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मनोज कुमार गुप्ता की पांच कविताएँ

मनोज कुमार गुप्ता1.सफेद रोशनी

चांद की सफेद रौशनी
दस्तक देती है
बिना किसी परवाह
हर रात
हर आंगन में
जहां आज भी आंगन
बचे हैं।
वो सफेद रोशनी नहीं जानती
किसी अमीरी गरीबी के भेद को,
उसे कोई गुरेज नहीं
उस फूस से घिरे आंगन के
सूनेपन में भी
उतर जाने में
गोया,
जहाँ आज रात, फिर से
भूखी सो गयी है, एक माँ
पेट की आग में
पानी डालकर।

 

2.हमारे इर्द-गिर्द

निःशब्द हो जाते हैं
अधर,
तुम्हें देखकर
तुम्हारी अनंत जिज्ञासा,
प्रश्नांकित मुद्रा
को देखकर,
शायद…
यही पूंछना चाहती हैं, न
ये अनंत संभावनाओं
को तलाशती निगाहें..
क्या यही सच है ?
जो दिख रहा है, जो
आभाष हो रहा है
हमारे इर्द-गिर्द।
क्या दुनिया इतनी बदसूरत है ?
या हमारी ही बदसूरती का
प्रतिबिंब।

 

3.परहेज

वे सभी, जो
खतरे उठाते हैं।
अन्याय के खिलाफ
खड़े होने का
प्रतिरोध के सुरों में
सुर मिलाने का
मृत्यु से डरते नहीं
परहेज करते हैं।

 

4.तुम्हारा धैर्य खो रहा है

तुम तो सागर थे
तुम्हारी नियति ही
प्रश्रय देने की थी।
असीमित धैर्य के पर्याय थे
तुम्हारे खारेपन में भी
जीने की अनंत संभावनाएं थीं,
तुम्हारे हृदय से
कभी न रुकने वाली तरंगें ही, तो
सीपियों को गढ़ने की
निमित्त होती थीं
फिर क्यों, आज !
तुम्हारा धैर्य खो रहा है
अबाध निरंतरता
बाधित होती नजर आ रही है।
नहीं,
ऐसा नहीं हो सकता
तुम्हें, अभी
जीने की प्रत्यासा में
एक नयी सृजनगाथा
लिखनी है…

 

5.तुम्हारे सुरों से मिलकर

शायद मैं नहीं रहूंगा, पर
मेरी ये पंक्तियां जरूर रहेंगी
तुम्हें चाहने के लिए
हवा में तैरती
तुम्हारी मुस्कुराहट को
एहसास करने के लिए।
अनजाने में ही सही
तुम्हारे होंठों से लगकर,
ये अमर हो जायेंगी
और पूरी कायनात
उस दिन झूम उठेगी
उन मीठे स्वरों में
भीगकर,
और अमर हो जायेगी मेरी चाहत
तुम्हारे सुरों से मिलकर।

-मनोज कुमार गुप्ता

कवि परिचय :

जन्म – 10 जुलाई, 1988
शैक्षणिक योग्यता – एम.ए. प्रसार शिक्षा एवं ग्रामीण विकास, एम.फिल. स्त्री अध्ययन, लोक-साहित्य, जेंडर विषयक मुद्दों एवं कविता-लेखन में विशेष रुचि

प्रस्तुति : नित्यानन्द गायेन

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