लिखना चाहता है लेकिन उसे याद हो आते हैं—‘लम्बी चौड़ी सड़कें बनाते / मजदूरों के हाथ के फफोलों को / पढ़ता हूँ/ हवेलियों के लिए/ चार जून की रोटी की व्यवस्था में लिप्त/ किसानों के चेहरे/ जब भी पढनी होती है कविता/ पढ़ता हूँ / गंदगी के ढेर पर / प्लास्टिक बीनते बच्चों की उम्र / और तब मेरी/ कविता लिखने पढने की / इच्छा खत्म हो जाती है.’

आदमी की व्यथा-कथा में शामिल हैं बस्तर के लोग. छत्तीसगढ़ के परिवेश में बस्तर एक ऐसा फोड़ा बन गया है जो तमाम राजनितिक इलाजों के बाद भी ज़हरवाद बनता जा रहा है. कवि की चिताओं में शामिल हैं बस्तर के आदमी भी, जिनके जीवन में तिरस्कार और गोलियां ही आती हैं..गोलियां चाहे नक्सलियों की हों या सैनिकों की…इन गोलियों का आखिरी निशाना अंततः बस्तर का आदिवासी ही होता है…

‘नष्ट-भ्रष्ट / आदम विचारों की बंदूकें/ भावनाओं के काँधे से/ दागती है गोलियां.’

त्रस्त होकर कवि कहता है—‘बस/ बहुत हो चूका/ रौशन कर दो झरोखों को/ शायद / पगडण्डी नज़र आ जाए.’

कवि का आदमी कभी सिर्फ एक चेहरे का आकार ही ले पाता है, जिसके न शरीर है, न हाथ, न पैर, न ही पेट…केवल चेहरा है इस आदमी के पास…

जीवन की विसंगतियों के बीच कवि दुखी है लेकिन निराश नहीं है, उसे प्रतीक्षा रहती है कि एक नई सुबह होगी कभी…

‘जब आदमियत नंगी नहीं होगी/ नहीं सजेंगी हथियारों की मंडियां/ नहीं खोदी जाएँगी नई कब्रें/ आदिम सोच, आदिम विचारों से/ मिलेगी निजात.’

प्रतिरोध के स्वर कवि की संघर्ष के प्रति आस्था को एक नया आयाम देते हैं, जहाँ कवि स्वप्न देखने के अधिकार से खुद को वंचित नहीं करता और खूब-खूब जीता है तमाम विसंगतियों के बीच…

‘मगर तय है/ जिसकी जड़ें मजबूत हैं/ बाढ़ भी बहा नहीं सकती/ जो छातियाँ पहले से छलनी हों/ उन्हें और छलनी नहीं किया जा सकता///’

ये विश्वास कवि के अन्दर बैठे चित्रकार को रंग और आकार देता है और चित्रकार के अन्दर सांस लेते कवि की भावनाओं को शब्द…ये शब्द आकार लेकर एक कविता संग्रह के रूप में मेरे समक्ष हैं और यदि चित्रकार कवि का यह संग्रह रेखांकन और पेंटिंग्स के साथ मंज़रे-आम होता तो कोई और बात होती. फिर भी अनंग प्रकाशन ने बड़ी आत्मीयता से के रवीन्द्र की कविताएँ छापी हैं.

इस संग्रह में कवि की रूमानियत है, प्रेम का उच्छ्वास है, सौन्दर्य का श्रृंगार भी है लेकिन इन सबके पीछे कवि का व्याकुल मन नित नये सवालों से स्वयं जूझता है और पाठकों को अपनी चिंताओं से जोड़ता है.

-अनवर सुहैल

 

*रंग जो छूट गया था : कविता संग्रह : कुंवर रवीन्द्र 
प्रकाशक : अनंग प्रकाशन, बी-107/1, गली मंदिर वाली, रबड़ फैक्ट्री के पास, उत्तरी घोंडा, दिल्ली-११००५३ 
पृष्ठ : १२० मूल्य : १२० रुपये (पेपरबैक)

प्रस्तुति:- नित्यानंद गायेन

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